कांग्रेसी होना राजनीतिक दल से जुड़ा होना नहीं, एक मानसिकता है

ज्यादातर मसलों पर कूल डूड के अब्बू कोई अलग राय नहीं रखना चाहते। कूल डूड के अब्बू डरपोक होते हैं, वो भीड़ के साथ ही चलना चाहते हैं। कोई काम हमेशा इस तरीके से होता आया था, इसलिए उस तरीके से नहीं किया जाना चाहिए, ऐसा सोचने वाले कोई अविष्कार भी नहीं करते, कुछ नया नहीं ढूंढ पाते।

इसी वजह से कूल डूड के अब्बू ने कुछ नया खोजा भी नहीं है, कुछ बनाया भी नहीं है। कूल डूड के अब्बू ही कांग्रेसी हैं। यहाँ कांग्रेसी होना राजनैतिक दल से जुड़ा होना नहीं, एक मानसिकता है।

मानसिकता क्यों? क्योंकि थोड़ा सा गौर करते ही दिख जाएगा कि भारत में कई लोगों की सोच एक ख़ास किस्म की होती है। थोड़ा अनुमान लगाते ही आप उसे प्रेडिक्ट कर सकते हैं।

जैसे भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जब एक बार विदेशों से अनाज आयात करना पड़ा तो उसके साथ एक बहुत तेजी से फैलने वाली घास के बीज की मिलावट थी। इस घास की वजह से फसलों का नुकसान होने लगा और मवेशियों के चारे की जगहों पर भी ये उग आई तो लोगों ने इस घास का नाम ही कांग्रेस घास रख दिया था।

किसी भी किस्म की विविधता को मारकर, सिर्फ एक चीज़ को बढ़ावा देना ही कांग्रेसी मानसिकता है। इसी को किताबों पर डालिए तो आप भगवद्गीता पर लिखी टीका-टिप्पणियाँ ढूंढिए। अद्वैत के अलावा बाकी के दर्शन आसानी से नहीं मिलते? छपती नहीं? महाकाव्यों के नाम पर रामायण और महाभारत के अलावा और क्या क्या था? शिलप्पादिकारम, मणिमेकलै, कुमारसंभव, शिशुपाल वध, इनमें से किसी का नाम नहीं याद आया! इतिहास या समाजशास्त्र पर वाम-मज़हब के चिंतकों के अलावा कोई याद आते हैं?

हर जगह ये एक ही बात, एक ही विधा, कोई परिवर्तन नहीं वाली अवधारणा ही कांग्रेसी मानसिकता है। भारत में साड़ी भी दस अलग-अलग तरीकों से पहनी जाती होगी, सबको एक जैसे बुर्के में घुसा देना कांग्रेसी मानसिकता है। एक चैनल पर कुछ रोचक न आ रहा हो तो टीवी चैनल बदला जाता था, इसलिए इतने विकल्प आये थे। हर टीवी सीरियल में एक जैसी सास-बहु और साज़िश चल रही हो, हर न्यूज़ डिबेट में एक ही मुद्दा हो, ये कांग्रेसी मानसिकता है।

अब ज़रा ये सब कर रहे लोगों पर गौर कीजिये और देखिये कि उनकी उम्र क्या है, अंदाजा लगाइए कि उनके बच्चे कितने बड़े होंगे? एक विषय पर एक जैसी बातें लिखते ये सब उसी 55 वाले आयु वर्ग के हैं। टीवी डिबेट करने-करवाने वाले, संपादक, प्रोफेसर सबकी उम्र देख लीजिये, वही मिलेगी। इनके बच्चे उसी उम्र के हैं जिन्हें आप कूल डूड कह रहे थे। आपके सामने कूल डूड के अब्बू नजर आ रहे हैं। ये बदलावों का प्रतिरोध करते हैं। जैसे चल रहा है उसमें क्या बुरा था पूछने वाले प्रतिक्रियावादी लोग हैं। प्रतिक्रियावादी, कूल डूड के अब्बू किसी भी परिवर्तन का विरोध करेंगे।

एक ही ढर्रा बनाने और उसे चलाते रहने के लिए कूल डूड के अब्बू कितने प्रतिबद्ध होते हैं इसे देखना हो तो ये उनके चुनावी विश्लेषण में भी दिखेगा। लोगों की उम्र, लिंग, आय जैसी चीज़ों को एक साथ मिलाकर डेमोग्राफिक्स कहते हैं। सोशल इंजीनियरिंग के ये स्वघोषित पैरोकार डेमोग्राफिक्स में हर चीज़ नहीं देखते। वो बताएँगे कि यू.पी. में जहाँ भाजपा के 15% वोट थे वहां 44% हो गए जी! सभी जातियों ने, मुस्लिमों ने भी मोदी जी को वोट दिया जी! आंकड़ो की ये बाज़ीगरी बिलकुल इसी रूप में ज़ात, मज़हब के नाम पर आपको हर तरफ सुनाई देगी।

