पुरखों के पापों का प्रायश्चित करना धर्म ही नहीं, हिंदुत्व का भी दर्शन

पिछले दिनों अटल जी की 2004 में हुई हार पर और फिर सवर्ण अस्मिता लिखा था। उन लेखों पर कुछ सवर्ण (काफी अवैध फेसबुक आईडी भी), बड़े व्यथित व आक्रोशित दिखाई दी हैं। कुछ ने तो आक्रोश में अमर्यादित भाषा का भी प्रयोग किया (वो डिलीट कर दिया) है।

मुझे इन व्यथित आत्माओं ने, निश्चयात्मक रूप से यह बताने की कोशिश की है कि उनकी व्यथा व आक्रोश, मोदी जी की सरकार को वैसे ही डुबायगी जैसे अटल जी की सरकार को 2004 में डुबोया गया था। आज मैं उनके इस प्रलाप को आदर व सम्मान देते हुये, धमकी न मान कर सत्य ही मान लेता हूँ।

मैं इन सबकी पीड़ा समझता हूँ। इनकी पीड़ा यह है कि भारत वैसा नहीं चल रहा है जैसा कांग्रेस राज और उसके तन्त्र के द्वारा चलाया जाता था।

उनका दर्द आरक्षण है, जो पिछले सात दशकों से कांग्रेस द्वारा बिना समीक्षा के चलाया गया है, उनका दर्द एससी/एसटी एक्ट के मूल रुप में आने से है जो 1989 में कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया था।

उनका दर्द 370 खत्म न होने से है, जिसको कांग्रेस की सरकार ने थोपा था, उनका दर्द राम मंदिर न बनने से है, जिसको कांग्रेस के प्रभाव में सर्वोच्च न्यायालय टालना चाहती है।

उनका दर्द उनके काले धन को सफेद दिखाने की मजबूरी से है, उनका दर्द दूसरों की बेईमानी के साथ उनकी बेईमानी पर लग रही रोक से है।

इन सबके दर्द के साथ भारत के सर्वोच्च न्यायालय का भी बड़ा दर्द है जिसे हिंदुत्व के हर प्रतीक व विचारधारा से अंतर्जात विग्रह है। वो हर उस यज्ञ में होम करते हैं जिससे भारत मे हिंदुत्व में टूटन हो।

क्या भारत के ये आक्रोशित सवर्ण इतने अंतर्मुखी हो गये हैं कि इन्हें उस सर्वोच्च न्यायालय, जिसे भारत में हथियारबंद अराजकता फैलाने व प्रधानमंत्री की हत्या की पैरवी करना छोटी बातें लगती है और तथाकथित बुद्धिजीवियों के राष्ट्रद्रोही विचारों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व विचारों में भिन्नता मान निर्णय लेती है, वो उनके हाथों खेले जा रहे है?

यह सब इस बात पर एकाग्रचित रूप से एकमत है कि उनका अपना अस्तित्व, हिंदुत्व या भारत एक राष्ट्र से ज्यादा महत्वपूर्ण है। ये सब ज्यादातर हिन्दू न हो कर सिर्फ सवर्ण या अभिजात्य वर्ग है।

मेरा ऐसे लोगों के लिये परामर्श है कि यदि आप यह समझते हैं कि भारत या हिन्दू, 2019 में सत्ता बदलने के बाद बच जायेगा, तो फिर वह बेवकूफी मत कीजियेगा जो ईरान में रुके हुये पारसियों ने की थी। जल्दी जल्दी भारत छोड़ने की तैयारी कीजिये क्योंकि आपके पास समय कम रह जायेगा।

मेरे सामने जो डेटा आये हैं वह यही बता रहे हैं कि पिछले 30 वर्षों में भारत छोड़ कर विदेश में बसने व नागरिकता लेने वालों में से 85% भारत के सवर्ण हैं। इस लिये इस डेटा को देखते हुये आप सवर्णों से यही आशा है कि यदि आप या आपके बच्चे समर्थशाली है तो आप भी पूर्व के समर्थशाली सवर्णों की तरह विदेश शिफ्ट हो जाइये। सामर्थ्य नही है तो भी जो कुछ यहां है उसको बेच बाच के निकल जाइये।

पारसियों ने भी विदेश रह कर नाम व दाम खूब कमाया है और आपकी भावी पीढ़ी और भी अच्छा करेगी यह न मेरा सिर्फ विश्वास है बल्कि इसके लिये आशीष भी है। आप व्यर्थ यहां नोटा-फोटा मोदी-शोदी में फंस कर अपनी आत्मा को मार रहे हैं!

