एक अमृत वर्षा और करो प्रभु

व्यक्ति की आइडियोलॉजिकल नींव अक्सर तर्क पर नहीं, भावना की ज़मीन पर खड़ी होती है। बाद में उसका क्रमिक विकास फिर तर्क की दिशा में होता है।

मैं आस्तिक हूँ, पर धार्मिक नहीं हूँ। धर्म में आस्था है पर धर्म का अभ्यास नहीं है। पर अपनी हिन्दू पहचान पर मुझे कोई शंका नहीं है।

पर एक समय यह ऐसा भी नहीं था। बड़े होने के दौर में जब टीनएजर था तो अपनी हिन्दू पहचान भी स्वीकार नहीं करता था।

पता नहीं कहाँ से यह बात दिमाग में घुस गई थी कि हिन्दू होने में क्या खास बात है? मुसलमान के घर पैदा हुआ होता तो मुसलमान हो जाता। क्या फर्क पड़ता? यानि आप आज जितनी सारी बकवास कौमनष्ट वामियों से सुनते हैं, कहीं से दिमाग में घुस गई थी।

एक बार अंग्रेज़ी की परीक्षा में patriotism पर निबंध लिखते हुए मैंने यहाँ तक लिखा है कि विश्व में सभी मानव भावनाओं में संभवतः राष्ट्रभक्ति सबसे खतरनाक भावना है… यह सभी युद्धों का कारण है। क्या फर्क पड़ जायेगा अगर भारत नहीं रहेगा, हम और आप और यह धरती यहीं रहेगी और किसी और नाम से रहेगी… यानि यह समझें कि एक नया नवेला कन्हैया फल फूल के बड़ा हो रहा था…

ऐसा नहीं था कि किसी ने कुछ ऐसा बताया था इन्हीं शब्दों में… बस यह बात उग आई थी अंदर से। भावना के स्तर पर, कन्विक्शन के रूप में। कोई सोचा विचारा, पढ़ा पढ़ाया पाठ नहीं था…

ऐसा ही चला, मेडिकल कॉलेज के पहले दो तीन साल। राम-मंदिर का आंदोलन चल रहा था और मैं कहता था कि वहाँ मंदिर क्यों बनना चाहिए? शौचालय बनवा दो… देश में इतने सारे मंदिर हैं, एक और बनवा कर तुम क्या हासिल कर लोगे?

और पूरे कन्विक्शन से बहस भी करता था मित्रों से। रत्नेश, अजय भारद्वाज, सुनील, हरिकिशोर…ये कुछ मित्र हैं जिनसे इस बारे में बहुत बहस हुई है और इन सबने मुझे बर्बाद माल समझ कर छोड़ दिया था…

पर प्रभु की कृपा होती है तो वे आपको यूँ नहीं छोड़ते…

नवंबर 1992 का समय था। मैं बीमार पड़ गया था। टाइफॉइड था। हॉस्टल के कमरे में पड़ा था। मित्र मंडली ने बहुत सेवा की। मुझे खाना खिलाया, मेरी उल्टियाँ पोछी। दवाईयां लाकर दीं। फिर मेरे घर पर खबर भेज दी।

बाबूजी आये और मुझे अपने साथ लेकर गए। तब तक बुखार उतर चुका था। बाबूजी के साथ मौर्य एक्सप्रेस से राँची से धनबाद जा रहा था। इस बीच दुनिया में क्या हो रहा था इसकी खबर नहीं थी।

रास्ते में, शायद मूरी में कुछ लोग ट्रेन में चढ़े और बहुत उत्तेजित होकर कुछ बात कर रहे थे… उनसे मालूम हुआ कि अयोध्या में बाबरी ढांचा गिरा दिया गया है… वह तारीख थी 06 दिसंबर…

सुन कर जैसे अपने अंदर एक एक लहर सी महसूस हुई। एक असीम गर्व का भाव हुआ। मेरे मुँह से निकला – वाह! मजा आ गया।

उस एक खबर ने, उस एक क्षण ने मुझे बदल दिया। मेरी सोच की पूरी दिशा एक क्षण में बदल गई। और यह परिवर्तन किसी तर्क-वितर्क, किसी वाद-विवाद का परिणाम नहीं था। कोई किताब पढ़ कर या किसी का भाषण सुन कर नहीं आया था। यह भावना के स्तर पर हुआ परिवर्तन था…

व्यक्ति की आइडियोलॉजिकल नींव अक्सर तर्क पर नहीं, भावना की ज़मीन पर खड़ी होती है। बाद में उसका क्रमिक विकास फिर तर्क की दिशा में होता है।

आगे मुझमें बहुत परिवर्तन हुए। गांधी को पूजा, सेक्युलर बना, फिर धीरे धीरे हिन्दू के पक्ष में झुका… और ये परिवर्तन तर्क के प्रवाह में हुए। पर वह पहला परिवर्तन तर्क से नहीं समझाया जा सकता।

रामभक्तों द्वारा बाबरी ढांचा ध्वंस करने के समाचार ने मुझमें कुछ जगा दिया, कुछ जीवित कर दिया। वही बाद में तर्क की खादपानी से विकसित हुआ। मेरे लिए वह क्षण प्रभु श्रीराम का आशीर्वाद है।

कुछ पढ़ा था, लंका का युद्ध समाप्त होने के बाद अमृत-वर्षा हुई थी, जिसमें सभी मृत वानर सैनिक पुनर्जीवित हो गए थे। शायद यह अमृत वर्षा अयोध्या में आततायी बाबर की मस्जिद टूटने पर पूरे देश में भी हुई थी। उसी अमृत की एक बूंद शायद मेरे मन पर भी पड़ी जिसने मेरी आत्मा को जीवित कर दिया।

हे प्रभु… हमारे नेतृत्व की धर्म चेतना भी मृत पड़ी है. तभी उन्हें अपना मार्ग नहीं दिखाई नहीं दे रहा। इस आसन्न संकट में भी प्रभु श्रीराम नहीं याद आ रहे। उनकी आत्मा को भी जीवित करो…एक अमृत वर्षा और करो प्रभु।

भले ही देश के सर्वोच्च पद पर बैठे हों, पर संविधान से बंधे हैं नमो

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