बिशप, नन और ब्राइड ऑफ द क्राइस्ट

दरअसल शताब्दियों से चर्च और ईसाई धर्म के इन सेवकों के लिये एक नन, येशु की पत्नी ही है और उसके कौमार्य पर एकाधिकार उन्होंने उनके निर्वाण के लिये धार्मिक परम्पराओं से ले लिया है।

आज कल जालंधर के बिशप फ्रैंको मुलक्कल (Franco Mulakkal) बड़ी चर्चा में हैं।

इस बिशप पर चर्च, वामपंथियों, सेक्युलर राजनीतिज्ञों, लिब्रलों, बुद्धिजीवियों और मीडिया की इतनी कृपा है कि ये लोग, एक नन द्वारा बिशप पर बलात्कार व अप्राकृतिक सेक्स करने के आरोप लगाये जाने की बाद भी, पूरी क्षमता से न सिर्फ उसका बचाव कर रहे है बल्कि नन को वेश्या ही घोषित कर दे रहे हैं।

यह सबके लिये एक बड़ा ज्वलंत प्रश्न है कि आखिर बिशप फ्रैंको जिस पर एफआईआर हुये लगभग 3 माह होने को आ रहे है उसे अभी तक पुलिस व केरल की सरकार क्यों नहीं गिरफ्तार नही कर रही है?

आखिर यह पहला मामला नहीं है। केरल के चर्चों से तो अक्सर ननों के यौन शोषण को लेकर खबरें आती रही हैं। फिर लोग यह चर्च के पादरी को बचाते क्यों है?

वह कौन सी असीम शक्ति है जो लोगों को एक शोषित नन को सार्वजनिक रूप से वेश्या कहने की हिम्मत देती है? वह कौन सी विवशता जो भारत के सेक्युलर वर्ग को इस पर चुप्पी बांधनी पड़ती है?

इन सारे प्रश्नों का एक ही उत्तर है और वह यह है कि भारत के हर तन्त्र में वैटिकन चर्च की पकड़, जनमानस की परिकल्पना से कहीं ज्यादा है। भारत के ‘लोकतांत्रिक राजतंत्र के नेतृत्व’ का यह आधिकारिक धर्म है जिसको पिछले 3 दशकों में भारत का अनाधिकारिक धर्म बना दिया गया है।

पश्चिम में चर्च तो कई दशकों से बाल यौन शोषण और ननों के यौन शोषण को लेकर हुये कांडों को लेकर विवादित रहा है और वहां पर इसको लेकर कई मुकदमे भी चले हैं लेकिन इस सबके बाद भी वैटिकन चर्च अपने ईसाई धर्म के धर्मगुरुओं और प्रचारकों को बचाता रहा है।

पश्चिम जगत में तो लोग जहां जागरूक हो गये हैं और चर्च द्वारा इन मामलों को दबाने के प्रयास के विरुद्ध मुखर हो चले हैं, वही भारत समेत अन्य एशियाई व अफ्रीकी देशों में चर्च के ईसा के सेवकों के कुकृत्यों को हमेशा से दबाया गया है।

चर्च के तन्त्र में नन एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है और ईसाई धर्मशास्त्रानुसार उन्हें ‘ब्राइड ऑफ द क्राइस्ट’, ईसा मसीह की पत्नी की उपमा दी जाती है।

जब कोई कुंवारी, विशेष धार्मिक संकल्प लेकर नन बनती है तो वो शेष दुनिया को त्याग कर अपने इष्ट येशु को अपने पति के रूप में स्वीकारती है। यह शेष दुनिया से कटी हुई कुंवारी, नन बन कर पूरी तरह चर्च के तन्त्र के आश्रित हो जाती है, जहां उनके जीवन संचालन को दिशा देने वाली सारी ही शक्तियां व प्रभाव पादरियों और बिशपों के हाथों होती है।

पिछले एक दशक से भारत मे जितने भी चर्च के इन पादरियों और बिशपों के कांड सामने आये है वो इसी तरफ इशारा कर रहे हैं कि चर्च के तन्त्र में एक नन की स्थिति एक शोषित की हो कर रह गयी है।

इन लोगों ने नन को ‘येशु की पत्नी’ मानते हुये, खुद को उन्हें येशु तक पहुंचाने का सम्पर्क मार्ग समझ लिया है। उनकी अवधारणा यही है कि नन उनको येशु की प्रतिमूर्ति मान कर समर्पित होती है तो ये नन का येशु के प्रति प्रेम ही है, जो उसे बिस्तर से होते हुये ईसा तक पहुंचने का मार्ग प्रशस्त करता है।

इस सबके पीछे परोक्ष रूप से ईसाई धर्म की इस मान्यता का भी प्रभाव है जो यह मानता है कि वर्जिन मैरी (कुंवारी मां) ने अक्षतयोनि रह कर भी पुण्यात्मा ईश्वरीय पुत्र येशु को जन्म दिया था। यह वर्जिन या कौमार्य के प्रति चर्च की अतिरेक आसक्ति भी इसके तन्त्र में यौन कुंठा को जन्म देती रही है।

ऐसा नही है कि चर्च इस सबको नहीं समझता है लेकिन वो ईसाई धर्म की पुनर्व्याख्या से डरता है और इसी लिये वह उसका प्रचार व प्रसार करने वालों को विशिष्ट श्रेणी में रखता है। चर्च के लिये हमेशा से ईसाई धर्मालंबियों के उत्थान से ज्यादा महत्वपूर्ण, दक्षिण अमेरिका, अफ्रीका, एशिया के पश्चिमी राष्ट्रों के उपनिवेशों में धर्मान्तरण कराना रहा है। यही काम आज ज्यादा ज़ोर शोर से हो रहा है और इस शोर में पादरियों बिशपों के यौन शोषणों के विरुद्ध उठी चीत्कार को दबाता भी रहा है।

यदि आप ने बिशप फ्रैंको मुलक्कल और उनकी ईसाई धर्म के प्रति अंधआस्था को समझ लिया है तो आप यह भी समझ जायेंगे कि आखिर चर्च क्यों अपने बिशप का साथ दे रहा है और नन का तिरस्कार कर रहा है।

दरअसल शताब्दियों से चर्च और ईसाई धर्म के इन सेवकों के लिये एक नन, येशु की पत्नी ही है और उनके कौमार्य पर एकाधिकार उन्होंने उनके निर्वाण के लिये धार्मिक परम्पराओं से ले लिया है।

भारत में बिशप फ्रैंको व चर्च के साथ मीडिया, सेक्युलर राजनीतिज्ञ, वामपंथी, लिब्रल्स और बुद्धिजीवी (जिनमें क्रिप्टो ईसाई की संख्या बहुसंख्य है) इसलिये खड़ा है क्योंकि उनकी धार्मिक मान्यता ही यही हो गयी है कि एक चर्च के सेवक द्वारा नन के साथ बलात्कार किया ही नहीं जा सकता है।

और जो कुछ होता है, जिसे हम जैसे मूर्ख हिन्दू बलात्कार या यौन शोषण कहते हैं, वह एक ईश्वरीय पुत्र येशु का इनके माध्यम से कुंवारियों को येशु का प्रेम पहुंचाना है।

हल्लिलूय्याह! हल्लिलूय्याह! हल्लिलूय्याह!

CONVENTS OF DUBIOUS HISTORY

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