सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है – भाग 3

SC/ST एक्ट जैसे कानून पर सवर्णों के मुखर विरोध पर मायावती, अखिलेश, ममता, राहुल की चुप्पी के क्या मायने है?

“क्या हमें यह अधिकार है कि हम अपने दलित भाइयों का नुकसान पहुंचाएं?”, एससी एसटी एक्ट में संशोधन के विरोध में बुलाई गई रैली में कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने सार्वजनिक मंच से यह प्रश्न पूछा।

क्या ऐसा प्रश्न मायावती, अखिलेश, ममता, राहुल हमारे दलित भाइयों से पूछ सकते हैं कि वे अपने सवर्ण भाइयों को जानबूझकर गलत आरोप में ना फसांये? तथा साथ में वे यह वचन लें कि मोदी सरकार के द्वारा एससी एसटी एक्ट में लाए गए संशोधन का पुरजोर विरोध करेंगे और सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा लाए गए निर्णय को बहाल करेंगे।

नहीं। इन नेताओं की चुप्पी हमें क्या सुना रही है?

प्रश्न यह उठता है कि इन नेताओं की सोच क्या है? उनका हमारे राष्ट्र के बारे में क्या विज़न है? क्या उनके विचार भारत के बहुसंख्यक लोगों को प्रेरित करते हैं? क्या उन्होंने ऐसा कोई उच्च विचार प्रस्तुत किया जो सभी भारतीयों की भलाई और प्रगति के बारे में हो?

क्या वे सभी समुदाय और महिलाओं को प्रेरित कर सकने की क्षमता रखते हैं? ऐसी क्या बात है कि उनके विचार आज के युवाओं और युवतियों की आगे बढ़ने की महत्वाकांक्षा को संबोधित नहीं करते?

मैं यह क्लेम तो कर ही सकता हूँ कि मैं फ्रांस के राष्ट्रपति एमानुएल माक्रों के साथ पढ़ा हूँ और उनकी जीवन-यात्रा को नज़दीक से देखा है।

क्या बात थी कि 39 वर्ष की आयु में उन्हें फ्रांस की बहुसंख्यक जनता ने राष्ट्रपति चुन लिया (फ्रांस का राष्ट्रपति जनता चुनती है)?

क्या विज़न था उनका? ऐसा क्या प्रोग्राम था उनका कि शहरी जनता, किसान, फैक्ट्री वर्कर, छात्र, महिलाओं, सभी के वोट उन्हें मिल गए, एवं अनुभवी अधेड़ और प्रौढ़ नेतागणों को उन्होंने पछाड़ दिया?

कैंडिडेट माक्रों ने फ्रांस के सभी युवाओं को यह बतलाया कि उन्हें बेरोजगारी क्यों झेलनी पड़ रही है? माक्रों के अनुसार, अगर कोई प्राइवेट कंपनी किसी युवा को जॉब देती है, तो फ्रांस के नियमानुसार उस कर्मचारी को जॉब से नहीं निकाला जा सकता, भले ही कंपनी को घाटा हो रहा हो, या कंपनी के उत्पाद की लागत अन्य प्रतियोगियों से महँगी हो।

माक्रों ने समझाया कि कैसे यह नियम नयी कंपनी और उद्यमों को फ्रांस में आने से रोकता है, कैसे यह नए लोगों को जॉब देने में असहायक सिद्ध होता है क्योंकि कंपनियों को डर लगता है कि वे किसी भी कर्मचारी को नहीं निकाल पाएंगे भले ही कंपनी दिवालिया हो जाए।

उन्होंने कहा कि अगर वह राष्ट्रपति बन गए तो वह नौकरी पर रखने और निकालने के नियम में ढील दे देंगे। ध्यान दीजिये – माक्रों क्या कह रहे है?

यह सिर्फ एक उदाहरण है। ऐसी बहुत सी बातें हैं जिसमें माक्रों ने सभी फ्रेंच नागरिकों को कठिन निर्णयों के लिए आगाह किया और फ्रांस को आतंकी हमले से सुरक्षित करने का विश्वास दिलाया।

इसके विपरीत, हमारे विपक्ष के नेता सिर्फ और सिर्फ जातिवाद और आरक्षण की बात कर रहे हैं। उनका पूरा प्लेटफार्म ही इस बात का है कैसे ‘उनकी’ जाति वालों को आरक्षण मिल सके, कैसे सेकुलरिज़्म के स्लोगन पर भारत के बहुसंख्यक समाज का मज़ाक उड़ा सकें, कैसे किसी एक समुदाय या वर्ग की तुष्टि कर सकें।

दूसरे शब्दों में, उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि वे भारत के सभी – सभी – युवाओं को कैसे रोज़गार उपलब्ध कराएँगे, उसके लिए क्या कठिन निर्णय करने होंगे, कैसे प्रदूषण कम करेंगे और साथ ही उद्योगों का विकास करेंगे?

कैसे किसानों को उनके उत्पाद का अधिक मूल्य देंगे, साथ ही उपभोक्ताओं को सस्ता अन्न उपलब्ध कराएँगे? कैसे स्वच्छ और भ्रष्टाचार मुक्त प्रशासन देंगे?

कैसे सड़के बनवाएंगे, रेलवे का विकास करेंगे, मेधा पटकर के विरोध के बावजूद सिंचाई की व्यवस्था करेंगे, और विदेशी धन पर पलने वाले एनजीओ से मुकाबला करेंगे जो भारत के विकास में अपने आकाओं के इशारो पर बाधा डाल रहे हैं?

आरक्षण को उनके ही अभिजात्य वर्ग ने कब्जिया लिया है। एक ही खानदान की चौथी पीढ़ी आरक्षण का मज़ा ले रही है। इसमें संशोधन की आवश्यकता है, जिससे उन्ही शूद्र और पिछड़े वर्ग के वंचित लोगों को आरक्षण का लाभ पहली बार मिले। इसके बारे में उनके क्या विचार है?

कैसे सीमा पार से आने वाले आतंकवाद का मुकाबला करेंगे? कैसे जम्मू और कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद से निपटेंगे? कैसे पड़ोस के फर्जी ‘साम्यवादी’ देश के खतरे से मुकाबला करेंगे?

अंत में, कैसे इस बात को सुनिश्चित करेंगे कि राजनीति से वंशवाद को दूर किया जा सके? क्या इन नेताओ के पास कोई बोल्ड विचार है, जिससे वे सभी भारतीयों के विचारों को प्रभावित कर सकें?

मुझे राष्ट्र के विकास के बारे में, उन्नति के बारे में, सभी भारतीयों की प्रगति के बारे में उनके विचार जानने की उत्सुकता है। इन नेताओं की चुप्पी में ही उनकी धृष्टता और वैचारिक दिवालियेपन का राज़ छुपा है।

सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है – भाग 2

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