रोज़गार और अर्थक्रांति

अभी समाचार आया है कि 62 चपरासी के पदों के लिए 93,000 आवेदन आए हैं उत्तर प्रदेश में, जिसमें 3700 PhD की उपाधि लिए हुए हैं। 50,000 स्नातक और 28000 स्नाकोत्तर शिक्षा प्राप्त किए हुए हैं।

इस पद के लिए न्यूनतम योग्यता कक्षा पाँच में पास होना है। इन आवेदकों में कुल 7,400 ऐसे हैं जो मात्र कक्षा पाँच तक पढे हैं।

स्थिति कमोबेश पूरे देश की ऐसी ही है। 90,000 रेलवे की नौकरियों के लिए 2 करोड़ से अधिक आवेदन आए है। महाराष्ट्र पुलिस के 1137 सिपाही के पदों के लिए 2 लाख लोगों ने आवेदन दिया था।

अभी राजस्थान में ही 129 Engineer, 23 Lawyer और 393 स्नातकोत्तर के साथ 1 chartered accountant ने चपरासी पद के लिए आवेदन दिया है।

इसी प्रकार फरवरी माह में 9500 क्लर्क के पदों के लिए 20 लाख आवेदक थे जिसमें से 992 PhD, 23000 M Phil, 2.5 लाख स्नातकोत्तर और 8 लाख स्नातक थे। जबकि इस पद के न्यूनतम आवश्यकता कक्षा 10 थी।

इन सब आंकड़ों के बाद अब हर तरफ से प्रश्न उठेंगे कि नरेंद्र मोदी की सरकार ने नौकरी का वादा किया था, उस वादे का क्या हुआ? सभी विपक्षी दल इस पर नयी राजनैतिक रोटियाँ सेकेंगे।

प्रश्न यह भी है कि 70 साल के पुराने शासन काल में भी कुछ रोज़गार के क्षेत्र में उन्नति नहीं हुई। दरअसल हम मात्र सरकारी नौकरी को ही रोज़गार समझने लगे हैं।

बहुत से लोग शिक्षा पद्धति पर प्रश्न उठाएंगे। इसमें कोई शंका नहीं है कि शिक्षा पद्धति भी आज दूषित और नकारा है। परन्तु इसके साथ ही इस समस्या को पूरे परिवेश आइये समझने का प्रयास करें और इसके निराकरण को समझें।

यदि मात्र सरकारी क्षेत्र को भी देखें तो 10 लाख से अधिक अध्यापकों के पद रिक्त हैं। इसी प्रकार यदि सरकार के सभी रिक्त पदों को आप देखें तो लगभग 50 लाख नौकरियाँ अभी सरकार के पास हैं।

सीधे सीधे आप शायद आप सोचेंगे कि क्या भारत मे इतने योग्य आवेदक ही नहीं है जो इन नौकरियों को प्राप्त कर सकें।

एक तरफ तो हम भारतीयों के बुद्धि कौशल को पूरे विश्व में अग्रणी देखते हैं। तो सरकार उनको चयनित क्यों नहीं करती। सरकार निश्चित रूप से भर्ती प्रक्रिया चला कर योग्य आवेदकों को चुन सकती है, परन्तु करती नहीं है? क्यों?

आइए इसके एक और पहलू पर विचारें तो जानें कि भारत देश उन पदों को भरने की स्थिति में ही नहीं है। शायद आपको लगे कि ऐसा क्यूँ? आइये समझें।

50 लाख सरकारी नौकरियों का अर्थ है सरकार को उनके मानदेय अर्थात पगार या salary की व्यवस्था भी करनी पड़ेगी। अब लगभग 20,000 रुपये के औसत से आप देखें सरकार को लगभग 1,20,000 करोड़ रुपये प्रति वर्ष की व्यवस्था करनी है।

जिस देश की केंद्र सरकार अपने 21 लाख करोड़ के कुल बजट में 6.4 लाख करोड़ का नया कर्जा लेती है क्या वह सरकार अपने ऊपर नया 1.2 लाख करोड़ का खर्चा बांध सकती है? स्वयं कल्पना करें।

इसके विपरीत आज यदि एक लाख आवेदक 200 रुपये आवेदन की फीस दें तो सरकारी खजाने में 2 करोड़ रुपये आ जाते है। आप इस गणित को समझें 60 व्यक्तियों को 20000 रुपये की पगार दें तो सरकार पर 12 लाख प्रतिवर्ष का खर्चा आएगा और सरकार के खजाने मे आया 2 करोड़ रुपये तो 16 वर्षों की पगार तो आवेदकों ने ही दे दी।

जहां यह भर्ती होगी तो आप देखिये कई बार तो अदालत के कहने पर धांधली और भ्रष्टाचार के कारण पूरी भर्ती व्यवस्था दोबारा से की जाती है। उस समय जो आवेदक थे उनके धन को सरकारी खजाने में फिर से जाना पड़ता है।

अब रही बात सरकारी खजाने को भरने की व्यवस्था की। पिछले वर्ष (2017-2018) सरकारी आंकड़ों के अनुसार 6.84 करोड़ व्यक्तियों ने आयकर विभाग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। जो कि उसके पिछले (2016-2017) के 5.43 करोड़ से 1.41 करोड़ या 26% अधिक है।

वास्तव में इस देश में जो लोग कर की वास्तविक चोरी करना चाहते हैं वह बहुत कम लोग हैं। अधिकांश लोग तो कर के पचड़े से बचने के लिए ही कर नहीं देते। अब मजबूरी में आवश्यकता पड़ी को आयकर सलाहकार की मदद ले कर उन्होने आनन फानन में कर का भुगतान किया। परन्तु इस प्रकार की दण्ड व्यवस्था से बेहतर क्या स्वैछिक व्यवस्था नहीं रहेगी।

अब आप सोचेंगे कि क्या वास्तव में लोग इस कर को स्वैछिक रूप से देंगे? शायद यह रामराज्य की परिकल्पना में आ गया है।

हाल में देखा गया जब सरकार ने रसोई गॅस के अनुदान से स्वैछिक वापसी की बात कही तो बहुत लोग आगे आए परन्तु फिर भी सक्षम लोगों में से बहुत नहीं आए। अब सरकार ने आपकी आय देखकर सीमा निर्धारित कर दी। भविष्य में तो हमें ऐसी ही व्यवस्था बनानी है जहां शायद व्यक्ति स्वैछिक रूप से कर प्रदान करे।

लेकिन इसके साथ ही अभी और तुरंत के लिए हमारे पास अर्थक्रांति प्रस्ताव है जिसके बाद व्यक्ति का कर चुपचाप उसके खाते से निकल कर सरकारी खजाने में आ जाएगा। और वह भी 2% कर से।

आज व्यक्ति आयकर सलाहकार से पूछता है कि कितने प्रतिशत कर लगेगा। जब पता चलता है कि 20% या 30% है तो वह नए रास्तों की तलाश शुरू करता है कर बचाने के लिए। परन्तु यदि वह आश्वस्त हो कि कर 5% से कम ही है तो अधिकांश भारतीय कर देने में कोई संकोच नहीं करेंगे।

इस तरह सरकारी खजाना भी भर जाएगा। अब आप सरकार से उम्मीद कर सकते हैं कि नौकरियों को हरी झंडी दी जाएगी तो बिना इस प्रकार के प्रस्ताव के यह असंभव सा ही प्रतीत होता है।

इस प्रकार की पढ़ाई से क्या आप बनवा पाएंगे एक ज़िम्मेवार नागरिक?

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