कितने ‘नेहरुवियन’ थे अटल जी?

श्रद्धेय अटल जी के निधन के पश्चात कांग्रेसियों और कांग्रेसी मानसिकता वाले लोगों ने उन्हें ‘नेहरुवियन’ कह प्रचारित करना प्रारंभ कर दिया है। कुछ दिन पूर्व कोफी अन्नान का देहांत हुआ तो किसी ने उन्हें भी ‘अफ्रीका का नेहरू’ घोषित कर दिया।

दुर्घटनावश दस वर्ष प्रधानमंत्री रहे डॉ मनमोहन सिंह भी यही चाहते हैं कि तीन मूर्ति भवन में उनके पैग़म्बर जवाहरलाल नेहरू की ही प्रतिमाएं स्थापित रहें और चूँकि मनमोहन सिंह की दृष्टि में नेहरू के बाद आये सभी प्रधानमंत्री ‘पैग़म्बर नेहरू’ के अनुयायी ही होने चाहिये अतः उनके लिए अलग संग्रहालय इत्यादि निर्मित हो परन्तु तीन मूर्ति भवन और NMML से छेड़-छाड़ न की जाये।

कांग्रेसियों के अनुसार जब विश्व का कोई नेता महानता हासिल कर लेता है तो वास्तव में वह नेहरू के ही गुणों को आत्मसात करता है इसलिए उसकी महानता की उपमा नेहरू को उपमान बनाकर उसी प्रकार देनी चाहिये जैसे ‘चाँद सा सुंदर चेहरा’।

इस महिमामण्डन का ही परिणाम है कि आज भी देश का बुद्धिजीवी वर्ग नेहरू के चरणों की धूल माथे लगाता है। व्यक्ति पूजा की यह ऐसी मानसिकता है जिसने स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात इस देश का जितना नुकसान किया है उतना किसी अन्य विचार या विचारधारा ने नहीं किया।

यह एक प्रकार से ‘appropriation of national icons’ की होड़ है जिसका एक उदाहरण वामपंथियों में देखने को मिलता है जब वे भगत सिंह को कम्यूनिस्ट बता कर अपने पाले में खींच लेते हैं।

अटल जी को ‘नेहरुवियन’ कहने वालों ने या तो उनकी नीतियों का कभी तथ्यपरक विश्लेषण नहीं किया या वे जानबूझकर अनजान बने रहने का ढोंग करते हैं ताकि देश नेहरू और उनके परिवार का बोझ ढोता रहे।

वास्तविकता यह है कि आपको नेहरुवियन नीतियों को समझने के लिए अधिक दिमाग खर्च करने की आवश्यकता नहीं है। कथित ‘नेहरुवियन लिगेसी’ की कुछ प्रमुख विशेषताएं हैं जिनके आधार पर किसी भी प्रधानमंत्री के कालखण्ड के मौलिक चरित्र को नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल से पृथक सिद्ध किया जा सकता है।

नेहरू ने अपने समय में पाँच बड़ी गलतियां की थीं :

1. पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान की चाल न समझ पाना; परिणामस्वरूप देश की भूमि गंवा देना।

2. शेख अब्दुल्ला से मित्रता के चलते बचे खुचे जम्मू कश्मीर पर अनुच्छेद 370 तथा 35A थोप देना जिसके कारण वह राज्य और उसके निवासी भारत के संविधान के अधिकारक्षेत्र से परे हो गए।

3. भारत की अर्थव्यवस्था को सोवियत समाजवादी मॉडल पर चलाना एवं वैज्ञानिक अनुसंधान संस्थानों को सरकारी कब्जे में रखना जिसके कारण दशकों तक निजी उद्योग जगत प्रगति नहीं कर पाया। संदीप देव ने अपनी पुस्तक ‘कहानी कम्युनिस्टों की’ में विस्तार से बताया है कि किस प्रकार नेहरू सोवियत संघ से प्रभावित होकर आये थे और वही आर्थिक मॉडल देश को देना चाहते थे।

