करोड़ों दलित-वंचित हिन्दुओं को धर्म के खिलाफ करके, हिंदुत्व का कौन सा भला कर रहे हैं आप

इस गलतफहमी में न रहना, कि हस्ती मिटती ही नहीं हमारी… गंधार, कश्मीर, कराची, ढाका और लाहौर देख लो, वहां बस्ती दिखती नहीं हमारी…

मुगालते पालना बुरा नहीं है मगर जब अस्तित्व का संकट हो तो मुगालते पालना अच्छी चीज भी नहीं है।

क्या बात है कि जहां अफगानिस्तान से लेकर इंडोनेशिया तक भगवा ध्वज लहराता था, क्यों वो अपने देश में ही सिमट कर रह गया है और यहाँ भी अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है।

चलिए यह बताइए कि देश हज़ार साल तक गुलाम क्यों रहा? क्या कमी रह गई थी? क्यों हम आक्रांताओं को रोक नहीं पाए?

वीरता की कमी नहीं थी, पर हम एक होकर लड़ नहीं पाये। यह बताइए कि जयचंद किस जाति का था और यह मान सिंह कौन था जो हिंदू होकर हिंदुओं से लड़ने जाता था?

अटल बिहारी बाजपेयी का कहना है कि जितने लोग पानीपत लड़ाई कर रहे थे उससे कई गुना ज्यादा लोग बाहर खड़े होकर लड़ाई देख रहे थे। जातीय अभिमान के नाम पर इतने सारे लोगों को शस्त्र शास्त्र से वंचित कर देना कौन सा भलाई का काम है?

कुछ ब्राह्मणों की हठधर्मिता ने बंगाल के कालाचंद राय, एक ब्राह्मण को मात्र एक मुस्लिम लड़की से प्रेमविवाह करने पर ‘काला पहाड़’ बनने पर मजबूर कर दिया जिसने बाद में लाखों हिंदुओं का बलात धर्म परिवर्तन करके पूरे बंगाल को थर्रा डाला और मुस्लिम बना डाला।

कश्मीर का राजपुरोहित कौन था जिसने हजारों मुस्लिम कश्मीरी लोगों को धर्म परिवर्तन करके, वापस हिंदू बनने नहीं दिया? जो बाद में पंडितों की अपनी ज़मीन से बेदख़ल होने का कारण बना।

जिन असहाय लोगो को ज़बरन गोमांस खिलाकर मुसलमान बनाया गया, उन्हे हिन्दुओं में वापस न लेने का महान पाप किस जाति से हुआ? और अगर वापस ले लिया होता तो पाकिस्तान नहीं बनता और न ही बांग्लादेश! पूर्वजों के पुण्यों का श्रेय लेने वाले, उनके पापों का प्रायश्चित कौन करेगा?

देश-विभाजन में लाखों हिन्दुओं का क़त्ल हुआ, करोड़ों बेघर हुये उसका दोषी कौन है? ना ना, अगर मुस्लिम लीग ने किया और आप उनके इरादे भांप नही पाये तो ये आपके नेतृत्व का भी दोष है।

फिर बँटवारे के बाद, फिर उन्हे यहीं रखने और तुष्टीकरण की राजनीति कर, उठ खड़ा करने का दोष किसका है? अगर आप राजनैतिक नेतृत्व का श्रेय ले रहे हैं तो नाकामी का भी श्रेय ले लीजिये जनाब।

आज़ादी के बाद भी अंबेडकर ने तो सत्ता में ‘पॉलिटिकल रिप्रेजेंटेशन’ की बात करी थी वो भी दस साल के लिये, आरक्षण उनकी नहीं बल्कि कांग्रेस और नेहरू की देन है।

आज़ादी के बाद कॉमन सिविल कोड लागू न करने का अपराध किसने किया था ये भी पता कर लीजिये, क्योंकि अम्बेडकर तो कॉमन सिविल कोड लागू करना चाहते थे।

गोरक्षा कानून भी पास नहीं होने दिया। आरक्षण को वर्तमान रूप में भी वीपी सिंह ने लागू कराया था जो कि ठाकुर थे, इसलिए अपना ज्ञानवर्धन कर लीजिए बंधु।

आप बताइए कि कश्मीर के पंडितों को, क्यों एक हिंदू बहुल देश में बाहर निकाल दिया गया। आज़ादी के बाद भी हम अपने तीन सबसे महत्वपूर्ण पूजास्थल राम जन्मभूमि, कृष्ण जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ को मुक्त क्यों नहीं करा पाए? आप यह बताइए कि आज भी जब हमारे इष्टों का अपमान होता है तो हम प्रतिकार क्यों नहीं कर पाते? क्यों सिर्फ फ़ेसबुक पर ‘कलम-किरांती’ करते रह जाते हैं।

