बेरोज़गारी भत्ता विदेश में

ये टॉपिक मैंने इसलिए चुना कि इसके बारे में कई प्रकार की बातें सुनी। वो भी गलत या अपूर्ण जानकारी।

स्विस बेरोज़गारी भत्ते से इस पोस्ट में आपको जानकारी दूंगा कि ये सिस्टम कैसे काम करता है।

अपूर्ण जानकारी ऐसे कि भारत जैसे देशों से लालायित विचार ये अपेक्षा रखते हैं कि जो बेरोजगार होगा, सरकार उसको बेरोज़गारी भत्ता बड़ी आसानी से दे देती है।

जैसे अपने लंगर में लोग खाने को बैठे हों, लंगर वाले खिला दें। बड़ी प्रशंसा वाली बात लगती है। पर ऐसा नहीं है। इस सिस्टम को समझ लेना उचित है।

स्विस सिस्टम में तीन डिपार्टमेंट साथ साथ काम करते हैं।

1. सोशल डिपार्टमेंट

2. बेरोजगार होने की दशा में डेटा कलेक्ट करने वाला डिपार्टमेंट जो काम आदि कि सम्भावनाओं पर नजर रखता है या डेटा कलेक्ट करता है। बेरोजगार को पहले यहीं अपने को रजिस्टर करना होता है। इसे RAV कहते हैं। गूगल करने पर मिल जाएगा।

3. बेरोजगार इंश्योरेन्स, जिसकी तगड़ी शर्ते होती हैं और निर्भर करता है कि जॉब वाले ने खुद रिज़ाइन किया है या उसे सस्पेंड किया गया है। इसे शॉर्ट में ALK कहा जाता है। या ALV.

खेल ऐसे चलता है। उम्र के हिसाब से जॉब का समय होता है। कोई यंग है तो हो सकता है एक दो साल, पांच साल, दस साल। कोई अधेड़ है तो बीस साल, पच्चीस साल।

ये सब जॉब करते हुए अपनी सेलेरी में से हिस्सा बेरोजगार इंश्योरेंस को देते हैं। देते क्या हैं, ओबलिगेटरी है, काट लिया जाता है।

सस्पेंड होने या रिज़ाइन करने की दशा में वर्क कॉन्ट्रेक्ट का खेल होता है। मतलब एकदम किसी को नहीं निकाल सकते या कोई एकदम से नहीं निकल सकता। कॉन्ट्रेक्ट शुरू होने के साथ समय बीतने पर अमूमन एक साल बीतने पर, तीन महीने का सेक्योर समय होता है। उसके बाद ही वर्कर बेरोजगार की श्रेणी में आता है।

एकदम से किसी को सस्पेंड भी कर देते हैं। खास बातों पर, जैसे किसी वर्कर ने सेक्शुअल अब्यूज़ कर दिया, या कंपनी का ही दिवाला निकल जाए, या ऐसी स्थितियां। इन्हीं बातों में मोबिंग का कॉन्सेप्ट भी होता है। और ऐसा होने पर उसका प्रूफ भी तैयार रखना पड़ता है।

बहरहाल, सस्पेंड होने या रिज़ाइन का पता लगते ही ये रिकमेंड किया जाता है कि नंबर 2 में अपना रजिस्ट्रेशन करवा दो। डेटा कलेक्ट करने वाली सरकारी संस्था में रजिस्टर होने के बाद, वो बायोडेटा आदि का परिमार्जन करती है, टेक्निकल जानकारी इकट्ठा करती है, बेरोज़गारी इंश्योरेंस के बारे में बतलाती है, ये सब काम वर्कर के काम करते रहने पर तीन महीने की अवधि में होता रहता है।

इस बीच वर्कर को नए जॉब की तलाश के लिए प्रमाण, जैसे कंपनी को लिखे एप्लिकेशंस की कॉपी, महीने के दस से बारह, इस नंबर 2 डिपार्टमेंट को देने होते हैं। हर महीने कंट्रोल अपॉइंटमेंट होता है। अभी वर्कर के पास रोजगार है। ये ध्यान रहे। फिर भी प्रोसेस चालू हो जाता है।

बेरोज़गारी भत्ता देने वाला इंश्योरेंस नंबर 3 अभी चालू नहीं हुआ है।

सस्पेंड होने की दशा में चार से पांच वर्किंग डेज़ के ब्लॉक डेज़ वर्कर को मिलते हैं। याद रहे वर्किंग डेज़, जो महीने के एवरेज के हिसाब से 21 दिन निकलता है।

