वाघरी देवीपूजक समाज : स्वाभिमानी पिछड़ा वर्ग, जिसे किसी का नौकर होना मंज़ूर नहीं

आप जो ये फोटो में देख रहे हैं ये पटाखे बेचने वाले औरत, मर्द, बच्चे ये वाघरी समाज के लोग हैं। इनको सरकारी नाम देवीपूजक समाज मिला है।

हम लोग बनिया को सबसे बड़ा व्यापारी कहते हैं पर बनिए लोगो में से कुछ व्यापार करते हैं और कुछ अच्छी नौकरी। पर ये जो वाघरी समाज है वो किसी की नौकरी नहीं करता। ये समाज 12 महीने व्यापार करता है।

हालांकि ये एक गरीब समाज है। ये समाज गुजरात के साबरकांठा, बनासकांठा, कच्छ
में पाया जाता है। राजस्थान और पाकिस्तान के सिंध में भी इनकी आबादी है।

ये समाज 12 महीने सीज़नल व्यापार करता है। ये दिवाली में पटाखे बेचेंगे, उत्तरायण में पतंग, मांजा, होली में रंग गुब्बारे, रक्षा बंधन में राखियां, गणपति के त्यौहार में गणपति की मूर्तियाँ, नवरात्र में माताजी की मूर्तियाँ। त्यौहारों के बाद ऑफ़ सीज़न में ये समाज काजू, बादाम, किशमिश, अनाज, कपड़े, बरसात में छतरियां, रेनकोट, ठंड में ये गर्म कपड़े, पुराने कपड़े लेकर बर्तन भी यही लोग बेचते हैं।

और बाकी जब समय मिले तो ये अदरक, और मिर्ची का धंधा करते हैं। गर्मियों के दिनों में ये मसाले बेचने आते हैं। और एक बात इनकी व्यापर करने की जगह हर शहर की सड़क है। अब आप सोचेंगे कि ये कौन सी बड़ी बात है, ये तो सब बेचते हैं।

तो यही खास बात है कि ये लोग आपके घर तक बेचने आते हैं। आज जो ऑनलाइन सिस्टम से होम डिलिवरी होती है, वैसी ही होम डिलिवरी सबसे पहले इन लोगों ने शुरू की थी। ये आपके घर आये और आप कुछ इनसे ना ख़रीदे ये होना ही मुश्किल है। मैं इस समाज को सबसे बड़ा व्यापारी समाज कहूँगा।

ये लोग खेती भी हिस्सेदारी में करते हैं। दिहाड़ी पर नहीं। इसीलिए ये समाज गरीब हो कर भी बहुत स्वाभिमानी है। ये समाज किसी की भी गुलामी करने से मना करता है। इनका मुनाफे का दर बहुत कम होता है। बस खा पीकर सब खुश रहना जानते हैं।

पर व्यापार इनकी नस नस में है। बस इनको शराब के व्यसन ने बहुत नुकसान पहुँचाया है।
इसीलिए ये समाज एक पिछड़ा समाज रह गया। इतना बड़ा व्यापारी समाज होने के बावजूद नशे की लत और पैसे के गलत इस्तमाल की वजह से ये समाज पिछड़ों में आता है। फिर भी इस स्वाभिमानी समाज को मेरा प्रणाम।

कहीं ऐसा न हो कि ‘गढ़ आला पण सिंह गेला’

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