ज़मीन से बहुत पहले, दिमाग में लड़ी और हारी या जीती जाती है लड़ाई

हार्ट सर्जन साहब को मोटरसाइकिल का शौक था। अपनी मोटरसाइकिल रिपेयर करवाने एक रोज़ वो भोला मैकेनिक की गैराज पर पहुंचे। डॉक्टर साहब की आय अच्छी थी इसलिये मोटरसाइकिल भी महंगी वाली चलाते थे।

रिपेयर करते करते भोला मैकेनिक कहने लगा देखो डॉक्टर साहब, मेहनत तो हम भी आप जितनी ही करते हैं। पूरा इंजन उतारा और बिलकुल सही सही फिट कर डाला। बिना ए.सी., शो रूम के ताम झाम के पसीना बहाते करते हैं।

डॉक्टर सुनकर मुस्कुराते रहे, रिपेयर चलता रहा, भोला बोलता रहा। जब काम हो गया तो पैसे देते देते डॉक्टर साहब ने पूछा, भोले ये बता, अभी जो तूने बाइक ठीक करी है, वो इंजन चालू रख के भी कर लेगा क्या?

भोला बोला कैसी अजीब बात करते हैं डॉक्टर साहब? ऐसा भी कहीं होता है!

डॉक्टर बोले, होता है भोले, जब हम इंसान को ठीक ठाक करते हैं न, तो शुरू करने से पहले और ख़त्म करने के बाद, दोनों बार दिल धड़क रहा होता है। बस हममें और तुममें इतना ही अंतर है।

ये पुराना चुटकुला इसलिए क्योंकि भारत के तथाकथित दक्षिणपंथी अक्सर भोले मैकेनिक जैसे ही तर्क उठा लाते हैं। उन मासूमों को लगता है कि आखिर हममें और हमलावरों में फर्क क्या है? लड़ाई में हम क्यों हारेंगे और अर्बन नक्सल जीत कैसे जाएगा?

क्यूट लोग तर्क देते हैं कि संख्या तो हमारी ज्यादा है और आत्मरक्षा की लड़ाई लोग जी-जान से लड़ेंगे ही। फिर हारेंगे क्यों! हारेंगे इसलिए क्योंकि वो अभी भी लिख सकते हैं, “एंड दे हैंग्ड याकूब”, आप दारा सिंह के लिए ऐसी हैडलाइन नहीं छपवा सकते।

अश्लील हरकतें करने के लिए जुर्माना भर चुके एक अपराधी को वो अपना पोस्टर बॉय बना सकते हैं। ऐसे अनमोल रत्नों के बचाव में वो पीड़िता को ही चरित्रहीन और वर्गशत्रुओं के “गोद में जा बैठी” बता सकते हैं।

उन्हें वो चुनावों में उतारने का, उनके बयान राष्ट्रीय खबर बनाने का दम रखते हैं। वो चंदा लूटकर उससे मेकअप करवाएंगे और इस बात के लिए अगर उनपर मुकदमा हो तो सरकार को फासिस्ट बताएँगे। वो तेजपाल को दूसरा मौका दिए जाने की खुलकर वकालत कर सकते हैं। आप इनमें से कुछ नहीं कर पायेंगे।

आप क्यों हारेंगे ये सोचना है तो सोचिये कि संख्या बल में ज़्यादा होने पर भी जंगली माओवादी कॉमरेड अक्सर मारे कैसे जाते हैं? पुलिस बलों का लड़ने का अभ्यास उनसे ज्यादा होता है। अगर चुपके से हमला करके वो फ़ौरन भागें नहीं तो सम्मुख युद्ध में माओवादी कॉमरेड हमेशा हारेंगे। इसलिए वो गुरिल्ला तकनीक इस्तेमाल करते हैं और कम से कम देर का हमला करके, ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुँचाने की कोशिश करते हैं। तेज हमला करके फ़ौरन भागना ही गुरिल्ला युद्ध में जीत दिलाएगा। मोर्चे तेजी से बदलने हैं।

अब गुरिल्ला युद्ध की बात कर ही दी है तो ये सोचिये कि बहुत तेजी से मोर्चे बदलने के लिए आप किन योद्धाओं को जानते हैं? इतिहास के किस किरदार का नाम गुरिल्ला युद्ध सुनते ही याद आता है?

छापामार युद्ध के लिए हाल के इतिहास से शिवाजी याद आने चाहिए। असम में इस तकनीक को डाग-जुद्ध कहते हैं। लोचित बोरफुकन अपनी सेना के तैयार होने तक मुगलों का सामना इसी तकनीक से कर रहे थे। महाराणा प्रताप भी हल्दी घाटी के बाद इस तकनीक का इस्तेमाल करते थे।

ऐसे युद्धों में इस्तेमाल होने वाली नीतियों, तकनीकों पर आम हिन्दुओं की ही तरह इन तीनों में से किसी ने किताबें नहीं लिखी हैं। गुरिल्ला युद्ध पर माओ ने किताब लिखी थी और जो नक्सली साहित्य पकड़ा जाता है उसमें अक्सर वो किताब भी होती होगी।

कुछ ज्यादा क्यूट राजनीतिज्ञ (जो अक्सर एक ख़ास पार्टी से होते हैं) कहते हैं किताबों से चार वोट आयेंगे क्या? वही राजनीतिज्ञ आजकल अर्बन नक्सल का जुमला उछालते नज़र आते हैं। बस ये भूल जाते हैं कि Urban Naxal एक किताब का नाम है (जो उनकी मदद के बिना ही लिखी गयी है)।

क्यूट लोगों को लगता है कि लिख दिया तो फिर तो जानकारी सार्वजनिक हो जायेगी। फिर इस जानकारी के लिए उन्हें सम्मान कैसे मिलेगा? सबको पता होगा तो कौन उन्हें माला पहनायेगा, मंच पर बिठाएगा? उनकी जानकारी उनकी ही अहंकार की चिताओं पर जल गयी।

राम-मंदिर का आन्दोलन कैसे हुआ था, किन रास्तों का वहां पहुँचने के लिए इस्तेमाल हुआ, सूचना दूर-दूर तक कैसे पहुंचाई गयी इसपर आन्दोलन में भाग लेने वालों ने क्या क्या लिखा है? इसके उलट देखिये कि इस आन्दोलन का विरोध करने वालों ने इसपर कितना लिखा है!

वो आपसे इसलिए जीत जायेंगे क्योंकि उन्होंने एक बार की सफलता को लिखा और उसे बार-बार दोहराने का अभ्यास करने के लिए सबमें बाँट दिया। आपको जीत का सम्मान चाहिए था, अपने अहंकार को पुष्ट करना था, लोग आपकी वाह-वाह करते रहें ये जरूरी था। इसलिए आपने अपनी तरफ से किताबें लिखी नहीं।

कुछ ने लिखी भी तो उसे आपने प्रचारित नहीं किया क्योंकि कोई और प्रसिद्ध हो जाता तो आपको कौन पूछता? ऐसी ही बेवकूफियों का नतीजा है कि उनके मोमबत्ती गिरोह कानून बदलवा लेते हैं, आपसे कुछ नहीं हो पाता।

बाकी लिख के रखना सीखिए, जमीन से बहुत पहले लड़ाई दिमाग में लड़ी और हारी या जीती जाती है।

अगली पीढ़ी को अपने धर्म के बारे में बताने के लिए आपके घर में कौन सी किताबें हैं?

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