उसका 70 या 80 परसेंट उसकी पहले की सेलेरी का मिलना शुरू होता है। जो कि काफी कम होता है। फेमिली में बच्चे हैं तो अस्सी परसेंट वरना 70 परसेंट।

इस बीच भी नंबर दो डिपार्टमेंट के साथ हर महीने का कंट्रोल अपॉइंटमेंट चलता है। और वर्कर को नए जॉब के लिए लगातार मेहनत करते रहना पड़ता है। हल्की सी गलती या जिस जॉब के लायक न हो, उसके लिए अप्लाई करने पर ब्लॉक डेज़ बढ़ जाते हैं। और ऐसी गलती बहुत लोग करते हैं।

खुद ने रिज़ाइन किया हो, तो वो और खतरनाक स्थिति होती है। ब्लॉक डेज़ चालीस से नब्बे दिन का भी हो सकता है।

चालीस दिन मतलब दो महीने! याद रहे, आपका खर्चा कुछ भी हो, दो महीने तक वर्कर को फूटी कौड़ी प्राप्त नहीं होती। और अगर इस बीच दो महीने वर्कर ने कहीं काम कर लिया, तो उसकी रिपोर्ट नंबर 2 डिपार्टमेंट को करनी होती है। और उस सूचना के तहत जितने दिन काम किया, उतने दिन, ब्लॉक डेज़ में जुड़ते जाते हैं।

अगर दो महीने में बीस दिन काम कर लिया, तो तीसरे महीने भी बेरोज़गारी भत्ता नहीं मिलता है!

तो अब तक समझ आ गया होगा बेरोज़गारी भत्ते का सिस्टम।

हाँ, नंबर 1 रह गया। सोशल डिपार्टमेंट। इसका रोल और जबरदस्त है।

काम न होने की दशा में, विशेषकर रिज़ाइन करने की दशा में, कोई भी सोशल हेल्प के लिए पहुंच सकता है। और जो काम नहीं कर रहा (जैसे जंकी लोग या ड्रग एडिक्ट) वो भी, पर वो केस अलग है, हम केवल जॉब, वर्कर और बेरोजगार की बात कर रहे हैं।

तो पेपर्स की थप्पी चैक होने के बाद, नॉर्मल बजट, जिसमें केवल तीन चीज होती है – मकान का किराया, नॉर्मल ओबलिगेटरी हेल्थ इंश्योरेंस और मासिक खर्चा, जिसके चलते और पेमेंट्स भी खुद करने होते हैं।

सोशल डिपार्टमेंट हेल्प तो कर देता है, पर सूचना भेजता है, नंबर 3 को, मने बेरोजगार इंश्योरेंस को, जितना पैसा सोशल डिपार्टमेंट तुरन्त हेल्प में देता है, उतना पैसा बेरोज़गारी का भत्ता, जिसे अभी तक वर्कर देखा तक नहीं, उससे काट लिया जाता है।

तो अब तक आपको स्विस बेरोज़गारी भत्ते का सिस्टम समझ आ गया होगा, ये तो और पक्के से समझ आ गया होगा कि विकसित देश फोकट में धन बाटने को नहीं बैठे हैं।

ये समझ आ गया होगा कि हेल्प तो होती है, पर उसके अनुपात में मेहनत भी करनी होती है। फ्री फोकट का कुछ नहीं होता।

कोई कभी बड़ा मुख करके कहे कि विदेश में तो बेरोज़गारी भत्ता मिलता है, तो मेरा ये लेख दिखला दीजियेगा। काफी रहेगा।

मुझे सिस्टम के टेक्निकल आस्पेक्ट पर बात करना अच्छा लगता है।

अभी मोदी जी ने पोस्ट से जुड़ी सेवा का उद्घाटन किया है। अपने अनुभव से कह सकता हूँ, इसकी भव्य विराटता है। ये भी स्विस सिस्टम का एक प्रमुख और बहुत ही सफल हिस्सा है। भारत में तो इसकी ताकत और बढ़ सकती है। सुविधा भी बहुत हो सकती है।

बताईयेगा, कि ये जानकारी पाकर आपको कैसा लगा।

मोदी जी तो विकास कर गए, विकसित नहीं हो पाए उनके आलोचक

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