RSS : स्वयंसेवक होना ही उसका सबसे बड़ा अपराध था!

केरल के उस स्वयंसेवक को धमकी मिली। यह ‘देख लेंगे’ या ‘तू मिल बाद में’ जैसी धमकी नहीं थी बल्कि “जान से मार डालने” की धमकी थी। दोष क्या था उस स्वयंसेवक का? स्वयंसेवक होना ही उसका सबसे बड़ा अपराध था।

विरोधियों को यह किसी तरह सहन नहीं हो रहा था कि उनकी नाक के नीचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का पौधा जड़ पकडे और पेड़ बने। ” हर अंकुर को रौंद देना” ही उनकी कार्य शैली थी, ताकि आतंक का साम्राज्य कायम रहे।

लिखित रूप से सूचना दी गई, दिन / दिनांक बताकर, जगह और समय सहित बताया गया कि तुझे मार डालेंगे। ज़िंदा रहना है तो भाग जाना, दोबारा दिखाई मत देना। पर “महामंगले पुण्यभूमे त्वदर्थे , पतत्वेष कायो नमस्ते नमस्ते” ( हे महामंगलमयी पुण्यभूमि! तेरे ही कार्य में मेरा यह शरीर अर्पण हो। मैं तुझे बारम्बार नमस्कार करता हूँ।) का जयघोष प्रतिदिन करने वाले स्वयंसेवक को मृत्यु भी अपने लक्ष्य से डिगा नहीं पाई।

वह दिन भी आया और संघ विरोधी गुंडों ने बताई जगह, बताये समय पर उस खाकी नेकर धारी स्वयंसेवक की नृशस हत्या कर दी। काल भी उस अकाल मृत्यु को स्तब्ध होकर देखता रह गया।
पीछे रह गया परिवार… माता -पिता, छोटी बहन और कुछ ही समय पूर्व ब्याहकर आई ‘पत्नी’।

लगा जैसे सब ख़त्म हो गया है। अपार दुःख और आसुंओ में परिवार का बचा खुचा साहस बह जायेगा और निश्चिक्त रूप से परिवार पलायन कर अब चुपचाप दूसरी जगह चला जायेगा …पर ..पर जिस परिवार ने ऐसा बलिदानी पुत्र जन्मा हो वह क्या इतना कमज़ोर हो सकता था? ..बिलकुल नहीं, मृत्यु से भी ना डरने वाले दृढ़ संकल्पित स्वयंसेवक के विचारों का प्रभाव क्या जीवनसंगिनी पर ना होता?

अपना दुःख समेट कर, सारा साहस बटोर कर परिवार फिर खड़ा हो गया ‘ईश्वर की धरती पर’, असुरों का सामना करने के लिए। अपने संकल्प पूर्ति के लिए मृत्यु का वरण करने वाले बेटे का काम अधूरा कैसे छोड़ देंगे?

प्रभो शक्तिमन् हिन्दुराष्ट्रांगभूता, इमे सादरं त्वाम नमामो वयम्
( हे सर्वशक्तिशाली परमेश्वर! हम हिन्दूराष्ट्र के अंगभूत तुझे आदरसहित प्रणाम करते हैं ) के जयघोष के बाद जीवन फिर चल पड़ा, संघ के विचार के प्रसार और प्रबलता के लिए। यह अभूतपूर्व था उन हत्यारे असुरों के लिए। उन्हें तो आदत थी केवल, डर कर भागते, मार्ग बदलते या फिर शरण स्वीकारते चेहरे देखने की। यह कौन है? यह ऐसा कैसे कर सकता? अस्तित्व का प्रश्न हो गया उनके लिए।

दोबारा फिर उसी डर के साम्राज्य को रचने का प्रयास शुरू हुआ। फिर वही धमकी। जान से मार डालने की धमकी। इस बार लक्ष्य थी दिवंगत शूरवीर स्वयंसेवक की ‘विधवा जीवन संगिनी’।
यह प्रयास भी परिवार का दृढ़ मनोबल तोड़ ना पाया और उस वीर युवती ने भी दिन, दिनांक, समय, स्थान बताकर आने वाली मृत्यु का सामना किया आँखों में आँखे डालकर।

एक क्षण के लिए तो मृत्यु भी विचलित हो गई उस युवती के तेज से, उसके साहस से। पर अगले ही क्षण ईश्वर की धरती का अभिषेक हुआ, अपनी ही बेटी के रक्त से। अभिषेक के सारे उपकरण असुरों के थे।

परिवार फिर भी टूटा नहीं। अपने दो बच्चों की आहुति देकर भी परिवार कर्तव्य पथ पर डटा रहा। उन्हें विश्वास था हम ना भी रहे तो परम पवित्र भगवाध्वज ज़रूर लहराता रहेगा। अंतिम विजय हिंदुत्व की होगी।

इन बलिदानियों के साहस ने वह काम कर दिया जो आवश्यक था। विरोधियों के मनोबल में दरार पड़ गई। तुरंत अन्य स्वयंसेवक आ जुटे उस दरार को चौड़ा कर खाई में बदल देने के लिए। काम श्रम साध्य है, अनवरत जारी है, होकर रहेगा
परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं, समर्था भवत्वाशिषा ते भृशम्
( तेरी कृपा से हमारी यह विजयशालिनी संघठित कार्यशक्ति हमारे धर्म का सरंक्षण कर इस राष्ट्र को वैभव के उच्चतम शिखर पर पहुँचाने में समर्थ हो )
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बे-चैन खाकी देश के कोने कोने में अपने ढंग से समाज कार्य में लगी है एक ही लक्ष्य है “परं वैभवं नेतुमेतत् स्वराष्ट्रं” l अपना रक्त / श्रम / समय देकर गढ़ रहे हैं अपनी माँ का शिल्प …अपनी भारत माता का शिल्प।

केरल के उस परिवार की बेटी, उस स्वयंसेवक की बहन अब इंदौर में ही बसती है। विवाह के बाद अपने परिवार के साथ।

केरल की धरती उनकी ही नहीं है जो हिन्दुओं की धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने के लिए गौमाता का सरे-राह वध कर दे… केरल की धरती ऐसे गौरवशाली स्वयंसेवक पुत्र-पुत्रियों की है जो अपने देश-धर्म/संकल्प के लिए मृत्यु का वरण करते है। जय माँ भारती।

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