आयुर्वेद आशीर्वाद : अपामार्ग, एक बहुऔषधीय पौधा

इस समय सड़क हो या नदी-तालाब किनारे या बंजर भूमि हर कहीं आपको अपामार्ग का पौधा आसानी से दिख जावेगा। हमारे मालवांचल में तो हर गांव कस्बे में यह बड़ी मात्रा में पैदा होता है। पर इसको अपामार्ग के नाम से कोई नहीं जानता, हर कोई आंधीझाड़ा कहता है और आंधीझाड़ा का मतलब होता हैं बेकार की झाड़ी। अपामार्ग को अघाडा, लटजीरा या चिरचिटा आदि नामों से जाना जाता है।

अपामार्ग एक बहुऔषधीय पौधा हैं, जिसका तना, जड़, पत्ते, बीज सभी का औषधीय मूल्य है।

आंधीझाड़ा के पत्ते ऋषिपंचमी, गणेश पूजा, हरतालिका पूजा, मंगला गौरी पूजा आदि समय काम आते हैं। शायद पूजा में इस्तेमाल ही इसलिए होता होगा ताकि हम इनके आयुर्वेदिक रूप को पहचान सकें और ज़रुरत के समय इनका सदुपयोग करना ना भूलें।

ऋषि पंचमी पर महिलाएं उपवास कर इसके 108 ठंठल की गठरी बनाकर सिर पर रखती हैं और 108 लौटे या मग पानी सिर पर डालकर स्नान करती हैं। कहीं-कहीं इसकी दातुन भी की जाती है। इसकी दातून करने से दांत काफी मजबूत होते हैं और कई वर्षों तक उनमें किसी प्रकार का कीड़ा नहीं लगता।
इसके डंठल से स्नान करने पर मस्तिष्क में जमा हुआ कफ निकल जाता है और वहां के कीड़े भी झड़ जाते हैं।

इसके पत्तों को पीसकर लगाने से फोड़े फुंसी और गांठ तक ठीक हो जाती है। अपामार्ग की जड़ को कमर में धागे से बाँध देने से प्रसव सुखपूर्वक हो जाता है, प्रसव के बाद तुरन्त इसे हटा देना चाहिए।

ज़हरीले कीड़े काटने पर इसके पत्तों को पीसकर लगा देने से आराम मिलता है, वहीं इसकी ५-१० ग्राम जड़ को पानी के साथ घोलकर लेने से पथरी निकल जाती है।

इसके बीज चावल की तरह दिखते हैं, जिन्हें तंडुल कहते हैं, यदि स्वस्थ व्यक्ति इस तंडुल की खीर खा ले तो उसकी भूख-प्यास आदि समाप्त हो जाती है, पर इसकी खीर उनके लिए वरदान है जो भयंकर मोटापे के बाद भी भूख को नियंत्रित नहीं कर पाते, कालांतर में ऋषि-मुनि इस प्रकार की खीर का उपयोग कर लंबी साधना को पूर्ण करते रहे हैं।

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