आप का क्या होगा जनाबे आली?

क्या हम भूतकाल से भविष्य के लिए कुछ सीखते भी हैं? या फिर सब बातों को वर्तमान के निकषों पर ही नापते हैं?

एक उदाहरण देता हूँ जिसपर चर्चा प्लीज़ न करें, यह बस समझ को समझने के लिए है।

‘सरदारजी और बारह बजने पर जोक्स बहुत होते थे। फिर एक कहानी प्रसृत होने लगी, एक वीडियो भी आया। जहां बताया गया था कि बारह बजने का संबंध मुगलों ने अपहरण की हुई बहन-बेटियों को रात को धावा बोलकर छुड़ाने से था।’

मैंने कहा यह कहानी झूठ है। कई लोग मुझसे उलझ गए, पूछा कैसे? मैंने बताया कि तब बारह नहीं बजते थे। इससे तो वे उग्र भी हो गए। तो फिर कितने बजते थे?

इसका उत्तर सरल था कि उस समय कालमापन प्रहर, घटिका, पल में होता था, यह 24 घंटों की याने दिन में दो बार बारह बजने की प्रणाली अंग्रेज़ शासन के पूरे लागू होने के बाद आई है। तब मुगल खत्म हो चुके थे और सिक्ख भी मुगलों से ताकतवर होकर मिट भी चुके थे। तो ये बारह बजे का किस्सा गलत है। कुछ और होगा जो हमें पता नहीं। और जानने की ज़रूरत भी नहीं। घटिया मज़ाक बनाना सही नहीं। अत: इस बात को लेकर कोई चर्चा नहीं करनी।

यह किस्सा केवल इसीलिए बताया कि चूंकि कई साल से यहाँ 24 घंटों की काल गणना लागू है तो हम इस किस्से का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य सही है या नहीं, यह सोचना भी भूल गए। तब आठ प्रहरों का दिन होता था यह किसी को मालूम न था और सोचने की ज़रूरत भी महसूस नहीं हुई। “तो, तब रात के बारह नहीं तो कितने बजते थे?” कहकर बहस कर ली।

आज यह क्यों याद आया इसका भी कारण समझ लीजिये।

कहीं कहीं फेसबुक पोस्ट्स लगाए जा रहे हैं कि 2019 में मोदी अगर हारे तो क्या होगा? दुनिया पहले भी चल ही रही थी, आगे भी चलेगी। इसी का उत्तर देने के लिए यह लेख है।

ये भ्रम है। दुनिया आगे चलेगी, लेकिन वैसे नहीं चलेगी। क्योंकि मोदी आने से जो हुआ, जिनको तकलीफ हुई वो तकलीफ मोदी से नहीं हुई। तकलीफ उन लोगों से हुई जिनको मोदी के आने से हिम्मत मिली और उन्होने सर उठाया। इसलिए उन लोगों का बंदोबस्त किया जाएगा, पूरा बंदोबस्त किया जाएगा और फिर देश कैसे चलेगा उसका कोर्स सेट किया जाएगा।

भारत में इस्लाम का जगह जगह शासन आया उसके पहले भी देश चलता था, बाद में भी चलता रहा। लेकिन पहले जैसा नहीं। बहुत बदलाव हुए। फिर अंग्रेज़ का राज आया और गया। लेकिन देश के चलने में फिर से बहुत सारे बदलाव कर के गया।

अटलजी के समय काँग्रेस को हटाने के कारण दूसरे थे। तथा नरसिंह राव या उनके पहले राजीव गांधी के कार्यकाल में जो भी बदलाव हुए उसकी जानकारी समग्र भारत को कम ही थी। इंटरनेट नहीं था और सोशल मीडिया था ही नहीं।

2014 में सोशल मीडिया की भूमिका मोदी जी की जीत में रही या काँग्रेस की हार में रही यह सोच लीजिये। और आज स्मार्टफोन्स की कीमतें घटने से और जियो के सस्ते नेट के कारण सोशल मीडिया की व्याप्ति 2014 से कई गुना बढ़ गई है।

अटलजी के कार्यकाल में जनता और शासन की कार्यप्रणाली में कोई खास मौलिक बदलाव नहीं हुए जो मोदी जी के चार सालों में हुए हैं। प्रशासन पहले के ही ढर्रे पर चलता रहा जिसकी लोगों को भी आदत हो चुकी थी।

जानता हर कोई था कि यह भ्रष्टाचार है लेकिन तब तक वो दस्तूर बन चुका था और हर कोई इसी व्यवस्था का अंग बनकर उसका लाभार्थी बनना चाहता था। अपनी मेहनत को अप्रोच और घूस का जोड़ देकर लाभार्थी बन भी रहा था। मोदी जी के आने तक यही चलता रहा। जन जीवन का अविभाज्य अंग बन गया और प्रतिष्ठा भी पाने लगा।

