ज़रा अलंकृत भाषा में हिटलर हो जाने कहिये, वे आरोप को ही सम्मान समझ लेंगे!

आपको ‘दक्षिणपंथ’ पता नहीं था, लेकिन उन्होंने कहा तुम दक्षिणपंथी हो, इसलिए आपने मान लिया कि आप दक्षिणपंथी हैं।

वो कहने लगे तुम फासिस्ट हो, आप फासीवाद भी नहीं जानते लेकिन आपने मान लिया कि आप फासीवादी हैं।

जब पोलैंड पर नाज़ी हमला कर रहे थे, तब कॉमरेड स्टालिन ही हिटलर के टैंकों में तेल भरवा रहा था। लेकिन जब वो कहने लगे कि तुम नाज़ी गोएबेल्स के उपासक हो तो आपने उनके मित्रों को अपना दोस्त भी मान लिया।

अब उनका मित्र आपके घर आकर तो गुप्तचरों वाले काम ही करेगा न? इसमें आश्चर्य कैसा!

सनातन की विचारधारा में गलत क्या होता है और सही क्या होता है ये आपने सचमुच कभी अपने ग्रंथों से खुद पढ़कर नहीं देखा है। अपने घर रखी रामचरितमानस या भगवद्गीता को भी पहले पन्ने से आखरी पन्ने तक खुद नहीं पढ़ा तो गलती तो आपकी ही हुई। कोई और उसका जो भी अर्थ समझा जाए वो मानने को ही नहीं, उसमें जो नहीं लिखा वो आपको पढ़ा देने की क्षमता तो आपने ही उठा कर उन्हें दी है।

सतोगुण, रजोगुण और तमोगुण तीनों ही सनातनी सिद्धांतों में गुण के रूप में लिखे जाते हैं। रजोगुण होगा तो पैसे, सफलता, मकान जैसी चीज़ों की चाहत होगी। सतोगुण ज्यादा हो जाए तो अपना नुकसान करके भी दूसरों का भला करते रहेंगे। तमोगुण आपको मांसाहार, क्रोध, हिंसा जैसी प्रेरणाएँ देता है।

इनमें से कोई भी सौ प्रतिशत प्रतिबंधित कभी नहीं था, न है। ये तीनों गुण हैं और कम ज्यादा मात्रा में हर मनुष्य में होंगे ही। सनातन सिद्धांत आपको सिर्फ अति से रोकते हैं।

किसी की जान बचने के लिए झूठ बोलना पड़े तो तमोगुण इस्तेमाल होगा ही, लेकिन सतोगुण इतना बढ़ जाए कि किसी की रक्षा के लिए भी आप असत्य न कह पायें, तो सतोगुण भी नुकसान ही करेगा।

इससे सम्बंधित एक कौशिक नाम के सन्यासी की कहानी महाभारत के कर्ण पर्व में श्री कृष्ण ही सुनाते हुए पाए जाते हैं।

तमोगुण इतना बुरा होता तो महाभारत में व्याध गीता भी नहीं होती। रजोगुण की अति में आप पड़ोसी का मकान हड़पने की सोचने लगेंगे। सनातन ऐसी अतियों को प्रतिबंधित करता है।

यहाँ किसी चीज़ को सीधा वर्जित नहीं कहा जाता, अति से रोका जाता है। यहाँ काम प्रतिबंधित नहीं है, लेकिन उसकी अति करते हुए समलैंगिता पर बढ़ जायेंगे तो हिन्दुओं की रीति से विवाह तो प्रतिबंधित रहेगा।

हाँ, संपत्ति और दूसरे विवादों के लिए आप मौजूदा कानूनों का सहारा लें तो दूसरे मज़हबों या रिलिजन जैसा आपका गला रेता नहीं जाना चाहिए।

मांसाहार भी खाने वाले का निजी निर्णय है, लेकिन अति करते हुए कोई कुत्ता या ऐसे जीव खाने लगे तो उसके घर, या उस व्यक्ति के बर्तनों में खाने से मना करने का मेरा अधिकार तो मेरे पास सुरक्षित है।

विचारधारा जैसे मामलों में भी यही सनातनी सिद्धांत चलता है। तमोगुण या रजोगुण की अति आपको राक्षस बना देगी। हमारे पास कोई ईसाइयों जैसा अलग से शैतान नहीं होता। क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार जैसी चीज़ों के बढ़ने पर कोई भी राक्षस हो सकता है।

हिटलर का एक मज़दूर समाजवादी पार्टी बनाना और तथाकथित समाजवादी या साम्यवादी सिद्धांतों के तहत अपने लिए यहूदियों को ‘वर्गशत्रु’ मान लेना ऐसी ही अति थी। उसकी पार्टी का पूरा नाम लेने के बदले उसे सिर्फ ‘नाज़ी’ कहने के पीछे वो स्वयं ही कारण है। हिटलर के दुष्प्रचार तंत्र के कर्ता-धर्ता गोएबेल्स के पुराने मित्रों ने गोएबेल्स से काफी कुछ सीखा।

‘नेम-कॉलिंग’ उनमें से एक है। किसी का नामकरण ‘भक्त’ कर देना, किसी को ‘ट्रोल’ कहना, नित नयी गालियाँ इजाद करते जाना ही नेम-कॉलिंग नहीं है। इसमें असली मकसद को छुपाने के लिए किसी के राजनैतिक दल से ‘समाजवादी’ गायब करके उसे ‘नाज़ी’ कहने लगना भी शामिल होगा।

नेम-कॉलिंग के एक प्रयोग से जहाँ बेइज्जती होती है, दूसरे से भी चरित्र पर आवरण चढ़ जाता है। ऐसा करने के लिए बरसों नकाब में छुपे रहने के गुण चाहिए, लगातार एक ही शब्द दोहराने की, एक ही दिशा से लम्बे समय तक हमला करने की क्षमता भी चाहिए।

बाकी अति प्रतिबंधित है ये ज्यादातर भारतीय लोगों ने पढ़ा ही नहीं, क्योंकि उन्हें पढ़ना नहीं आता था। थोड़ी अलंकृत भाषा में उन्हें हिटलर हो जाने कहिये तो भी क्या? वो आरोप को सम्मान समझ ही लेंगे!

शीघ्र ही अपना निर्णय सुनाएगा इतिहास

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY