वामपंथ का इलाज हैं सीधे सरल सवाल

वामपंथी बुद्धिजीवियों को सुनना-पढ़ना अमूमन अच्छा लगता है, मगर असल में अच्छा होता नहीं, जिसे फिर सही सही समझना थोड़ा मुश्किल भी है।

वैसे इनके कहे-लिखे का सीधा सीधा अर्थ आसान होता है, आसान इसलिए लगता है क्योंकि इनकी बातें आकर्षक होती हैं, ये मानवीय संवेदनाओं से लबालब भरी हुई लगती हैं, लेकिन होती नहीं।

इन्हें समझना कठिन इस तरह से है कि जो यह बोलते-लिखते हैं वो कभी भी किसी भी तरह से ज़मीनी सच नहीं होता, और फिर इनकी कथनी-करनी में गड़बड़ी के अनेक पेंच होते हैं।

इनके उद्देश्य के लिए यही कहा जा सकता है कि कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना। इन्हें समझने का एक ही आसान तरीका है कि जो यह कहते-लिखते हैं उसे बिना भावनाओं में बहे ध्यान से सुने-पढ़ें और शब्दार्थ को थोड़ा कुरेदें, भावार्थ का सच सामने आने लगेगा।

मैं इन्हें गिरोह इसलिए कहता हूँ कि इनमें गज़ब की एकता होती है। ये जहां कहीं भी रहें, एक दूसरे की खुलकर मदद करते हैं। फिर चाहे लेखक-प्रोफ़ेसर-इतिहासकार हों या वकील-पत्रकार-राजनेता हों या फिर धरती आकाश में कुछ और भी।

अभी हाल ही में कुछ एक की गिरफ्तारी के समय का घटनाक्रम इसका प्रमाण है। इन सब की दृष्टि और दृष्टिकोण एक सा होता है, अर्थात इनका यह विश्व-चरित्र है, फिर चाहे ये देश में हों या विदेश में।

एक बड़ा मज़ेदार उदाहरण है, जब इनका एक बूढ़ा छात्र सड़क पर नारा लगा रहा था कि “छीन के लेंगे आज़ादी” तो मैं हंस रहा था, क्योंकि इनका इतिहास और वर्तमान लोगों की आज़ादी छीनने का रहा है। ठीक इसी तरह जब ये आर्यों को बाहरी बता रहे थे तो इनका मकसद अनेक बाहरी आक्रमणकारी लुटेरों को भारत में बसाना था।

हिन्दुस्थान में वामपंथी गिरोह नेहरु राजपरिवार का दरबारी जीव है। इसी वंश ने इन्हें यहां पालपोस कर बढ़ा किया। ये आज भी इस राजपरिवार के लिए प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चारण का काम करते हैं। इस राजपरिवार के मुख से निकला हर वाक्य इन्हीं की उपज होता है।

अब देखिये, आज़ादी से लेकर अब तक, इस परिवार ने देश तोड़ने को लेकर दूसरों पर सबसे ज्यादा इल्ज़ाम लगाये, जबकि सभी जानते हैं कि देश किसने तोड़ा था। एक बार ‘गरीबी हटाओ’ का नारा लगाया गया था, पता चला कि तब सबसे अधिक गरीबी बढ़ी थी।

आजकल ये अगर ‘राफेल राफेल’ चिल्ला रहे हैं तो ध्यान रखिये इनके मन में बोफोर्स का चोर है। पिछले कुछ दिनों से जब ‘लोन लोन’ चिल्ला रहे थे तो समझ आ रहा था कि कहीं कुछ गड़बड़ है, अब पता चल रहा है कि सबसे अधिक अनियमित लोन इनके द्वारा ही बांटे गए थे। ऐसे अनगिनत उदाहरण और भी मिल जाएंगे।

पिछले दिनों पाकिस्तान के नए नए मुखिया को सुन रहा था। कह रहे थे कि प्रधानमंत्री के काफिले की सारी बुलेटप्रूफ गाड़ियां बेच देंगे। बाद में पता चला कि वे ऑफिस हेलीकॉप्टर से आ-जा रहे हैं, जबकि कार्यालय घर से मात्र चार किमी है। है ना हास्यास्पद?

असल में इसमें पाकिस्तान का दोष नहीं, अब वहां चीन पहुंच चुका है अर्थात वहाँ भी वामपंथी कीटाणु तेजी से फैलेंगे। हाँ, देखना यह दिलचस्प होगा कि भविष्य में वहाँ इस्लाम के सामने वामपंथ टिक पाता है या नहीं।

आखिर इस वामपंथ का इलाज क्या है? सीधे सरल सवाल। हुआ यूं कि एक बार एक फेसबुकिया वामपंथी अपना अति मानवीय ज्ञान बाँट रहा था। लिखता है कि बाबर बाहर का हो सकता है मगर अकबर और औरंगज़ेब तो इसी मिट्टी में पैदा हुए और पले-बढ़े, उन्हें बाहरी कहना उचित नहीं, बल्कि उन्होंने देश के लिए अनेक काम किये आदि आदि।

भोली-भाली जनता लगी लाइक और शेयर करने। तभी भीड़ के बीच एक सामान्य व्यक्ति ने पूछ लिया कि अगर आप के घर में कोई जबरन कब्ज़ा कर ले तो क्या उसके बच्चों को आप अपने ही घर का मालिक स्वीकार कर लेंगे? और अगर वे घर की पुताई करके चमका दें तो क्या आप दूर से देख देख कर प्रसन्न भी होंगे, क्योंकि तब तक आप को घर से बाहर कर दिया गया होगा।

इस सवाल का जवाब नहीं दिया गया था, बल्कि थोड़ी देर बाद देखता हूँ कि वो प्रतिक्रिया हटा दी गई थी। शायद उस व्यक्ति को ब्लॉक भी कर दिया गया होगा। मगर वामपंथी यह भूल रहे हैं कि दुनिया इन्हे तेज़ी से ब्लॉक कर रही है।

मुठ्ठी भर लोग जानते थे कि इतिहास से सबक मिलता है, सो इतिहास ही बदल डाला

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