4. नेहरू में राष्ट्रीय सुरक्षा और सामरिक-रणनीतिक समझ की भारी कमी थी। होमी भाभा और कैनडी, दोनों ने नेहरू से कहा था कि भारत परमाणु परीक्षण कर सकता है किंतु उस समय नेहरू विश्व को शांति की चरस बेचने में मशगूल थे। सम्भवतः इसीलिए सशस्त्र सेनाओं के आधुनिकीकरण और स्वावलंबन के बारे में नेहरू ने सोचा ही नहीं।

5. नेहरू स्वयं को जीवनभर कश्मीरी पण्डित बताते रहे और लोग उनके नाम के आगे ‘पंडितजी’ लगाते रहे किंतु यह सर्वविदित है कि नेहरू को अपने हिन्दू होने पर शर्म आती थी। नेहरू के दोगले चरित्र की बानगी उनकी 21 जून 1954 को लिखी वसीयत में दर्ज है जिसमें लिखा था “…I wish to declare with all earnestness that I do not want any religious ceremonies performed for me after my death. I do not believe in any such ceremonies and to submit to them, even as a matter of form, would be hypocrisy and an attempt to delude ourselves and others… My desire to have a handful of my ashes thrown into the Ganga at Allahabad has no religious significance, so far as I am concerned. I have no religious sentiment in the matter.” (Will and Testament accessed from Nehru Memorial Museum and Library website.)

इन्हीं पाँच बिंदुओं पर नेहरू और अटल जी की नीतियों का तुलनात्मक विश्लेषण किया जाये तो समझ में आ जायेगा कि अटल जी किसी भी दृष्टिकोण से नेहरुवियन नहीं थे।

अटल जी ने चीन और पाकिस्तान दोनों को समझने में भारत के दूरगामी हितों का ध्यान रखा। अटल जी ने मोरारजी देसाई की सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए फरवरी 1978 में पाकिस्तान की यात्रा की थी तत्पश्चात उन्होंने चीन से भी सम्बंध सुधारने के अच्छे प्रयास किये थे और बातचीत प्रारंभ की थी, जो 1971 और ’62 के युद्ध के पश्चात एकदम बन्द हो गयी थी।

प्रधानमंत्री रहते हुए अटल जी ने पाकिस्तान के साथ शांति समझौते के जो भी प्रयास किये वह अमृतसर-लाहौर बस सेवा, व्यापार और बातचीत तक ही सीमित रही। कारगिल की लड़ाई अटल जी द्वारा प्रारंभ किये गए शांति के प्रयासों का प्रतिफल नहीं थी बल्कि वह देश की गुप्तचर सेवाओं की सामूहिक विफलता का परिणाम थी।

कारगिल के लिए अटल जी की आलोचना की जा सकती है किंतु यह भी एक तथ्य है कि 1997 में जब इंद्र कुमार गुजराल प्रधानमंत्री बने थे तब उन्होंने पाकिस्तान में R&AW के ऑपरेशन बन्द करवा दिए थे (देखें पृष्ठ सं 145, “Not War Not Peace” by Perkovich et. al. OUP).

देश का शीर्ष नेतृत्व जब इस प्रकार गुप्तचर एजेंसियों को हतोत्साहित करेगा तो हम यह उम्मीद कैसे कर सकते हैं कि गुजराल के जाने के ठीक एक साल बाद 1999 में हमें सटीक इंटेलिजेंस प्राप्त होती?

