आयुर्वेद आशीर्वाद : भगवान गणेश की अतिप्रिय दूर्वा

दूर्वा को दरोब, दूब, अमृता, अनंता, गौरी, महौषधि, शतपर्वा, भार्गवी आदि नामों से जाना जाता हैं। सभी जगह आसानी से मिल जाने वाली यह घास ज़मीन पर पसरते हुए चलती हैं।

हमारे देश में सेकड़ों प्रकार की घास हैं जिनमें सबसे श्रेष्ठ दूर्वा को ही माना गया है। इसका उल्लेख आयुर्वेद ही नहीं, हमारे प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है जो इसके गुणकारी पक्ष को बताता है। हमारे वार-त्यौहार, संस्कार एवं कर्मकाण्डों में इसका उपयोग सदैव से होता आया है।

भगवान गणेश की अतिप्रिय दूर्वा से जुड़ी कथा है कि समुंद्र मंथन में निकले अमृत को सर्वप्रथम जिस जगह पर रखा था वहाँ दूर्वा घास थी इसी कारण इसे अमृता कहा है, वही भगवान गणेश ने किसी राक्षस को निगल लिया तब गणेश जी को दूर्वा की 21 गांठे पिलाई, जिससे उनके पेट की अग्नि शांत हुई।

इसी कारण भगवान गणेश को 21 गांठे दूर्वा की चढ़ाई जाती हैं। अन्य मौसम की अपेक्षा वर्षा काल के दौरान दूब घास अधिक वृद्धि करती है तथा वर्ष में दो बार सितम्बर-अक्टूबर और फ़रवरी-मार्च में इसमें फूल आते है।

दूब का पौधा एक बार जहाँ जम जाता है, वहाँ से इसे नष्ट करना बड़ा मुश्किल होता है। इसकी जड़ें बहुत ही गहरी पनपती है। दूब की जड़ों में हवा तथा भूमि से नमी खींचने की क्षमता बहुत अधिक होती है, यही कारण है कि चाहे जितनी सर्दी पड़ती रहे या जेठ की तपती दुपहरी हो, इन सबका दूब पर असर नहीं होता और यह अक्षुण्ण बनी रहती है।

प्रायः जो वस्तु स्वास्थ्य के लिए हितकर सिद्ध होती थी, उसे हमारे ऋषि-मुनियों ओर पूर्वजों ने धर्म के साथ जोड़कर उसका महत्व और भी बढ़ा दिया। हमारे शास्त्रों के साथ ही अनेक विद्वानों ने इसके अनेक गुणों का परीक्षण कर इसे एक अति गुणकारी महाऔषधि माना है। दूब में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं।

आयुर्वेदाचार्यों के अनुसार दूब का स्वाद कसैला-मीठा होता है। विभिन्न पैत्तिक एवं कफ विकारों के शमन में दूब का निरापद प्रयोग किया जाता है। दूब को पीसकर फटी हुई बिवाइयों पर इसका लेप करके लाभ हिता है।

इस पर सुबह के समय नंगे पैर चलने से नेत्र ज्योति बढ़ती है और अनेक विकार शांत हो जाते हैं। दूब घास शीतल और पित्त को शांत करने वाली है। दूब घास के रस को हरा रक्त कहा जाता है, इसे पीने से एनीमिया ठीक हो जाता है। नकसीर में इसका रस नाक में डालने से लाभ होता है।

इस घास के काढ़े से कुल्ला करने से मुँह के छाले मिट जाते हैं। दूब का रस पीने से पित्त जन्य वमन ठीक हो जाता है। इस घास से प्राप्त रस दस्त में लाभकारी है। यह रक्त स्त्राव, गर्भपात को रोकती है और गर्भाशय और गर्भ को शक्ति प्रदान करती है।

दूब को पीस कर दही में मिलाकर लेने से बवासीर में लाभ होता है। इसके रस को तेल में पका कर लगाने से दाद, खुजली मिट जाती है। दूब के रस में अतीस के चूर्ण को मिलाकर दिन में दो-तीन बार चटाने से मलेरिया में लाभ होता है।

#तुमको_हमारी_उम्र_लग_जाए : श्री गणेश मोदी

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