कुछ और भी हो सकता है, या हुआ होगा, ऐसा सोचने-बोलने को कोई तैयार क्यों नहीं है? प्रतिक्रियावादी, कूल डूड के अब्बू को परिवर्तन पसंद नहीं। उन्होंने जो थ्योरी गढ़ रखी है, उससे क्यों विचलित हों? भारत में हाल के वर्षों में आबादी की औसत उम्र में बहुत बड़ा बदलाव आया है। भारत के नागरिकों की औसत उम्र में काफी कमी आ गई है और ये अभी 35 वर्ष के आसपास होगा। वयोवृद्ध वोटर अपने विचार ज़्यादा नहीं बदलता। उसकी पसंद का उम्मीदवार, उसके पसंद की बातें न हों तो वो सीधा मतदान करने ही नहीं आये ऐसा क्यों नहीं हो सकता?

अक्सर भारत में 65% के लगभग मतदान होता है। बाकी के 35% में वो लोग रह जाते होंगे जो या तो असंतुष्ट थे इसलिए वोट डालने नहीं आये, या कोई बदलाव नहीं चाहते थे इसलिए नहीं आये। पैंतीस साल या उस से कम का युवा इस तरीके से नहीं सोचता। पिछली बार चुनाव में उसने गलत चुन लिया था, इसलिए शर्म के मारे अगली बार वो मतदान नहीं करेगा, ऐसा नहीं होगा। उसके पास अभी उम्र बाकी है, उसकी विचारधारा बदलती भी रहेगी, इसलिए उसका मतदान भी बदलेगा। एक प्रयास में अपने उम्मीदवार को वो जिता नहीं पाया इसलिए हारकर वो अगली बार मतदान करने नहीं आएगा, ये भी नहीं होने वाला।

अभी भारत की करीब आधी आबादी युवाओं की है और चुनावों में बढ़ते मतदान का कारण यही लोग हैं। अगले बार चुनावों में मतदान का प्रतिशत और बढ़ेगा। नेताओं पर अपने घोषित और अघोषित दोनों वादे पूरे करने का दबाव भी बढ़ेगा। आप किसी का पासपोर्ट ऐसे ही जारी कर दें क्योंकि आप मंत्री हैं, या कोई कानून इसलिए बदल दें क्योंकि आपका मन कर रहा है, ये तो युवाओं के पास चलने वाला नहीं। इनमें से कई पहली-दूसरी बार ही मतदान कर रहे होंगे, ये देख चुके राजनीतिज्ञ ने शुरू में ही बाल-दिवस के बहाने वहां पैठ बनानी शुरू कर दी थी। राजनीति में मेरी रूचि नहीं कहने वाले जो युवा थे, जो वोट देना ज़रूरी नहीं समझते थे, ये वो लोग हैं।

बदलावों का इतिहास भी देखेंगे तो आपको नज़र आ जाएगा कि अधिकांश बदलाव लोगों ने युवावस्था में ही किये हैं। बूढ़े होते होते उन्हीं लोगों ने अकसर नुकसान ही करना शुरू कर दिया। आदि शंकराचार्य का देहावसान पैंतीस की आयु से पहले ही हो गया था। नेपोलियन, सिकन्दर, महाराणा प्रताप, छत्रसाल, बाजीराव सबके युवावस्था के कारनामे ही सुनाये जाते हैं।

कूल डूड के अब्बू वाली वय में एक अहिंसावादी अफ्रीका से भारत चले आये थे। युवाओं को नेतृत्व थमाने के बदले उन्हें कांग्रेस छोड़कर आज़ाद हिन्द फ़ौज बनाने पर भी उन्होंने ही मजबूर किया था। बदलावों से मुंह छुपाने वाली जमात युवाओं को गिनना नहीं चाहती क्योंकि इस से उनकी सत्ता डोलने लगती है।

बाकी सोशल इंजीनियरिंग, विकास, प्याज़-टमाटर के बढ़े दाम, जैसी वजहों से जिन्होंने वाजपेयी सरकार दोबारा नहीं आने दी थी उनकी अभी कितनी उम्र होगी, ये भी जोड़कर देख ही सकते हैं। कूल डूड के अब्बू तो जोड़कर बताएँगे नहीं!

वो आपके बच्चों को बरगला कर ले जा रहे हैं, क्या पड़ोसी आयेंगे उन्हें बचाने!

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