रावण के दस सिर पर तीर चलाने से कुछ नहीं होगा, नाभि में तीर लगने की प्रतीक्षा करो

मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जब भी बात निकलती है तो उनकी मर्यादा को सिर्फ़ एक दृष्टि में सीमित कर दिया जाता है कि वे एक पत्नीव्रता थे इसलिए वो मर्यादा पुरुषोत्तम थे.

मर्यादा का अर्थ होता है सीमा, सीमा अर्थात अति से बचना, हम जब भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहते हैं तो उसका अर्थ होता है उन्होंने जीवन में कभी भी मध्यम मार्ग नहीं छोड़ा, मर्यादा नहीं तोड़ी, सीमा को पार नहीं किया. बल्कि अपने जीवन की घटनाओं से सबको भी यही सिखाया कि जो कार्य करो मर्यादा में करो.

यदि सीता अपने मन को मर्यादा में रखतीं और स्वर्ण मृग की माया में न फंसी होतीं, तो उनका अपहरण नहीं होता. उसके बाद भी यदि वे लक्ष्मण की खींची रेखा के भीतर रहतीं तो भी उनका अपहरण नहीं होता.

यह बात अलग है कि धरती पर बढ़ती आसुरी शक्ति के विनाश के लिए देवताओं की अपनी योजना होती है और वे अपने ही जीवन में प्रपंच रचते देखे जा सकते हैं. राम से अधिक कृष्ण के जीवन में यह प्रपंच स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं.

हमारे धर्म ग्रंथों में जो भी कहानियां इन अवतारों के साथ जोड़ी गयी हैं वे सब इसीलिए हैं कि हम उनसे कोई न कोई शुभ सन्देश ग्रहण करे. प्रत्यक्ष रूप से सामाजिक सन्देश और अप्रत्यक्ष रूप से आध्यात्मिक सन्देश.

वैसे ही आप यदि अपने मन को उपरोक्त परिभाषित मर्यादा के अनुसार रखते हैं तो आप अपने जीवन में घटित हो रही माया और प्रपंच को देखने में सक्षम हो पाते हैं. और जैसे ही इस प्रपंच के पीछे की योजना समझ आने लगती है हम उसमें अपनी भूमिका को अधिक साक्षी रूप से निभाने की योग्यता प्राप्त करते हैं.

रावण के विनाश के लिए रची गयी मारीच की माया की तरह जीवन में घटित होने वाली हर अच्छी बुरी घटनाओं की माया सिर्फ़ इसीलिए रची जाती है कि आप अपने स्वभाव में छुपे क्रोध, लोभ रूपी आसुरी लक्षणों का विनाश कर अपने अन्दर के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को जागृत करें.

उस राम को जागृत करें जो जब गुरु विश्वामित्र की शरण में जाते हैं तो उनके आदेश पर यज्ञ की सुरक्षा के लिए राक्षसों का सर धड़ से अलग करने में नहीं हिचकिचाते…

उस राम को जागृत करें जो मातापिता की सेवा में समर्पित होते हुए भी, पिता के दिए वचन के पालन के लिए उन्हीं को छोड़कर चौदह वर्ष के लिए वन में चले जाते हैं…

उस राम को जागृत करें जो एक राजा का पुत्र होते हुए भी जंगल में संन्यासी सा जीवन जीने में भी आनंदित है…

उस राम को जागृत करें जो जंगल में रहते हुए भी गुरुओं द्वारा दी गयी शिक्षा दीक्षा नहीं भूलते, और रावण से युद्ध के पहले सारी राजनीतिक तैयारी करके रखते हैं, वो चाहे सुग्रीव से मित्रता हो, विभीषण से संधि हो या हनुमान सा गुप्तचर तैयार करना, अंगद सा मंत्री और वानर सेना से सेवा लेने का कार्य हो…

और ये सारी सांसारिक दिखनेवाली घटनाओं के प्रपंच में पड़ने के पीछे के कारण भी खुद राम को ज्ञात थे, तो उस राम को भी जागृत करें जो स्वयं ही कर्ता है, स्वयं ही कारक और कारण भी, और स्वयं ही परिणाम भी.

आसुरी शक्ति के विनाश के लिए जो राम अपनी पत्नी के अपहरण की योजना बना सकते हैं, उस राम की पत्नी क्या एक मामूली स्त्री हो सकती है? नहीं, उसका आत्मबल इतना प्रबल था कि मात्र एक तिनके के बल पर वो आत्मरक्षा कर सकती थीं.

फिर भी हनुमान के आने पर वह उल्हाना देती है जिसके जवाब में बेचारे हनुमान राम की तरफ से सफाई देते हुए कहने लगते हैं –
जौं रघुबीर होति सुधि पाई। करते नहिं बिलंबु रघुराई।।
रामबान रबि उएँ जानकी। तम बरूथ कहँ जातुधान की।।
अबहिं मातु मैं जाउँ लवाई। प्रभु आयसु नहिं राम दोहाई।।

प्रत्यक्ष सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो हनुमान के हृदय में कितनी पीड़ा है सीता के लिए… वो चाहते तो क्या सीता को अपने साथ लीवा लाना कोई मुश्किल काम था?

लेकिन सीता भी तो राम की धर्म पत्नी होने के नाते इतनी दिव्यता तो रखती ही होगी कि रावण वध के लिए देवताओं की योजना को समझती थी, इसलिए उन्हें अपनी जान बचाकर हनुमान के साथ छुपकर लौटना स्वीकार नहीं था, वे चाहती थीं कि राम डंके की चोट पर रावण का वधकर उसे लेकर जाएं.

बहुत … बहुत… बहुत सूक्ष्म दृष्टि चाहिए होती है “हिन्दू ग्रन्थ” में छुपे संकेतों को समझने के लिए… देवताओं की योजना, माया और प्रपंच में उलझकर भी उससे सुरक्षित बाहर निकल आना और अपना कर्तव्य निभाना किसी राम के ही बस का है, किसी योगी के ही बस का है, किसी मोदी के ही बस का है…

#NOTA का विचार कर रहे हिन्दू राष्ट्रवादियों से बस एक विनती है… आपका क्रोध समझ आता है, आपका प्रेम समझ आता है, आपका समर्पण समझ आता है, वानर सेना की तरह 2014 में आपका राम नाम के पत्थरों के साथ समुद्र पर सेतू बनाना समझ आता है…

बस देश विरोधी आसुरी शक्ति के गढ़ में प्रवेश कर गए हैं… आप क्यों अलग अलग मुद्दों वाले रावण के दस सिरों पर राम को बाण चलाने के लिए कह रहे हैं… प्रतीक्षा करो उस विभीषण की जब वह राम के कान में वही राज़ कहेगा जो वे पहले से जानते हैं कि रावण की जान उसकी नाभि में है….

2019 ही वह समय है जब राम तीर छोड़ेंगे और वह सीधे रावण की नाभि में जाकर लगेगा… तब हम समवेत स्वर में कहेंगे… जय श्री राम!!!

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