सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है – भाग 2

अगर भारत में इतनी बेरोज़गारी है तो प्रधानमंत्री मोदी के आने के बाद 'बेरोज़गार' युवाओं ने समूचे भारत में एक भी बड़ा प्रदर्शन क्यों नहीं किया?

प्रश्न : बहुत से लोग है जिनको रोज़गार की आवश्यकता है और पद भी खाली हैं तो क्यों इतने साल से नौकरियां नहीं आ रही हैं?

उत्तर : आपको क्यों लगता है कि सरकार उन खाली पड़े पदों को भरकर वाहवाही नहीं लूट रही है? सबसे आसान कार्य है खाली पड़े पदों को भरना। लेकिन अगर उन खाली पदों की आज के डिजिटल अर्थव्यवस्था में आवश्यकता ही ना हो, तो?

या फिर, वे पद मुलायम एंड कंपनी ने अपने भाई-बंधुओं को नौकरी देने के लिए हाल ही में क्रिएट किये हों जिनकी वास्तव में कोई आवश्यकता ही ना हो और एक तरह से वे सभी पद हमारे टैक्स की बरबादी हो?

क्या आप ऐसा प्रधानमंत्री चाहते हैं जो चुनाव जीतने के लिए हमारे कर से जुटाई निधि को उड़ा दे?

जिस देश की जनसंख्या करोड़ों में थी, जिस देश में विश्व की दूसरी सबसे बड़ी जनसंख्या रहती हो, वहां पर काँग्रेसियों ने गिनती के गिने-चुने आईआईटी, आईआईएम और एक AIIMS बना दिया। एक तरह से जनता को लॉलीपॉप पकड़ा दिया कि देखो यह तुम्हारे लिए बना है लेकिन इन में एडमिशन कुछ गिने-चुने परिवार के बच्चों को ही मिल पाता था।

असली खेल समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता के नारे के पीछे हो गया। सारी अर्थव्यवस्था, राजनैतिक और न्याय व्यवस्था पर नेहरू के वंशजों और उनके द्वारा पोषित अभिजात्य वर्ग ने कब्जा कर लिया।

90% नौकरी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में थी, यानी कि रोज़गार के बदले ना तो स्वास्थ्य इंश्योरेंस, ना ही पेंशन और ना ही कोई बहीखाता। जब चाहे आप को नौकरी से निकाल दिया जाए। दूसरे शब्दों में, आपकी नाराज़गी सिर्फ कुछ प्रतिशत सरकारी नौकरियों को लेकर है, बाकी 90-95 प्रतिशत रोज़गार से आपको कोई वास्ता ही नहीं है।

रेल मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में रेलवे में कुल 13.08 लाख कर्मचारी है। इन कर्मचारियों की संख्या 2015-16 में 13.30 लाख थी; लेकिन वर्ष 2011-12 और 2012-13 के दौरान रेलवे में केवल 13.06 लाख कर्मचारी थे। तो, UPA और NDA सरकार के दौरान कर्मचारियो की संख्या एक समान ही रही। हाँ, वर्ष 1991-92 में कुल 16.52 लाख कर्मचारी थे, जो धीरे-धीरे कम हो गयी।

अब आते है बैंकों के कर्मचारियों की संख्या पर। रिज़र्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2016-17 में सभी बैंकों – जिसमें सरकारी, प्राइवेट और विदेशी बैंक शामिल हैं – में कुल 13 लाख (13,01,703) कर्मचारी थे। वर्ष 2015-16 में कुल 12.56 लाख (12,56,085); वर्ष 2012-13 में 11 लाख (10,96,980 ) कर्मचारी थे। अतः इनके संख्या बढ़ी ही है।

लेकिन समस्या इनके घटने-बढ़ने की नहीं है। समस्या यह है कि हर महीने भारत में दस लाख युवक और युवतियां एम्प्लॉयमेंट मॉर्केट में आ रहे हैं। लेकिन सभी बैंकों में कुल रोज़गार केवल 13 लाख है. यानि कि एक वर्ष में केवल 40 से 50 हज़ार (एक महीने में लगभग 4000) लोगो को बैंक में जॉब मिलेगा।

एक महीने में दस लाख रोजगार चाहने वालों के लिए बैंक में कुल 4000 नौकरियां।

यह है समस्या का असली चेहरा, जो सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है।

क्या इतने युवाओं को रोज़गार सरकारी नौकरी में मिल जाएगा? क्या सरकारी क्षेत्र हर महीने 10 लाख रोजगार दे सकता है? या, क्या स्वतंत्रता के बाद कभी भी सभी युवाओं को भारत में सौ प्रतिशत रोजगार मुहैय्या हुआ है? नहीं।

तब फिर उपाय क्या है?

पहले तो यह समझिये कि सरकारी क्षेत्र में सभी के लिए नौकरियां नहीं हैं। कृषि में भी नौकरी नहीं है क्योकि भारत अब कृषि प्रधान देश नहीं है। कृषि हमारी अर्थव्यवस्था का 12% है, जब कि 52% लोग कृषि पर आश्रित हैं.

सरकार के आर्थिक सर्वेक्षण पिछले दो दशकों से यह परिवर्तन रिपोर्ट कर रहे हैं कि कृषि का रोल ग्रामीण आय और देश की अर्थव्यवस्था में कम होता जा रहा है। इसलिए कृषि में लगे हुए अधिकतर किसान गरीबी में रहने को अभिशप्त हैं।

तो नौकरी कहाँ से आएगी? वो आएगी उद्यम से, निजी क्षेत्र से, इनोवेशन या नई खोज से। देखते-देखते डिजिटल इकॉनमी, सॉफ्टवेर इंडस्ट्री, एप्प्स, सेल फ़ोन, ओला और उबेर टैक्सी, Airbnb, ऑनलाइन शॉपिंग, इलेक्ट्रिक कार, सर्विस सेक्टर (ब्यूटी पार्लर, स्वास्थ्य, वकील, रेस्टोरेंट, ट्रासपोर्ट, mass media, विज्ञापन, प्रॉपर्टी इत्यादि) में वृद्धि हो रही है; अरबों खरबों की इकॉनमी हो गई है।

तभी प्रधानमत्री मोदी जी का ज़ोर मेड इन इंडिया, डिजिटल इकॉनमी और मुद्रा योजना पर है… क्योकि अब नए रोज़गार इन्ही क्षेत्रो से आयेंगे.

इसी तरफ प्रधानमंत्री मोदी ने भी इशारा किया था जब उन्होंने कहा कि “एक दशक पहले की स्थिति के ठीक विपरीत अब भारत के प्रतिभाशाली युवा महज ज्यादा तनख्वाह वाली नौकरियों के पीछे नहीं भाग रहे हैं। इसके बजाय इन युवाओं ने अब जोखिम उठाना शुरू कर दिया है और वे उद्यमी बनने को तरजीह दे रहे हैं”।

सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है : भाग 1

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