किसी भी सूरत में किसी भी समस्या का समाधान नहीं NOTA

प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश में ‘सेफ़्टी वॉल्व’ ढूंढने वाले माननीयों (?) से कभी आप ऊँची आवाज़ में बात कर लो, उनकी गाड़ी को गलती से टक्कर मार दो, कोर्टरूम में ग़लती से आपका फोन बज जाए तो ये प्रेशर कुकर की तरह उबलने लगते हैं।

काँग्रेस ने इन्हीं माननीयों (?) की छत्रछाया में खूब मजे किये और माननीयों (?) ने काँग्रेस की कृपादृष्टि से खूब मजे किये। जज बनाने का ‘सिंघवी फॉर्मूला’ पूरे देश ने देखा।

आज वर्षों पुराने लंबित विवादास्पद मामलों में जनहित याचिकाएँ डाल डालकर सरकार से उन पर तीन महीनों में कार्रवाई करने के आदेश दिए जा रहे हैं।

निचली अदालतों में ही अपनी सारी जिंदगी खपा देने वाले साधारण आदमी को कभी न्याय नहीं मिलता, लेकिन कुछ खास लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट आधी रात को खुल जाती है।

इन्हीं लोगों के लिए सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक चुनावों के बाद कुछ ही घंटों में फैसला सुना देती है। प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश में शामिल लोगों को गिरफ्तार करने की बजाय उनको केवल नज़रबंद करती है।

किसी वामपंथी पत्रकार की हत्या होने पर रविश कुमार, पुण्य प्रसून, राजदीप सरदेसाई जैसे पत्रकार सीधे प्रधानमंत्री को दोषी ठहराने लगते हैं लेकिन प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश करने वालों की तरफदारी करते हैं, इस साजिश का खुलासा करने वालों को तुरंत ‘एक्सपोज़’ करते हैं।

SC ST एक्ट वर्षों से था, तब फैसला नहीं आया लेकिन चुनाव नजदीक आते आते माननीयों (?) को सवर्णों की चिंता हो जाती है और सवर्ण तुरंत नोटा नोटा चिल्लाने लगता है लेकिन ये नहीं देख रहा है कि कोई भी पार्टी उनके हित की या उनके समर्थन की बात नहीं कर रही है।

‘फूट डालो और राज करो’ की नीति से अंग्रेज़ 200 वर्षों तक राज कर गए, उसी नीति से अंग्रेज़ों के सबसे क़ाबिल गुलाम इस देश पर 60 वर्षों तक राज कर गए और अभी भी यही नीति अपना रहे हैं।

शह और मात का खेल जारी है, जिसे ये खेल समझ नहीं आ रहा या समझना नहीं चाहता वो नोटा दबाए और जिसे समझ आ रहा है उसे पता है क्या करना है। लेकिन किसी भी सूरत में नोटा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है।

कैसे भी मोदी को रोकना है! चर्च, मस्ज़िदों से फतवे के बाद अब हत्या की साज़िश

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