क्या ऐसे आदमी का कृतज्ञ नहीं होना चाहिए राष्ट्र को?

पिछले दिनों दिल्ली में समर्थ स्टडी सर्कल और जम्मू-कश्मीर स्टडी सर्कल के संयुक्त तत्वावधान में गिलगित बलतिस्तान पर एक कार्यक्रम हुआ था।

उसमे मैंने अपनी लेह लद्दाख यात्रा के अनुभव शेयर किये थे। उस यात्रा में मैं तुर्तुक और त्याक्षी इत्यादि गाँवों में बलती लोगों से मिला था… इस व्याख्यान का वीडियो समर्थ स्टडी सर्कल ने शेयर किया है।

उस वीडियो में मैंने श्रोताओं को बताया है कि कैसे उस इलाके के लोगों को भारतीय सेना अपने बच्चों की तरह पालती है… बच्चों के लिए goodwill स्कूल चलाती है… इसके अलावा दूर दराज के इलाकों में उनको स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराती है।

इस पर एक मित्र ने टिप्पणी की है कि कितनी Pampering (पुचकार के या लाड़-प्यार से रखना/ मक्खन लगाना) करनी पड़ती है न?

मैंने पूरे 17 दिन लाहौल स्पीती और लेह लद्दाख में बिताये… उस पूरे सफ़र में यूँ लगता था मानो मैं Rope Walk कर रहा हूँ… रस्सी पर चलने जैसा था वो सफ़र…

अगर कहीं फंस गए, कहीं कोई breakdown हो गया, तो मदद कहाँ से मिलेगी? इतना विशाल विस्तृत क्षेत्र, एकदम बियावान सुनसान… पचासों किलोमीटर तक आदमी तो छोडिये, परिंदा तक नहीं…

मौसम इतना निर्मम कि कब जान ले ले कोई पता नहीं… 12,000 से ले 18,000 फीट तक की ऊंचाई पर बसा… जहां सांस लेने तक के लाले हों… साल के 8 महीने शेष दुनिया से कटा हुआ…

कोई बेसिक सुविधा तक नहीं… न बिजली, न फोन, न नेटवर्क, न इन्टरनेट… ऐसे सुनसान बियावान इलाके में एक आदमी रहता है। उसकी कोई अपेक्षा Expectation नहीं, समाज से या सरकार से कोई शिकवा शिकायत नहीं… क्या ऐसे आदमी का धन्यवादी नहीं होना चाहिए राष्ट्र को?

आज लेह लद्दाख के इन दुर्गम दूरदराज के इन इलाकों में वहाँ की स्थानीय पॉपुलेशन ही भारतीय सेना का सबसे बड़ा सहारा है… वो इन्हें Local support देते हैं, Helping staff के रूप में काम करते हैं, Logistic support देते हैं…

Army का राशन और arms ammunition अग्रिम चौकियों तक पहुंचाते हैं… army के आँख कान नाक की तरह काम करते हैं, इलाके पर निगाह रखते हैं, Army के लिये खुफिया जानकारी जुटाते हैं… याद है कारगिल हमले की पहली सूचना स्थानीय चरवाहों ने ही आर्मी को दी थी?

18,000 फीट की ऊंचाई पर हरियाणा पंजाब और यूपी का लड़का बेहतर परफॉर्म करेगा या कोई स्थानीय लद्दाखी? वो जिसका जन्म ही 18000 फीट पर हुआ है… इसीलिए सेना स्थानीय लड़कों को भर्ती करती है।

आपके सामने दो विकल्प हैं… वहाँ के बच्चे मदरसों में पढ़ें या स्थानीय निकायों के स्थानीय स्कूलों में अलगाववादी प्रोपोगंडा पढ़ें या सेना द्वारा पोषित, संचालित, राष्ट्रवादी Goodwill स्कूल में पढ़ें…

आज इन्ही Goodwill स्कूलों का ही परिणाम है कि कश्मीर घाटी के इतर जितने भी इलाके हैं वहाँ के बच्चे पूर्णतया राष्ट्रवादी और भारत-परस्त हैं…

एक अंतिम बात… 1971 के युद्ध में पूर्वी पाकिस्तान की स्थानीय जनता पाकिस्तानी सेना के खिलाफ थी… नतीजा क्या हुआ? विश्व की सबसे सबसे शर्मनाक पराजय और 90,000 सशस्त्र फौजियों का शर्मनाक समर्पण…

स्थानीय जनता के सहयोग के बिना आप युद्ध लड़ ही नहीं सकते… जम्मू कश्मीर लेह लद्दाख में सेना स्थानीय जनता को अपने बच्चों की तरह पालती है और यही करना भी चाहिए।

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