मोदी जी आने से जो बदलाव हुए हैं वे दिख रहे हैं। इसमें कई लोगों को फायदा होना बंद हुआ और कइयों को नुकसान भी हुआ। और ये कई सारे लोग कोई मंगल ग्रह निवासी नहीं हैं। ये हमारे ही मित्र हैं, परिचित हैं और परिवार भी हैं। उन लोगों से भविष्य में हमें तरह तरह की अपेक्षाएँ भी थी।

यही कारण है कि यह जानते हुए भी कि वे भ्रष्ट हैं, गुस्सा हमें मोदी जी पर आ रहा है क्योंकि उन्होने जिनका नुकसान किया है वे हमारे मित्र, हमारे रिश्तेदार है। कुछ तकलीफ़ें हमें भी हुई हैं। हमारी मोदी जी से यह अपेक्षा नहीं थी, हम उनसे बहुत कुछ और ही चाहते थे। हम दिल से चाहते ज़रूर थे कि भारत सुधरे लेकिन ऐसा कुछ नहीं जो मोदी जी ने किया है।

अजातशत्रु अटलजी से सभी खुश थे क्योंकि उन्होने किसी से शत्रुता मोल नहीं ली। मोदी जी का ऐसा नहीं है, सिस्टम बदलने में बहुत पंगे लिए हैं। फिर भी मानों कुछ नहीं लिए हैं। सिस्टम की ताकत जानते हैं, इसलिए फूँक फूँक कर चल रहे हैं। जिसमें जनता उन्हें डरपोक भी कह रही है लेकिन चूंकि वे सिस्टम की ताकत भी जानते हैं और अपने टीम की क्षमता भी जानते हैं, डेयरिंग कम ही दिखा रहे है।

सिस्टम को डर यही है कि अगर यह आदमी दुबारा आया तो उस वक्त बड़े पंगे लेगा। पाँच साल तो सिस्टम ने ऐसे तैसे बर्दाश्त किया, मान लो ये लोकतन्त्र की पाँच साल की साढ़ेसाती है, एक बार झेल लो, आगे अपना ही राज है। लेकिन जैसे मोदी जी की लोकप्रियता बढ़ने लगी है तो कई खेल दिखने चालू हुए हैं।

2019 का लोकसभा चुनाव, महज एक इलैक्शन नहीं है। युद्ध है, भारतीयों का और वह केवल यवनों की दासता से नहीं बल्कि उस सांस्कृतिक दासता से है जो हमारे बीच पनप कर करियर के नाम से प्रतिष्ठित हो चुकी है। पर क्या जातियों में खंड खंड बंटा ये समाज, आक्रांताओं के किराए के टट्टुओं (mercenaries) से अपने भारतीयत्व की रक्षा कर पाएगा?

उनको यहाँ स्थिर होना था, और उन्होंने इसलिए वही किया जिसका चाणक्य को डर था – व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ने वाली संस्कृति को उनके द्वारा निर्मित समस्याओं का मूल बताकर उसे नष्ट करने का प्रयास करना। अबतक पूर्ण सफलता नहीं मिली थी, बहुत करीब थे जब मोदी जी उनके लिए विघ्न बन गए।

ग्रीक महाकाव्य ओडेसी में एक प्रसंग आता है जहां समुद्र में मार्ग भटके ओडिसियस को बताया जाता है कि फलाना द्वीप पर जाओ और पितरों के लिए एक भेड़ की बलि देकर हवन करो। पितरों का आह्वान करो। वे आएंगे, लेकिन तुम्हें सब को रोकना है। उनमें से केवल तिरेसियास तेरे काम का है, इसलिए पहले उसे ही हविर्भाग लेने देना। जब वो तृप्त हो जाये, तब वो तुम्हें सही मार्ग बता देगा। उसके बाद ही बाकी पितरों को हवि लेने देना। उनमें तुम्हें बहुत सारे परिचित और परिजन मिलेंगे, लेकिन तुम्हें सब को रोकना है, जब तक तिरेसियास को संतुष्ट कर के मार्गदर्शन न पा सको।

ओडिसियस वैसे ही करता है। कठिन होता है यह उसके लिए, क्योंकि उन आत्माओं में मित्र तो होते ही हैं, उसकी माँ भी होती है। उसे पता ही नहीं होता उसकी मृत्यु का, क्योंकि जब वो युद्ध को निकला था तब वो जीवित थी। व्याकुल होता है लेकिन फिर भी, ध्येय से डिगता नहीं है।

2019 में मोदी जी को आप हराएंगे तो भी देश तो चलेगा ही। कैसे चलेगा, या पहले जैसे कॉंग्रेस स्टाइल से चलेगा यही आप को चुनना है। मोदी जी का क्या है, यह गाना गाते निकल लेंगे…

अपने आगे ना पीछे
ना कोई ऊपर नीचे
रोनेवाला!

आप का क्या होगा
जनाबे आली
आप का क्या होगा?

महज़ आम चुनाव नहीं, अस्तित्व का महासंग्राम है 2019

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