अटल जी ने युद्धकाल में सेनाध्यक्ष को पूरी छूट दी थी। नेहरू और इंदिरा की भाँति उन्होंने सेनाध्यक्षों को महत्वहीन नहीं बनाया। जनरल वेद प्रकाश मलिक (सेनि.) उन दिनों का स्मरण करते हुए कहते हैं कि जब उन्होंने अटल जी से कहा कि, “सर हम आपके आदेश का पालन करते हुए नियंत्रण रेखा को पार नहीं करने का पूरा प्रयास करेंगे किंतु एक सैनिक होने के नाते मैं इसकी गारन्टी नहीं दे सकता अतः आप नियंत्रण रेखा को पार न करने की दृढ़ता पर सार्वजनिक वक्तव्य न दें…”

तब अटल जी चुप रहे और उन्होंने शाम को ब्रजेश मिश्रा से बयान दिलवाया कि “भारत नियंत्रण रेखा आज पार नहीं करेगा किंतु कल क्या होगा यह निश्चित नहीं है।”

कारगिल युद्ध के पश्चात आगरा शिखर वार्ता में भी अटल जी उसी प्रकार प्रतिबद्ध थे। यह वार्ता विफल इसीलिए हुई थी क्योंकि अटल जी देशहित में कड़ी शर्तों पर बात करते थे। इतिहास साक्षी है कि युद्ध से पहले और उसके बाद कूटनीतिक बातचीत की प्रक्रिया से ही समाधान निकलता है परंतु अटल जी से पूर्व नेहरू, इंदिरा और यहाँ तक कि शास्त्री जी ने भी वार्ता की मेजों पर युद्ध में जीती गयी भूमि लौटा दी थी। उन रणनीतिक विफलताओं के सम्मुख तो कारगिल की लड़ाई कुछ भी नहीं थी।

कारगिल रिव्यु कमेटी में इसका उल्लेख है कि पाकिस्तानी केवल घुसपैठ के लिए नहीं आये थे बल्कि भूमि पर कब्जा करने के उद्देश्य से आये थे किन्तु अटल जी ने पाकिस्तानी फ़ौज को मार भगाने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।

जहाँ नेहरू के कार्यकाल में शत्रुओं से घिरे नवोदित स्वतंत्र राष्ट्र को अच्छी रक्षा नीति नहीं मिल पायी थी वहीं अटल जी के कार्यकाल में कई ऐसे निर्णय लिए गये जो इक्कीसवीं शताब्दी में उभरते राष्ट्र के लिए अत्यावश्यक थे।

सन 1998 के परमाणु परीक्षण और उसके पश्चात् रक्षा नीतियों में किये गए सुधारों पर मैंने एक लम्बा लेख लिखा था। वह दोहराना नहीं चाहता अतः जो उस लेख को पढ़ने के इच्छुक हैं वे इस पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं – राष्ट्रीय सुरक्षा : नेहरू और इंदिरा से ऊंचा अटल बिहारी वाजपेयी का क़द

अटल जी की कश्मीर नीति की बात करें तो यहाँ भी वे नेहरूवियन सिद्ध नहीं होते। कश्मीर के प्रति उनकी ‘इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत’ की नीति आलोचनाओं का शिकार रही है। किन्तु यदि उस कालखंड का सही मूल्यांकन किया जाये तो ज्ञात होता है कि अटल जी के पास कश्मीर के लिए एक सोची समझी दूरगामी रणनीति थी जिसके फल पाँच वर्षों के सीमित कार्यकाल में पूरी तरह नहीं मिल सकते थे।

पूर्व R&AW अध्यक्ष अमरजीत सिंह दुलत ने अपनी पुस्तक में बताया है कि किस प्रकार हिज़बुल मुजाहिदीन के सरगना अब्दुल मजीद डार को भारतीय इंटेलिजेंस एजेंसियों ने अपनी तरफ मिला लिया था। एक समय ऐसा भी आ गया था जब कश्मीर में अलगाववादियों की पाकिस्तान परस्त मानसिकता को तोड़ दिया गया था।

यह सब कुछ योजनाबद्ध तरीके से लम्बे समय तक चलना चाहिये था किंतु नियति को यह स्वीकार नहीं था। सन 2004 में अटल सरकार गिरने के पश्चात कश्मीर में जो निर्वात बना वह आजतक यथावत है।

