क्या वैटिकन चर्च नहीं है बाल व नन यौनशोषण का सहभागी!

वैटिकन चर्च, जो दुनिया भर के कैथोलिक ईसाई धर्म का संचालन करता है वो आज प्रश्नों के घेरे में है।

यह एक विडंबना ही है कि दुनिया भर में कैथोलिक ईसाई धर्म को संचालित करने वाले वैटिकन चर्च और उसके ईसाई धर्मगुरुओं, जिनके मूल में सेलिबसी (celibacy) अर्थात ब्रह्मचर्य स्थापित है, पर यह प्रश्न ईसा मसीह, वर्जिन मैरी, बाइबल, ओल्ड टेस्टामेंट न्यू टेस्टामेंट इत्यादि धार्मिक मान्यताओं, आस्थाओं और ग्रंधो के कारण नहीं उठ रहे हैं बल्कि इनके पादरियों, बिशपों व ईसाई धर्मगुरुओं द्वारा चर्च, कॉन्वेंट में यौनशोषण करने व मामला सामने आने पर, चर्च द्वारा इन मामलों को दबाने के कारण उठ रहे हैं।

वैसे तो काफी समय से पश्चिमी जगत (अमेरिका व योरप) में इन ईसाई धर्मसेवकों द्वारा बच्चों व कॉन्वेंट की बन्द चहारदीवारियों में ज़िन्दगी गुज़ारने वाली ननों के यौनशोषण के मामले छन छन कर सामने आते रहे हैं, लेकिन पश्चिमी जगत के समाज व उसके तंत्रों पर चर्च की इतनी शक्तिशाली जकड़ रही है कि वो ईसाई धर्म के वैश्विक हितों को देखते हुये, इन सब पर मिट्टी डालने में सफल होती रही है।

किंतु पिछले दो दशकों से स्वतंत्र मीडिया व सोशल मीडिया के प्रभावशाली होने से चर्च की जकड़ कमज़ोर होने लगी है। इस सब के बाद भी चर्च अपने लोगों को बचाता रहा है।

2002 में अमेरिका के ‘द बोस्टन ग्लोब’ अखबार की स्पॉटलाइट के खोजी पत्रकारों की टीम ने मैसाच्यूट्स में कैथोलिक पादरियों द्वारा बाल यौनशोषण किये जाने पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी और उन्होंने 87 पादरियों को चिह्नित किया था, जो कुल पादरियों का 6% था जिनके खिलाफ बच्चों का यौनशोषण किये जाने का मामला सामने आया था।

इन पादरियों की शिकायत कार्डिनल बर्नार्ड लॉ से भी की गयी थी लेकिन चर्च ने न सिर्फ इस सब पर पर्दा डाला बल्कि इन घृणित पादरियों को स्थानान्तरित करके मामले से हाथ साफ कर लिया था।

जब यह रिपोर्ट सामने आई तब कार्डिनल बर्नार्ड लॉ ने अपने पद से इस्तीफा तो दे दिया लेकिन कार्डिनल लॉ को सजा देने के बजाय, कुछ ही समय बाद उनको वैटिकन चर्च ने पदोन्नति देते हुये, सांता मारिया मग्गिओरे, रोम भेज दिया।

पश्चिम में तब से लेकर अब तक चर्च व उसमें हो रहे यौनशोषण को लेकर उनकी प्रतिक्रियाओं में इतना अंतर ज़रूर आ गया है कि दो दशक पहले तक चर्च अपनों को छुपा देता था और अब उसको स्वीकार करना पड़ रहा है।

आज ही यह समाचार आया है कि वाशिंगटन, अमेरिका के आर्चबिशप कार्डिनल थिओडोर मैकरिक जिन पर कई दशकों से बाल यौनशोषण करने व सेमिनरी, जहां पादरी बनने की पढ़ाई होती है, के छात्रों के साथ समलैंगिक संबंधों के आरोप लगे थे, उन्होंने न सिर्फ इस्तीफा दे दिया है बल्कि पोप फ्रांसिस ने उनका इस्तीफा तुरन्त स्वीकार भी कर लिया है।

मैंने ऊपर के दो उदाहरण सिर्फ इसलिये दिये हैं ताकि लोग वैटिकन चर्च के दोहरे चरित्र को अच्छी तरह समझ लें। वैटिकन के लिये कैथोलिक ईसाई दो वर्ग में बंटे हैं, एक वह वर्ग जो श्वेत वर्ण का पश्चिमी जगत का समृद्ध समाज का हिस्सा है और दूसरा वो जो अश्वेत है, अफ्रीका और एशिया से आता है, जहां वैटिकन की उपस्थिति धर्मान्तरण के कारण है।

आज वैटिकन चर्च, पश्चिम जगत में अपने पादरियों, बिशपों द्वारा यौनशोषण किये जाने के विरुद्ध उठ रही आवाज़ों पर अपनी प्रतिक्रिया देने में जहां रक्षात्मक मुद्रा में आ गया है, वहीं भारत में यौनशोषण के आरोप लगने पर वैटिकन चर्च की प्रतिक्रिया बिल्कुल उसके विपरीत, आक्रामक है।

जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल पर बलात्कार व अप्राकृतिक यौन क्रिया का आरोप लगा रही नन को भले ही जनसमर्थन मिल रहा है लेकिन वैटिकन चर्च, अपने आरोपित बिशप का बड़ी निर्लज्जता से न सिर्फ समर्थन कर रही है बल्कि अपने प्रभाव का प्रयोग करके केरल की सरकार, पुलिस व मीडिया को निष्प्रभावी बनाये हुये है।

चर्च बलात्कार के आरोपी अपने बिशप की जहां रक्षा कर रही है वहीं पर बलात्कार पीड़िता नन के चरित्र हनन से लेकर कानून के विरुद्ध उस नन की तस्वीरों को भी सार्वजनिक कर रही है।

आज वैटिकन चर्च का यह कृत्य यह और भी स्पष्ट किए दे रहा है कि उसके लिये भारत और भारतीय, दोनों ही आज भी उपनिवेश व उसकी उपनिवेशित नस्ल हैं, जिस पर ईसाई धर्म का राज करना उनका दैवीय अधिकार है।

बिशप, नन और ब्राइड ऑफ द क्राइस्ट

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