अपनी उस अंतरात्मा की आवाज़ सुनिये, जिसे भारत या हिंदुत्व से तब तक ही लगाव है जब तक उससे आपके स्वार्थों की पूर्ति होती है। आप मस्त रहिये और भारत के हिन्दुओं में से 25% (कुछ जगह यह 15%, 20-22% भी बताया जा रहा है) रहते हुये, पिछले, कम से कम 200-300 वर्षों से, जो सामाजिक व सत्ता के शीर्ष का उपभोग आपने किया है, उसका विदेश में उपभोग कीजिये।

यहां जो हिन्दू रह जायेगा, वो या तो मेरे ऐसे अधकपारी हिन्दू होंगे या फिर वे, जिन्हें शताब्दियों से, पहले मुसलमानों, फिर ईसाइयों और साथ में तथाकथित सवर्ण हिन्दुओं द्वारा, दबाया, कुचला व प्रताड़ित किया गया था, लेकिन उनमें कुछ बात थी, जिसने तमाम विषमता के बाद भी हिन्दू धर्म को नही छोड़ा है।

यदि आप जैसे सवर्ण लोग भारत में रुक गये तो तय मानिये आपकी तीसरी पीढ़ी तक लोग या तो कलमा पढ़ने लगेंगे या फिर गिरजाघर का घँटा बजाने लगेंगे। यह इसलिये नहीं होगा कि आप यह चाहते हैं बल्कि इसलिये होगा क्योंकि स्वार्थ की प्रकृति, यही नियति आपके लिये तय किये हुये है।

आप लोग मेरी बात को अन्यथा न लें और न ही मुझे अपशब्द कहें क्योंकि मैं जन्म से आपको जानता हूँ। मैं आपके बीच का ही हूँ, जन्म के कारण सवर्ण ही हूँ।

भाई, क्या यह सत्य नहीं है कि हम (हमारे, आपके तथाकथित ‘सवर्ण’ पुरखे) ही तो उस समय सत्ता व सामाजिक शीर्ष पर थे, जब पश्चिम से आक्रांता आये थे? क्या यह हम नहीं थे जिसने शताब्दी दर शताब्दी, अपने अपने स्वार्थों व अपनो से ही द्वेष व ईर्ष्या के कारण पश्चिम से आये इस्लामियों व अंग्रेज़ों को सहयोग दिया?

क्या हम भारत के वे अभिजात्य व सत्ताधारी वर्ग नहीं थे जिसने सबसे पहले सत्ता के साथ बने रहने व उनके अनुग्रह को प्राप्त करने के लिये, हिन्दू धर्म को छोड़ कर इस्लाम या ईसाई धर्म, सहर्ष स्वीकारा?

हम क्या वो नहीं थे, जिसने धर्म बदल कर, विदेशी वेशभूषा और व्यवहार को अपने जीवन का अंग बनाया और हिन्दू समाज के उस वर्ग को प्रोत्साहित किया, जो हम से प्रेरणा लेता था?

हमारे पुरखों ने बड़ी गलतियां की थीं और मुझे लगता है कि हमें उससे मुंह छुपाने की जगह, उसको स्वीकार करके आगामी पीढ़ी के लिये सीख लेनी चहिये।

हां, यहां यह बात बिल्कुल सही है कि इस सीख लेने में वर्तमान की पीढ़ी को कष्ट के साथ अन्याय का सामना भी करना पड़ेगा लेकिन यह सब मैं हिंदुत्व के दर्शन के रुप में उसे स्वीकारता हूँ। यह हमारा हिंदुत्व ही है जो हमको यह बताता है कि पिता के पापों का प्रायश्चित पुत्र को ही करना पड़ता है।

मैं पूर्व में अपने पुरखों की गलतियों को अपने धर्म व राष्ट्र पर किया गया पाप ही समझता हूँ। मेरे लिये उसका प्रायश्चित करना न सिर्फ धर्म है बल्कि यह करके अपनी अगली पीढ़ी के लिये सुरक्षित व सबल हिंदुत्व व भारत अर्पण करना, अपना कर्तव्य भी समझता हूँ।

सवर्ण अस्मिता और हिंदुत्व/राष्ट्रवाद की हत्या

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