चलिए बताइए कि आज जितने भी वामपंथी है और हिंदू धर्म की जड़ें खोदने का काम कर रहे हैं, उनका शीर्ष नेतृत्व ज़्यादातर किस जाति का है? मीडिया जो कि ज़्यादातर हिंदू विरोध विरोधी खबरें दिखाता है और उनके विरुद्ध आग उगलता है, उसमें भी बकैत पांडे जैसे लोग ही हैं।

ये हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी देने वाले भी कौन लोग हैं? “संघी आतंकवादी होते हैं” ये थ्योरी देने वाले भी दिग्विजय सिंह हैं। जब सवर्णो के शीर्ष पर रहते ही मिशनरियों को खुला छोड़ दिया गया जिससे वो खुलकर धर्मान्तरण कर सकें। बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी।

कश्मीर का हाल देख लिया जिन पर अत्याचार करके, निकाल दिया गया, वह सब ब्राह्मण ही थे। आज तो केरल और पश्चिम बंगाल, कश्मीर बनने पर की ओर अग्रसर है। कैराना, मेवात, अलीगढ़ जैसे हजारों मिनी पाकिस्तान बन गए हैं।

सिर्फ फ़ेसबुक पर बकैती करना अलग बात है, ज़मीन पर जाकर देखिए जनाब, हालात बहुत बुरे हो चुके हैं। आज जिस संख्या की दम पर आप बचे हुए हैं, उस संख्या को कम कर देने से हिंदू ख़तरे में आ जाएंगे। इसलिए ऐसा कुछ बयान नहीं दें जो जातीय दरार को बढ़ाता हो।

एससी एसटी एक्ट 1989 में आया, उसके बाद आठ लोकसभा चुनाव हो चुके हैं किसी में ये मुद्दा नहीं बना, आज अचानक ये इतना बडा मुद्दा कैसे बन गया? बल्कि अभी तो इसका दायरा बढ़ाकर ईसाई, मुस्लिमों को भी डाल दिया है उन्हें नाराज़ होना चाहिये परन्तु ऐसा नही हो रहा है।

कांग्रेस को पता है कि सनातन को कैसे जातियों में तोड़ते हैं इसलिये वो इतने सालों तक राज कर पाई और आज भी हम उसकी बॉल पर बैटिंग कर रहे हैं। हिन्दू से पहले सिख, जैन अलग किये फिर लिंगायत में तोड़ना चाहती थी, क्या कांग्रेस में सवर्ण नहीं हैं, लेकिन सब ख़ामोश रहे।

आज जब मिशनरी और जमाती जी जान से लगे हुए हैं हिंदुओं के धर्मान्तरण में, वहां ऐसी बात बोलना, इतने सारे लोगों को एक साथ हिंदुत्व के खिलाफ खड़ा करना मूढ़मतियों का ही काम है।

वीर सावरकर का कहना है जब एक हिंदू धर्म छोड़कर जाता है तो हम तो सिर्फ हम एक हिंदू ही नहीं खोते हैं वरन हम एक दुश्मन तैयार कर देते हैं!

पूज्य सावरकर की किताब ‘मोपला’ पढ़ लेते तो बंधु आपके ज्ञानचक्षु खुल जाते। और आप करोड़ों दलित-वंचित हिन्दुओं को एक साथ धर्म के खिलाफ खड़े करके, आप कौन सा हिंदुत्व का भला कर ले रहे हैं? यही तो ‘वा-क-ई’ गैंग चाहता है। इस जातीय दंभ से बाहर आइए जनाब, इससे हिन्दुत्व का सिर्फ नुकसान ही करवाएँगे।

स्वाति की कलम से :

अब ग़ुलाम हुए तो उबर न सकेंगे, क्योंकि खत्म ही हो जायेंगे हिन्दू

ऐ कट्टर हिंदुओं… ऐ कड़क राष्ट्रवादियों…

आज तुम्हारे अन्दर जो हिम्मत आई है ना, मोदी ही हैं उसकी वजह

‘हाय मोदी बदल गये, हाय मोदी सेकुलर हो गये!’

ऐ कट्टर हिंदुओं… ऐ कड़क राष्ट्रवादियों… : भाग 2

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