1971 के पाकिस्तानी कैदी: दुश्मन से मोहब्बत करने के लिए क्यों मरे जाते हैं हम हिन्दू

यह लेख उन नौजवानों के लिए है जो वर्तमान भारतीय इतिहास के पन्नों को कभी पलट नहीं सके… कभी समझ नहीं सके…

जून 1972 के दिन थे। मैं संभवतः कक्षा एक में था। मेरे मामाजी श्री एन.सी वर्मा, मिलिट्री कैंटोनमेंट धाना, जिला सागर, मध्यप्रदेश में MES में AGE के पद पर कार्यरत थे।

मेरा परिवार उन दिनों अपनी गर्मी की छुट्टियां बिताने बरेली से धाना गया हुआ था। बड़ा अजीब सा माहौल था… कैंट खाली सा था, सैनिक कम दिखाई देते थे। परंतु यह बात हर शख्स जानता था कि धाना कैंट में सैकड़ों पाकिस्तानी युद्धबंदी सैनिकों को रखा गया था।

यह सैनिक करीब 20 फुट ऊंची कंटीले तारों की बाड़ के पीछे रहते थे… सैनिकों की बैरकों में, जिन्हें अस्थायी जेलों में तब्दील कर दिया गया था।

अक्सर रात में 2-3 बजे यह पाकिस्तानी कैदी समवेत स्वर में चीखने लगते थे। पुरज़ोर तेज़ आवाज़ में सैकड़ों कंठों से ‘अल्लाह ओ अकबर’ का नारा हमें अंदर तक हिला जाता था। कभी यह सैकड़ों पाकी समवेत स्वर में ज़ोर ज़ोर से हँसने लगते थे। हम लोगों का दिल बैठ जाता था। बड़ी आतंक से भरी रातें होती थीं।

मैंने अपनी आंखों से कंटीले तारों के पार… पाकी सैनिकों को बाल्टी से सीधे दूध पीते देखा था। मामाजी बताते थे कि सप्ताह में 3 दिन पाकिस्तानियों को नॉनवेज खाना दिया जाता था… नाश्ते में परांठे, अंडे और दूध-चाय सर्व होता था…

भारतीय जेलों में पूरे ठाठ थे पाकिस्तानियों के। पाकिस्तानियों को मैंने शाम के वक्त वॉलीबॉल और कबड्डी खेलते देखा था…एक बार तो गेंद कंटीले तारों को पार कर बाहर आ गयी थी… मेरे साथ मामाजी का अर्दली स्टेनली थे… उन्होंने गेंद उठाकर पाकी कैदियों को दी… बदले में पाकियों ने स्टेनली को गालियां दीं… इधर से स्टेनली ने भी प्रति-उत्तर दिया।

भारत सरकार पाकिस्तानी कैदियों के मनोरंजन का पूरा ख्याल रखती थी। सप्ताह में दो दिन पाकी कैदियों के लिए उनकी बैरकों के पास ही खुले थियेटर में फ़िल्में भी दिखाईं जाती थीं।

उक्त थिएटर में नीचे कुर्सी पर पाकी कैदी बैठते थे… मैंने अपने परिवार के साथ उसी थियेटर में ‘तलाश’ और ‘गीत’ नामक फ़िल्में देखीं थीं। पिक्चर देखते समय आर्मी और MES के अधिकारी और परिजन, पाकी कैदियों से 15 फीट ऊंची दीवार के ऊपर बालकनी जैसी जगह पर बैठते थे।

पाकी कैदियों को थिएटर में बंद कर बाहर से ताला जड़ दिया जाता था और बाहर भारतीय सेना के जवान पहरा देते थे… पाकिस्तानी कैदी पूरी पिक्चर के दौरान हुल्लड़ और गाली गलौज करते थे… भारतीय सेना के अधिकारी और परिजन गालियां सुनते थे…

एक बार फ़िल्म के शो दौरान बारिश आ गयी तो पाकिस्तानी कैदियों ने 15 फुट ऊंची बालकनी पर चढ़ने की कोशिश की थी… मुझे याद है कि भारतीय सिपाहियों ने राइफल की नाल तानी तो पाकी शांत हुए थे।

बस यूं कहिये कि भारतीय बैरकों में पाकी बंदी कोई कैदी का नहीं, दामाद जैसा जीवन बिता रहे थे। इंदिरा गांधी सरकार ने विश्व समुदाय को दिखाने के लिए चापलूसी की तमाम हदें पार कर दी थीं।

शाम 4 बजे से ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से पाकिस्तानी कैदी… पाकिस्तान में बैठे अपने परिजनों को अपनी कुशल-क्षेम की सूचना देते थे… भारतीय अतिथि सत्कार के बारे में बताते थे…

उसी दौरान पाकिस्तानी जेलों में बंद अधिकांश भारतीय सैनिक युद्धबंदियों को तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया था। हम हिन्दू… दुश्मन से मोहब्बत करने के लिए क्यों मरे जाते हैं…?

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