कम से कम 15 साल के लिए आना चाहिए राहुल गांधी सरकार

2004 में हम अटल सरकार से आजिज थे। प्याज महंगा था। 2019 में मोदी सरकार से भी आजिज आ चुके होंगे। sc/st एक्ट या कोई भी बात हो सकती है।

2004 में कांग्रेस आयी थी। भरा खज़ाना था। 2004 में अटल सरकार शाइनिंग इंडिया का प्रचार कर रही थी, जो ज़मीन पर नहीं था। किसी को दिखाई नहीं दे रहा था।

लेकिन अगले पांच साल दिखा, खूब दिखा। कांग्रेस ने उन्ही योजनाओं, भरे खज़ाने के चलते 2009 में पुनः विजय पायी।

फिर पता चला खज़ाना लुट रहा है। मनमोहन सरकार के पास अपना कोई विकास का कार्यक्रम, योजना नहीं थी। अटल सरकार की कमाई कब तक खाते!

अंतिम तीन साल मनमोहन सरकार पॉलिसी पैरालिसिस का शिकार रही।

और 2014 में मोदी सरकार आयी, सबका साथ सबका विकास के नारे के साथ।

अटल जी तो अपने देश के साथ पाकिस्तान का भी विकास चाहते थे, सबसे अच्छे सम्बन्ध चाहते थे। मोदी सरकार भी उसी राह की निकली। आखिर दोनों ही सरकारें संघ द्वारा दीक्षित थीं।

मोदी सरकार भी समाज के सभी अंगों के विकास पर काम करती रही।

लेकिन ज़मीन पर दिखाई कुछ भी नहीं देता।

आखिर अटल सरकार के समय कौन सी फोर लेन सड़कें दिखने लगीं थीं जो आज देश भर में फैल चुकी हैं।

मोदी सरकार भी पेट्रोल डीज़ल के बढे दामों, फाइनेंशियल अनुशासन से खज़ाना भर रही है।

अगली बार राहुल सरकार आएगी। फिर वही कहानी दोहराई जाएगी।

पर इस बार राहुल सरकार को कम से कम 15 साल तो रहना ही चाहिए।

पहले दस साल सरकारी खजाना लुटे।

फिर अगले पांच साल क्या लुटेगा?

पश्चिम बंगाल में जब वाम मोर्चे ने सब खज़ाना खाली कर दिया। त्रिपुरा में सब खत्म हो गया। तब वहां नेताओं ने एक स्पेशल स्कीम चलाई।

पोंजी स्कीमें, शारदा चिट फंड जैसी। जिसमें गरीब जनता एक-एक दो-दो हजार इन्वेस्ट करती है। गरीब जनता इतना ही दे सकती है।

जैसे हम राजीव गाँधी के समय कुबेर में लगाते थे। यूकेलिप्टस पेड़ो में लगाते थे।

न जाने कितने चिट फंड चलते थे। कितनी स्कीमें 3 साल में पैसा डबल। सहारा भी तो तभी की कंपनी है। राजीव, वी पी सिंह, चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, गुजराल, देवेगौड़ा के समय की।

सरकारी खज़ाना खत्म होगा तब हमारा नंबर आएगा। तब तक हथियार खरीदने, सड़क बनाने, खान खनिज स्पेक्ट्रम बेचने, इम्पोर्ट एक्सपोर्ट के नाम पर लूट चलेगी।

इस बार राहुल सरकार…

साठ साल का स्वर्ग बनाम इन चार सालों का नर्क… इसीलिए इस बार कांग्रेस सरकार

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