सन्नाटा भी बहुत कुछ कहता है : भाग 1

कभी टीवी, सोशल मीडिया और बिकाऊ पत्रकारों के शोर में छुपी हुई 'सन्नाटे की आवाज़' तो सुनिए...

एक मित्र ने मेरे लेख पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि “बुरा ना मानियेगा लेकिन समर्थक हूँ, अंधभक्त नही”, और फिर उन्होंने मोदी सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना की।

यद्यपि मैं लिखना किसी अन्य विषय पर चाहता था, लेकिन मेरा मानना है कि मित्रों की शंकाओं और प्रश्नो का जवाब दिया जाना चाहिए।

कई बार मुझे लगता है कि कई प्रश्नों के उत्तर हमारे समक्ष उपस्थित हैं, और पहले भी कई बार जवाब अपने लेखों पर दे चुका हूँ। लेकिन हो सकता है मित्रों को स्थिति स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही हो।

अतः उन मित्र के उठाये गए विभिन्न मुद्दों को कई लेखों के द्वारा एक्सप्लेन करने का प्रयास करूँगा क्योकि एक लेख में उन मुद्दों के साथ न्याय संभव नहीं है।

मित्र ने लिखा कि मोदी सरकार “आतंकवाद रोकने के नाम पर वही काम जो कांग्रेस करती थी और कुछ नहीं। आतंकवाद पर मध्यम मार्ग कांग्रेस भी अपनाती थी और ये भी, अंतर कहाँ रहा? चाणक्य ने कहा था कि शत्रु को केवल हराओ नहीं उसका समूल नाश कर दो ताकि वो या उसके जैसी सोच रखने वाले कभी आप के सामने खड़े ना हो सके।”

यह तो सभी मानते हैं कि मोदी सरकार के समय में जम्मू-कश्मीर के बाहर आतंकवाद की एक भी प्रमुख घटना नहीं हुई। यह भी सभी मानते हैं कि विश्व के सबसे शक्तिशाली देशों में भी आतंकवादी घटनाएं होती रहती हैं।

आखिरकार ऐसा क्या जादू हो गया कि मोदी सरकार के आने के बाद जम्मू-कश्मीर के बाहर आतंकवादी घटनाएं लगभग समाप्त हो गईं। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री मोदी खुली गाड़ी में कई जिलों में घूम चुके हैं, जो विश्व का कोई भी नेता नहीं कर पाता।

क्या आतंकवादियों का हृदय परिवर्तन हो गया है और उन्होंने सनातन धर्म अपना लिया है?

या फिर, आतंकवादियों की सलवार, मोदी का नाम सुनते ही गीली और पीली हो जाती है?

या फिर, मोदी सरकार के आने के बाद उनके द्वारा आतंकी घटना करने के पहले ही उनका ‘समूल नाश’ किया जा रहा है?

याद कीजिये, पहले किसी भी आतंकवादी को मुठभेड़ में मारने के बाद सुरक्षा बल प्रेस कांफ्रेंस करता था, मरे आतंकवादियों की तथा उनके साथ फोटो रिलीज़ करता था। और, सरकार सुरक्षा बल के लिए पुरस्कार की घोषणा करती थी।

और उसके बाद शुरू होता था राजमाता पोषित NGOs का नंगा नाच। आतंकियों के समर्थक मानवाधिकार के मुद्दे पर कोर्ट पहुंच जाते थे, सुरक्षा बलों को सस्पेंड करने की मांग होती थी। मुख्यमंत्री को जेल भेजने की मांग होती थी। न्यायिक जांच बैठा दी जाती थी। राजमाता की आँखों से आंसू निकल आते थे और उन्हें रात को नींद नहीं आती थी।

क्या अब आतंकियों को मुठभेड़ में मारा नहीं जा रहा है? क्या सुरक्षा बल अब आतंकियों को बिरयानी खिलाकर, अगर विदेशी हुए तो पासपोर्ट में भारत का वीसा लगाकर, सादर सीमा पार भेज दे रहे है? या फिर देशी आतंकियों के कान उमेठ कर उनकी शिकायत उनके माता-पिता, पड़ोसियों और धर्म गुरुओं से कर देते है?

नगण्य आतंकी घटनाएं और आतंकियों को मुठभेड़ में ना मारे जाने का ‘सन्नाटा’ कुछ कह तो नहीं रहा है?

क्या कमी थी हमारे देश में? सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी जैसे दूरदर्शी नेतृत्व की

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