आपकी हिन्दू चेतना पर भारी पड़ रही है आपकी जातिगत-चेतना

इस सरकार को झुकाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। अगर आपके पास कुछ हज़ार की पागल भीड़ जुटाने की क्षमता हो, और उसके पीछे मोदी को उस वर्ग विशेष का विरोधी बताने का नैरेटिव चलाने वाली मीडिया हो तो सरकार हमेशा घुटनों पर दिखाई दी।

इसमें कोई शंका नहीं है कि एससी /एसटी एक्ट में मोदी से गलती हुई है। पर मूल गलती आज नहीं हुई, बल्कि शुरुआत के चार सालों में ही हो चुकी थी।

मोदी सरकार की सबसे बड़ी विफलता रही है संगठित हिंसक आंदोलनों से निबटने में असमर्थता।

एक ही थीम निकल कर सामने आती रही जिसने सरकार की अथॉरिटी को बार बार चुनौती दी है।

चाहे जाट आंदोलन हो, गुजरात का पटेल आरक्षण का आंदोलन हो, भीमा कोरेगांव की घटना हो या सोनपेड़ की घटना पर हिंसा हो या विभिन्न दलित संगठनों द्वारा प्रायोजित हिंसा हो, चाहे मालदा में मुस्लिमों का उत्पात हो या बंगाल के दंगों का संज्ञान लेने की इच्छा शक्ति की कमी, या जेएनयू और हैदराबाद के लफंगों के सामने घुटने टेकती सरकार हो…

यह स्पष्ट था कि खून खराबे से मोदी के हाथ काँपते हैं।

इस सरकार को झुकाने के लिए ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। अगर आपके पास कुछ हज़ार की पागल भीड़ जुटाने की क्षमता हो, और उसके पीछे मोदी को उस वर्ग विशेष का विरोधी बताने का नैरेटिव चलाने वाली मीडिया हो तो सरकार हमेशा घुटनों पर दिखाई दी।

इस कमज़ोरी के साथ जब मोदी 2018 तक आये तो फिर जो हुआ वह होना ही था। कोर्ट ने एससी/एसटी एक्ट पर फैसला दिया, उसके पीछे इस वामपंथी नेटवर्क ने हिंसा फैलाई और आगे और भी हिंसा के बादल मंडरा ही रहे थे।

तो जब 2014 से इस दिन की तैयारी नहीं की तो 2018 में यह मजबूरी बन चुकी थी। मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि उस समय यह एक्ट बस एकमात्र रास्ता बचा था…

मोदी की गलती यह एससी/एसटी एक्ट नहीं है… मोदी की भूलें इससे बड़ी हैं। विरोध करना है तो मोदी की उस कमज़ोरी का विरोध कीजिये जिसे आप इतने साल अनदेखा करते आ रहे थे।

क्या हम उस समय सड़कों पर निकले जब कन्हैया और खालिद भारत के टुकड़े करने की बात करके आज़ाद घूम रहा था?

क्या हमने हार्दिक पटेल और जिग्नेश मेवानी को खुल्ला छोड़ने के सरकार के फैसलों पर सर पर आकाश उठा लिया था?

जब साहेब ने गौरक्षकों का डोसियर बनवाने की धमकी दी तो आधे लोग कसमसाये, पर चुप लगा गए…

अपने भीतर झांकिए, आपकी जातिगत-चेतना आपकी हिन्दू चेतना पर भारी पड़ रही है। आपको कश्मीरी हिंदुओं के प्रश्न पर गुस्सा आता है, पर उतना नहीं आता।

आपको चंदन गुप्ता और प्रशांत पुजारी की हत्या पर गुस्सा आता है पर बर्दाश्त हो जाता है।

आपको बंगाल के दंगों पर गुस्सा आता है पर उसमें बंगाल के हिंदुओं को कोस कर काम चल जाता है।

पर जब जाति की बात आती है तो बात बर्दाश्त से बाहर हो जाती है।

और आज जिस बात पर सरकार ने अपना एकमात्र विकल्प प्रयोग किया है तो आप सड़कों पर निकल आये हैं। क्यों?

क्योंकि वे सारे मामले हिन्दू समाज के थे… यह मामला आपका अपना है। यह जाति का मामला है तो आपको ज्यादा चुभा है। वह राष्ट्र और धर्म का मामला था तो कम चुभा था… क्योंकि हिंदुत्व तो क्या है कि यह तो साझे की खेती है. और ज्ञानी मुनि कह गए हैं कि साझे की खेती को गधा भी नहीं चरता।

सफाई करने के लिए कूड़े को बाहर निकाल आग लगाएंगे, या घर ही फूंक देंगे!

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