गर्दन तो मुझे-आपको ही कटानी है

इतिहास आज अटल बिहारी वाजपेयी को किस तरह याद करता है?

वो आदमी जिसने बहुत बेहतरीन सरकार चलाई, पर 2004 का चुनाव हार गया।

असल में चुनाव जीतना कभी भी अटल जी के बस का था ही नहीं…

1984 में जब भाजपा की सिर्फ 2 सीट आयी थी तो इस विध्वंस (debacle) के बाद संगठन की एक समीक्षा बैठक हो रही थी… पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे अटल जी।

ज़ाहिर सी बात है कि इतने बड़े debacle पर जवाब तो देना ही पड़ेगा… तब अटल जी ने कहा था कि देखो भैया, ये अध्यक्षी फध्यक्षी अपने बस की है नहीं… अपन तो बस लेक्चर दे सकते हैं…

तभी तो गोविंदाचार्य ने कहा था कि अटल जी तो पार्टी का मुखौटा भर हैं… असली ताकत तो आडवाणी के पास है…

ये सच है कि भाजपा को भाजपा बनाने वाले आडवाणी ही थे जो 80 के दशक की ढुलमुल confused भाजपा को प्रखर हिंदुत्व के रास्ते पर ले गए…

राम मंदिर आंदोलन अकेले आडवाणी जी ने खड़ा किया… अटल जी तो इसके खिलाफ थे… आज भाजपा में जो भी लीडरशिप दिख रही है वो सब आडवाणी जी ने खड़ी की…

2004 का चुनाव जब लड़ा गया तो चुनाव अभियान का steering आडवाणी जी के हाथ में था, पर break और accelerator पर पांव अटल जी के थे…

2004 की हार का खामियाजा देश को 10 साल तक UPA-1 और UPA-2 के रूप में भुगतना पड़ा और देश 50 साल पीछे चला गया…

अब 2019 मुंह बाये खड़ा है। देश फिर उसी दोराहे पर खड़ा है जहां 2004 से ठीक पहले खड़ा था…

तमाम अच्छे काम करने के बावजूद अटल जी 2004 हार गए, जानते हैं क्यों? उत्तरप्रदेश बिहार की जातीय राजनीति को साध नहीं पाए।

आडवाणी जी हिंदुत्व की राजनीति तो जानते थे पर जातीय राजनीति उनके भी बस की नहीं थी। और यूपी बिहार को आप जातीय समीकरण साधे बिना नहीं साध सकते…

जातीय समीकरण ऐसी चीज़ है जिसमें दलित और OBC ये दोनों वर्गों की सैकड़ों उपजातियां हैं… नरेंद्र मोदी – अमित शाह ने इस दलित OBC का एक बहुत बड़ा टुकड़ा (chunk) तोड़ लिया है…

आज मुलायम के पास अहीर और मुसलमान के अलावा कुछ नहीं है… इसी तरह मायावती के पास चमार जाटव और मुसलमान के अलावा कुछ नहीं है…

दलित और OBC वोट बैंक खंड खंड हो के बिखर चुका है जिसका बहुत बड़ा हिस्सा आज भाजपा के कब्जे में है…

इस विशाल वोट बैंक को सिर्फ एक ही चीज़ वापस जोड़ सकती है… आरक्षण और दलित उत्पीड़न… इन दो विषयों में confusion पैदा कर दीजिए, दलित – OBC कुनबा फिर जुड़ जाएगा…

मोदी – शाह… मने सरकार और संगठन के सामने ये चुनौती थी कि इस territory को कैसे बचाया जाए…

आपको क्या लगता है कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद में अध्यादेश ला के, पलटने का फैसला यूँ ही आनन फानन में बिना सोचे समझे ले लिया गया होगा!!!

शतरंज में एक चाल चलने से पहले आगे की 26 चाल तक सोची जाती हैं… इतना बड़ा फैसला क्या यूँ ही ले लिया होगा पार्टी संगठन ने?

कौन खुश होगा, कौन नाराज़ होगा, क्या नफा होगा, क्या नुकसान होगा, कौन कैसे प्रतिक्रिया देगा, सवर्ण क्या करेंगे, कैसे react करेंगे…

फैसला कब लेना है, अभी लेना है या मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ के बाद लेना है, सवर्ण अगर नाराज होंगे तो कितना होंगे… उनको कैसे मनाना है…

किसी भी घटना का cooling period कितना होता है, राजनीति में किसकी कितनी औकात है… ये सब तो सोचा ही होगा पार्टी ने…

युद्ध में सिर्फ और सिर्फ एक चीज़ महत्वपूर्ण होती है… विजय

युद्ध का एकमात्र लक्ष्य होता है… विजय

क्या नुकसान हुआ, कितने जिये, कितने मरे, इसका कोई महत्व नहीं… सिर्फ एक चीज़ matter करती है युद्ध में… विजय

सारी पलटन शहीद हो गयी पर विजय मिली… इसकी वैल्यू है, महत्व है।

सारी पलटन सुरक्षित है, किसी का बाल भी बांका न हुआ… पर युद्ध हार गए… इसका कोई महत्व नहीं…

उस ज़िंदा पलटन को ले के चाटना है क्या, जो युद्ध हार के आयी?

2019 में किसी को तो गर्दन कटानी ही पड़ेगी… आज देश के सामने जो भी चुनौतियां हैं उनको सिर्फ एक ही सरकार handle कर सकती है… मोदी सरकार…

राष्ट्र और हिन्दू, ये दोनों अगर किसी राज में सुरक्षित हैं तो वो मोदी राज में… 2019 में ये मोदी राज repeat हो इसके लिए किसी को गर्दन तो कटानी ही पड़ेगी…

आज तक किसी युद्ध मे दलितों ने गर्दन कटाई है क्या? गर्दन तो मुझे आपको ही कटानी है।

2019 मोदी का है! जानिए, क्यों और कैसे?

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