सत्ता पाने के लिए हमारे नेताओं का मूक समर्पण

रुपया गिरकर 72 रुपया प्रति डॉलर के पार चला गया है। यूँ तो मुद्रा का गिरना देश की इकॉनमी के लिए अच्छा ही होता है क्योंकि इम्पोर्ट पर लगाम लगती है, एक्सपोर्ट बढ़ता है।

पर इतिहास में कई क्षण ऐसे भी हैं जहाँ रुपया गिरकर देश को कंगाल बनाने के करीब पहुंचा गया था।

तथाकथित आज़ादी भारत को 15 अगस्त को मिली थी। उसके पहले केवल आम जनता ही अंग्रेजो की गुलाम नहीं थी, बल्कि हमारी मुद्रा रुपया भी अंग्रेज़ों के यहाँ बंधक थी।

1931 में अंग्रेज़ों ने रूपये को ब्रिटिश स्टर्लिंग के साथ लिंक किया। यानि स्टर्लिंग अन्य मुद्राओं यथा डॉलर के मुकाबले गिरता था तो उसी अनुपात में रुपया गिरता था। और भारत रूपये के बदले स्टर्लिंग की दर पर किसी भी देश की मुद्रा हासिल कर सकता था।

1939 में जब द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेज़ों ने रूपये की किसी अन्य देश की मुद्रा कन्वर्टिबिलिटी खत्म कर दी। अब भारत और भारतीयों को रूपये के बदले केवल स्टर्लिंग या पौंड मिलते थे वो भी ब्रिटेन के मनमर्जी रेट पर।

भारत के आयात पर बैन लगा दिए गए और अनाज, खनिज, तमाम कमोडिटी के एक्सपोर्ट को बढ़ावा दिया।

नतीजा ये हुआ कि भारत के पास स्टर्लिंग/ पौंड का एक बड़ा भंडार इकट्ठा हो गया। एक बिलियन पौंड से ज्यादा। जो उस ज़माने में बड़ी रकम थी।

ध्यान में रहना चाहिए कि पाकिस्तान आज़ादी के समय भारत से 55 करोड़ लेने के लिए तड़प रहा था और भारत के पास पौंड का रिज़र्व डेढ़ अरब से ज्यादा था।

जब भारत आज़ाद हुआ तो कायदे से उसे अपनी मौद्रिक नीति स्वयं निर्धारित करने की आज़ादी भी होनी चाहिए थी।

लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

वर्ल्ड वॉर के पश्चात इंग्लैंड की अपनी आर्थिक हालत खस्ता थी। अगर वो भारत के डेढ़ अरब पौंड यूँ लौटा देता जिसे भारत अपनी ज़रूरतों को इम्पोर्ट करने में खर्च करता तो इंग्लैंड कंगाल हो जाता।

हालाँकि आज़ादी 15 अगस्त 1947 को मिली। लेकिन भारतीय नेताओं से रूपये की डॉलर एवं अन्य मुद्राओं के कन्वर्टिबिलिटी के नेगोसियेशन्स 1946 से ही चल रहे थे।

उस समय चर्चिल ने धमकी दी थी वो भारत को एक पौंड भी वापस नहीं करेंगे, बल्कि पूरा फॉरेक्स रिज़र्व ही ज़ब्त कर लेंगे।

लेकिन 1946 चुनावों के बाद उन्हें जाना पड़ा और लेबर पार्टी के एटली प्रधानमंत्री बने। उन्होंने इस मुद्दे पर वार्ता को आगे बढ़ाया।

भारत की तरफ से बी के नेहरू मुख्य वार्ताकार थे।

पिछले दस सालों से भारत पर लगी पाबंदियों की वजह से भारत के पास एक भी डॉलर नहीं था, उसके विदेशी मुद्रा खज़ाने में केवल और केवल स्टर्लिंग पौंड थे।

भारत को अपनी तमाम इम्पोर्ट ज़रूरतों के लिए डॉलर चाहिए था। ब्रिटेन की अपनी मुद्रा की हालत डॉलर के मुकाबले बेहद कमजोर थी।

भारत के पास पौंड का जो रिज़र्व था, उसकी असली कीमत पौंड के डॉलर में कन्वर्टिबिलिटी पर निर्भर करती थी।

अंग्रेजो ने इस वार्ता को 1949 तक खींचा। अब वो भारत के फॉरेक्स रिज़र्व को स्क्रैप करने की धमकी तो नहीं देते थे, लेकिन पौंड को डॉलर के मुकाबले अवमूल्यन करने के हिंट सरकाते थे। अफ़सोस भारत के प्रधानमंत्री नेहरू ने इसका कोई हिंट नहीं लिया।

पौंड अगर गिरता तो भारत के विदेशी मुद्रा भंडार की असल कीमत उसी अनुपात में कम हो जाती।

इस वार्ता में फिर अंग्रेज़ों ने दो शर्ते लगाईं।

भारत में तैनात जितने अंग्रेज़ कर्मचारी थे, जो अब भारत से वापस इंग्लैंड आ गए थे, उनके भविष्य की पेंशन राशि भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से काटी गयी।

ब्रिटिश सेना जो हथियार, मिलिट्री का साजो सामान भारत में छोड़ कर आयी थी, भले वो जिस हालत में थे, उसकी खरीद कीमत भारत के पौंड मुद्रा भंडार से काटी गयी।

यूँ 100 करोड़ से ऊपर का पैसा भारत के हाथ से गया।

और फिर 21 सितम्बर 1949 को इंग्लैंड ने पौंड का अवमूल्यन कर दिया।

2.8 प्रति डॉलर से पौंड 4.03 प्रति डॉलर हो गया।

मजबूरन भारत की मुद्रा रूपये का भी उसी अनुपात में अवमूल्यन हो गया।

रुपया 3.3 प्रति डॉलर से 4.7 प्रति डॉलर हो गया।

लगभग 50% अवमूल्यन एक ही दिन में।

आज़ादी की कीमत हमने केवल विभाजन और लाखों शरणार्थियों के खून से ही नहीं चुकाई, बल्कि रूपये में भी चुकाई।

पता नहीं हम कितने कमज़ोर थे।

उस समय का ‘महान’ नेतृत्व, जो हमें दुबारा नहीं मिलेगा, वो कितना दूरदर्शी था और सत्ता पाने के लिए पता नहीं क्या क्या कीमत अदा करने को तैयार था।

सन्दर्भ :

  1. A brief history of the rupee
  2. https://rbidocs.rbi.org.in/rdocs/content/PDFs/90037.pdf

कम से कम 15 साल के लिए आना चाहिए राहुल गांधी सरकार

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