शिक्षक और विद्यार्थी के रिश्ते में आए बदलाव के लिए कौन है ज़िम्मेदार?

हम जब स्कूल में पढ़ते थे तो शिक्षक दिवस पर हर कक्षा से दो बच्चे अपने शिक्षक के स्थान पर उनकी कक्षाओं में पढ़ाने जाते, ताकि एक दिन उनको विद्यालय में आराम मिले.

फिर थोड़ा उत्साह जागा तो उस दिन हर कक्षा को अपने अपने तरीके से हम लोग सजाने लगे, रंगोली, फूल हार, जिसको जैसा सजाना आता हो… शिक्षकों को कुछ उपहार देने का प्रचलन भी शुरू हुआ… बस इससे अधिक आगे नहीं बढ़े.

मुझे याद है फिर एक समय ऐसा भी आया, कुछ वर्षों बाद मैं खुद एक स्कूल में शिक्षिका बन गयी, एक बार किसी प्रतियोगिता के लिए मुझे किसी अन्य स्कूल में बच्चों को लेकर जाना था.

जब मैं वहां पहुँची तो मेरी पुरानी शिक्षिका को मैंने वहां प्रिंसिपल के रूप में पाया. मैंने देखते से ही पहचान लिया और उनके पैर छूने लगी, मेरे साथ आये बच्चे मुझे आश्चर्य से देख रहे थे कि मैडम किसी और स्कूल की प्रिंसिपल के पैर क्यों छू रही हैं?

मैं पाँव छूकर जैसे ही उठी और उनसे पूछने ही वाली थी मैडम आपने पहचाना? उसके पहले ही उन्होंने मेरे गाल पर हाथ फेरते हुए कहा अरे शैफाली कैसी हो?

मैं बता नहीं सकती मुझे कितनी खुशी हुई, मैंने मुस्कुराते हुए पूछा आपको मैं याद हूँ?

अरे ऐसे कैसे भूल सकती हूँ, मेरे जीवन में मैंने जितने बच्चों को पढ़ाया है सबके नाम याद है मुझे, आज भी देखते से ही पहचान सकती हूँ.

ये रिश्ता हुआ करता था शिक्षक और विद्यार्थी का उन दिनों. आज सुबह से बाजू के स्कूल में शिक्षक दिवस पर कार्यक्रम चल रहा था, तेज़ आवाज़ में गाने में डांस हो रहा था… गाना कौन सा…. लूंगी डांस…

बस तब से सोच रही हूँ कि इस रिश्ते को इस स्तर तक गिराने के लिए पहले शिक्षक बदले होंगे या विद्यार्थी, या शिक्षा व्यवस्था… और इस बदलाव को स्वीकारने वाले क्या वाकई शिक्षक हैं या शिक्षा को व्यापार बना देने वाली संस्थाएं?

बचें Sadist प्रवृति के लोगों से, चाहे वो आपके शिक्षक ही क्यों ना हो

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