फिर भी अटल जी की कश्मीर नीति, ऑपरेशन पराक्रम, कंधार काण्ड इत्यादि पर स्वतंत्र रूप से विवेचना तथा आलोचना की जानी चाहिए किंतु वह आलोचना नेहरूवियन दायरे से बाहर आकर होनी चाहिए।

इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि धुंध को छांटने के लिए उसके अंदर घुसना पड़ता है। इस प्रयास में व्यक्ति कई बार गिरता पड़ता है और इस प्रकार वह अपने पीछे आने वाले लोगों के लिए मार्ग प्रशस्त करता जाता है। अटल जी ने यही किया।

आज हम परिस्थितियों को ब्लैक एंड वाइट में देख पाते हैं तथा पाकिस्तान और कश्मीर में अलगाववादी तत्वों से बातचीत के लिए तैयार इसीलिए नहीं हैं क्योंकि अटल जी ने उनसे बातचीत कर देश को उसका परिणाम दिखा दिया था। नेहरू के पास यह स्पष्ट दृष्टिकोण नहीं था। नेहरू ने कश्मीर की धुंध में धुआं कर उस धुंध को और गाढ़ा किया। इसका प्रमाण है अनुच्छेद 370 और 35-A.

अटल जी की आर्थिक नीतियाँ भी नेहरू से एकदम भिन्न थीं। अटल सरकार ने विनिवेशीकरण, ढांचागत विकास, संचार क्रांति समेत अनेक क्षेत्रों में ऐसे कार्य किये जो पूर्व प्रधानमंत्री नरसिंहराव की आर्थिक उदारीकरण की नीतियों का ही विस्तार था।

अटल जी की सरकार में Resurgent India Bonds लाये गये थे जिससे देश के विदेशी निवेश में 8700 करोड़ रूपये से अधिक की वृद्धि हुई। देश में वस्तु एवं सेवा कर (GST) की परिकल्पना अटल सरकार में ही बनी थी, FRBM एक्ट भी तभी आया था।

भारत ने प्रथम स्वदेशी कंप्यूटर भाभा और नेहरू के जमाने में 1960 में ही बना लिया था किंतु देश में सूचना क्रांति चालीस वर्ष पश्चात् अटल सरकार में आई थी जब अमरीकी कम्पनियों ने यहाँ अपने ऑफिस खोलकर रोजगार देना प्रारंभ किया था।

अटल जी से पहले स्कूल की NCERT पुस्तकें वामपंथी लेखक ही लिखते थे। तत्कालीन मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी जी ने सभी पुस्तकें बदलवा दी थीं। यह कुछ ऐसे कार्य थे जिनको विस्तार दिया जाए तो पूरी एक पुस्तक लिखी जा सकती है।

अटल जी को नेहरूवियन कहने वालों को नेहरू की वसीयत के समक्ष अटल जी के उस वक्तव्य को रखना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा था कि “भारत भूमि का कोई टुकड़ा नहीं है, यह जीता जागता राष्ट्र पुरुष है. इसकी हर नदी गंगा है, इसका कंकर कंकर शंकर है, यह वंदन की भूमि है, यह अभिनन्दन की भूमि है… यह अर्पण की भूमि है, यह तर्पण की भूमि है… हम जियेंगे तो इसके लिए, मरेंगे तो इसके लिए… और मरने के बाद भी गंगाजल में बहती हमारी अस्थियों को कोई कान लगाकर सुनेगा तो एक ही आवाज आयेगी… भारत माता की जय।”

इसमें कहीं भी अटल जी ने हिन्दू होने की ग्लानि प्रकट नहीं की है. उन्हें सेक्यूलरिज़्म की सफाई देकर कहीं भी यह नहीं कहना पड़ा कि वे किसी ‘रिलिजन’ को नहीं मानते क्योंकि उन्हें हिन्दू होने का गर्व था।

राष्ट्रीय सुरक्षा : नेहरू और इंदिरा से ऊंचा अटल बिहारी वाजपेयी का कद

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY