क्या जल्द ही इतिहास बन जाएंगे हम!

जितने राजपूतों ने मुगलों का साथ दिया था, उसके आधे भी सिर्फ महाराणा प्रताप के साथ खड़े हो जाते तो अकबर को यमुना में डूब मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

क्या आप जानना चाहते हैं कि हम कैसे गुलाम हुए?

इतिहास पढ़ने की आवश्यकता नहीं, इसे सोशल मीडिया से समझा जा सकता है।

यहां इतने मठ और मठाधीश हैं कि इतनी तो रियासतें भी नहीं थीं।

और नोटा-पोटा-लोटा-मोटा-छोटा के ऐसे-ऐसे कुतर्क कि शास्त्र भी भाग खड़े हों।

ऐसी ही हम हज़ार साल गुलाम अकारण नहीं बने रहे।

आजादी के बाद की स्थिति तो और अविश्वसनीय है।

अपने अब तक के तमाम सत्ताधारियों की सूची बनायें और उन्हें निष्पक्ष भाव से विश्लेषित करें तो पायेंगे कि, स्वतंत्रता के बाद भी हमारी गुलामी कैसे और क्यों बरकरार रही।

ध्यान रहे चाणक्य ने धनानंद से बदला लेने के लिए सिकंदर के साथ कभी दोस्ती नहीं की थी। ना ही कभी किसी बाहरी को अपने देश में सत्ता की भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

चाणक्य नीति की दूरदृष्टि ने भारत के चन्द्रगुप्त का स्वर्णिम-काल दिया, जिसे फिर अशोक भी अपने आगे की पीढ़ी को नहीं सौंप पाए, बेशक फिर हम चाहे उन्हें महान मानते रहें।

देश को कभी फिर चाणक्य नहीं मिला, और हम गुलाम होते चले गए।

आज के चाणक्य तो कभी नोटा दबाते हैं, कभी सोटे से भारत बंद करवाते हैं।

जितने राजपूतों ने मुगलों का साथ दिया था, उसके आधे भी सिर्फ महाराणा प्रताप के साथ खड़े हो जाते तो अकबर को यमुना में डूब मरने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

लाहौर और कराची के व्यापारियों ने अगर चाणक्य की अर्थनीति के व्यवहारिक पक्ष और उसकी शक्ति का सही समय पर सदुपयोग किया होता तो दुनिया की कोई राजसत्ता उन्हें अपने ही घर से पलायन होने के लिए मजबूर नहीं कर सकती थी।

क्या यह बतलाने की आवश्यकता है कि राजनीति बिना धन के नहीं चल सकती, यहां तक कि मजहबी-धर्म के केंद्र में भी अर्थ ही है।

महल हो या झोपड़ी, बंटवारे के बाद छोड़कर भागे तो मनु के चारों बेटे थे, मगर विडंबना ही कहेंगे कि अगली पीढ़ी आते आते हम सब भूल गए।

अब भी हम कहाँ समझ पा रहे हैं… हम संभल कर खड़े तो बड़ी मुश्किल से हो पाते हैं मगर फिर अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारने में जरा भी देर नहीं करते।

अपने ही घर को आग लगा कर ताली पीटने वाले, हम दुनिया में एकमात्र अजूबे हैं।

राम का मंदिर नहीं बना तो हम रावण को सत्ता सौप सकते हैं।

जबकि रावण तब भी बहुरूपिया था, रावण आज भी अनेक रूप धर के मंदिर मंदिर घूम रहा है।

समय आशंकित है कि भारत में सत्ता का हरण एक बार फिर ना हो जाए।

इतिहास बैचैन है कि उसे अपने आप को हिंदुस्तान में ही बार बार क्यों दोहराना पड़ता है।

मगर डर तो इस बात का अधिक है कि हम सब स्वयं जल्द ही इतिहास ना बन जाएँ।

क्या हम बच पाएंगे?

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