बुद्धिजीवियों का चोला ओढ़े शहरी नक्सलियों को तो हम पहचानते ही नहीं थे!

प्रधानमंत्री मोदी की हत्या की साजिश में शामिल नक्सलियों के लीक हुए पत्र को पढ़कर भी अगर कोई इनको सिर्फ बुद्धिजीवी मानता हैं तो उससे निकृष्ट इंसान कोई नहीं हो सकता।

इनके लिखे पत्रों से वो बातें भी स्पष्ट हो गई जो अबतक सुनी तो गई थी लेकिन ज्यादा तथ्यपूर्ण नहीं मानी जाती थी…

1. ये सारे कथित बुद्धिजीवी आपसी बातचीत में भारतीय सेना, CRPF और पुलिस को ‘दुश्मन’ के नाम से संबोधित करते हैं। अगर इनके लिये सेना, सशस्त्र बल और पुलिस दुश्मन हैं तो सेना की इज्ज़त करने वाले हर भारतीय के लिये ये नक्सली दुश्मन होना चाहिये जबकि कुछ महा-लतखोर इन गिरफ्तारियों को भी मोदी सरकार की जल्दबाज़ी बता रहे हैं।

2. छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में हुई CRPF और पुलिस के हर जवान की घात लगाकर की गई हत्या की साज़िश इन्हीं शहरी बुद्धिजीवियों ने की थी इसीलिये नक्सली हमलों में जवानों के मारे जाने पर जेएनयू में जश्न मनाया जाता है।

3. नोटबंदी के फायदों में भाजपा ने दावा किया था कि इससे नक्सलियों और अलगाववादियों की फंडिंग की कमर टूट गई है। विपक्षियों ने बाद में इस बात का मज़ाक भी बनाया लेकिन इस पत्र में साफ-साफ लिखा हैं कि नोटबंदी से नक्सलियों को फंड की भारी कमी हो गई।

4. जिस नक्सली प्रोफेसर ‘साईंबाबा’ की गिरफ्तारी पर भी इन बुद्धिजीवियों ने ऐसा ही अभिव्यक्ति का रोना रोया था… पत्र में लिखा है कि उसकी गिरफ्तारी और सज़ा से सभी एयर कंडीशन छाप नक्सलियों की हवा टाइट हो गई हैं।

5. सुधा भारद्वाज ने एक पत्र में शहरी नक्सलियों को कश्मीर के अलगाववादियों और पत्थरबाज़ों की तरह हर महीने भत्ता देने का प्रस्ताव रखा है ताकि वो बेखौफ होकर दुश्मनों (भारत सरकार और सेना) से लड़ सकें। जिनकी लड़ाई ही भारत के खिलाफ है उनको मानवाधिकार कार्यकर्ता का चोला पहनाने वालों को भी भारत के खिलाफ ही समझिए… चाहे वो रोमिला थापर हो या अभिषेक मनु सिंघवी।

इधर सुधा भारद्वाज बोल रही है कि ये सारे पत्र फर्जी हैं वहीं दूसरी ओर इनके साथी कुछ पूर्व न्यायाधीश बोल रहे हैं कि… ‘पुलिस के ऐसे पत्र मीडिया में लीक नहीं करना चाहिये थे… ये कानून के खिलाफ है!’ अगर पत्र फर्जी हैं तो मीडिया में लीक होने पर पुलिस से सवाल क्यूँ?

आप वोट देकर भाजपा की सरकार तो बनवा सकते हो लेकिन आप अपने वोट से सीधे इन शहरी नक्सलियों का जाल नहीं तोड़ सकते है! वो काम सरकार ही कर सकती है और साढ़े चार साल में मोदीजी ने ये काम बखूबी किया है… क्योंकि पहले तो हमें पता ही नहीं था कि –

– जिस लेखक की किताबें पढ़कर हमारे गले रुँध जाते हैं वो हमारी सेना के जवानों के मरने पर जश्न मनाता है!

– जिन लोगों की इज्ज़त हम इसलिये करते थे कि वो बेसहारा बच्चों या गरीबों के लिये काम करते हैं, सामाजिक संस्था चलाते हैं… वो CRPF के जवानों को मारने की प्लानिंग भी अच्छे से कर लेते हैं।

– जिन लोगों को हम देश के सबसे बुद्धिमान लोग समझते थे वो अपनी बुद्धि सिर्फ देश को तोड़ने में लगाते थे।

बाकि बुद्धि आपके भी पास हैं अगर उसे देश को जोड़ने में लगा सको तो बेहतर ही होगा।

देश की अस्मिता बचाने, वामपंथी माफिया से लेखकों का संरक्षण करे सरकार

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