क्या इस केस का हाल भी 35 A जैसा ही होगा!

पांच कथित शहरी नक्सलियों को पुख्ता सुबूतों के आधार पर गिरफ्तार किया गया था।

इस देश मे जहां सिर्फ FIR दर्ज होने पर अनिवार्यतः गिरफ्तारी होने के प्रावधान हैं, वहीं न्याय के ‘मसीहा’ लोग… देशद्रोह और प्रधानमंत्री की हत्या की योजना के साथ पकड़े गए अभियुक्तों को जमानत दे देते हैं या अपने निवास में ही कुछ दिनों की दिखावटी नज़रबंदी की सुविधा प्रदान कर देते हैं… वह भी परिजनों के साथ… गज़ब!

न्याय के पहरूए… इस बात पर नाराज़ हो जाते हैं कि पुलिस ने प्रेस कांफ्रेंस क्यों बुलायी… अपनी मेहनत और सबूतों को मीडिया के सामने क्यों रखा?

यही नहीं… अभियोजन पक्ष (पुलिस) को यह धमकी भी दी जाती है कि इस कथित ‘अपराध’ में पुलिस द्वारा दायर किया गया केस खारिज भी किया जा सकता है!

सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जज कल्पित भेदभाव का आरोप लगाकर दिल्ली में प्रेस कांफ्रेंस कर सकते हैं (विश्व मे ऐसा उदाहरण उपलब्ध नहीं है)… मगर महीनों की मेहनत के बाद महाराष्ट्र पुलिस प्रधानमंत्री की हत्या की योजना से संबंधित केस में अपनी जांच-पड़ताल और उपलब्ध सबूत देश/मीडिया के सामने नहीं रख सकती… क्यों?

अब देखिए… मेहरबानी किन अभियुक्तों पर हो रही है…

इन में से एक अभियुक्त 2007 में जिलेटिन की 5 छड़ों, अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटकों के साथ रंगे हाथ पकड़े गए थे… 6 साल की सज़ा हुई… 2013 में रिहा हुए।

दूसरे अभियुक्त देशद्रोह, सशस्त्र विद्रोह और समाज विघटन के आरोपों में एक दर्जन बार जेल जा चुके हैं… अभी भी ज़मानत पर हैं।

यह सभी उच्च शिक्षित हैं, कम्युनिस्ट-माओवाद और आदिवासियों की लड़ाई की आड़ में देशविरोधी, हिन्दुविरोधी कार्यवाहियों में लिप्त हैं… इनके संपर्क कश्मीरी… नॉर्थईस्ट… माओवादी… पाकिस्तानी समर्थक देशद्रोही तत्वों से पाए गए हैं।

इनमें दिल्ली लॉ कालेज की एक कानून की प्रोफेसर भी हैं… जो छात्रों को पढ़ाने की जगह जम्मू कश्मीर के अलगाववादी वकीलों के साथ भारत के शासन के विरुद्ध मोर्चा बनाती हैं…

इतना ही नहीं, वे एलगार परिषद जैसी विभाजनकारी संस्था के उग्र-संदिग्ध तत्वों के साथ सौजन्य रखती हैं… कामरेडों को प्रधानमंत्री को ‘सही स्थान’ पहुंचाने के लिए पत्र लिखती हैं…

यह सभी अभियुक्त खुल्लमखुल्ला टेलीविज़न डिबेट्स में आकर देश-शासन के विरुद्ध ज़हर उगलने के लिए भी बदनाम हैं… मगर दिल्ली स्थित देश के टॉप के वकील इनकी गिरफ्तारी सिर्फ 2 घंटे में रुकवा देते हैं… पुलिस पूछ-ताछ के लिए रिमांड तक नहीं पा सकी… इस केस का भी हाल 35 A जैसा ही होगा मित्रों…

बुद्धिजीवियों का चोला ओढ़े शहरी नक्सलियों को तो हम पहचानते ही नहीं थे!

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