नोटबन्दी : मोदीजी ने हम लोगों की जुगाड़ प्रवृत्ति को कम करके आंका

तो आखिरकार ये साबित हुआ कि देश में काला धन था ही नहीं, सिर्फ और सिर्फ शिगूफा था।

कभी किसी ने कोई रिश्वत ली ही नहीं थी और भ्रष्टाचार सिर्फ आरोप लगाने की चीज़ थी क्योंकि नोटबन्दी में 99% पैसा तो बैंक में वापस आ ही गया।

… और बैंक में पैसा जमा होने का मतलब है कि ये क्लीन मनी है पूरी तरह!!!

जो भी व्यक्ति ये कहता/ मानता है कि नोटबन्दी गलत कदम था, वो पहले खुद से पूछे कि उसने कितना अनअकॉउंटेड कैश जमा कराया था 8 नवम्बर 2016 से 31 दिसम्बर 2016 के बीच बैंक खातों में?

क्या? आपने कहा कि अनअकॉउंटेड नहीं था? तो भाई /बहन, वो CA को फोन कर कर के रास्ते किसने पूछे थे उसको अकॉउंटेड बनाने के? आपने ही न!

कौन सी राज्य सरकार और उसके कर्ता धर्ता बचे थे जिन्होंने रोडवेज़, पेट्रोल पंप और रेलवे बुकिंग के खुदरा नोट मंगा उनको बैंको में 500-1000 रूपए के नोटों में बदल जमा नहीं कराए?

पूरे 50 दिन तक रोज़, सभी ने कराए जिसमें भाजपा सरकारें भी शामिल हैं, बसपा जैसी पार्टी जिसके पास कोई राज्य सरकार नहीं थी उसको अंततः 104 करोड़ जमा कराने पड़े क्योंकि कोई और हिल्ला लगा ही नहीं।

वो कौन थे जिन्होंने 8 तारीख की रात 12 बजे तक तनिष्क और ऐसे ही ब्रांडेड ज्वेलरी के शोरूम में लाखों की खरीदारी की थी? और नॉन ब्रांडेड वालों के यहां तो मिड दिसम्बर तक पुराने नोटों में ज्वेलरी उपलब्ध थी, बुलियन मार्किट में सोने की ईंटो के डबल पैसे पुराने नोटों में क्या एलियंस ने दिए थे या पाकिस्तान से आये थे लोग?

देहात क्षेत्र हो या शहरी, हर बैंक मैनेजर को दबाव किसने दिया था कि नोट बदलने पड़ेंगे या… और इसका नतीजा ये हुआ कि कुछ तो दबाव में बदले गए, और बाकी सब कमाई के लिए, 20 से 30 प्रतिशत की दर पर!

कितने ही हिम्मत वाले बैंकर करोड़पति हो गए 50 दिन में ही… आपस मे ब्रांचों ने 4000 रुपये बदलने वालों की आईडी एक्सचेंज की और करोड़ों रुपये बदल डाले रातों रात…

लोगों ने अपने नौकरों, फैक्ट्रियों की लेबर को लगाया नोट बदलने की लाइनों में, उस दिन तनख्वाह के साथ हर वर्कर को एक्स्ट्रा पैसे ये सर्विस देने के।

अपने कामगारों को 6 महीने से 1 साल की तनख्वाह एडवांस दी, उनके जन धन खाते खुलवाए गए और उनमें रकमें जमा हुईं…

रिटेलरों ने अपने सप्लायरों को भर भर के पैसे दिए पेमेंट में, 90% उधारी तक लोगों की वसूली हो गई इस नोटबन्दी में…

ऐसे सभी व्यापार जिनमें सेल्स टैक्स/ वेट लागू नही हैं, जैसे कपड़ा, किताबें, गल्ला जो बहुत बड़ा वॉल्यूम भी रखते हैं, भारत में इसकी पूरी चेन में पुराने नोट घूमें नीचे से ऊपर तक…

मिल वालों को करोड़ों के हिसाब से एडवांस मिला, बिन सेल्स टैक्स वाले व्यापार में खातों की हेरा फेरी बहुत आसान है। आपको जब रिटर्न ही दाखिल नहीं करने होते तो आपके पास अनलिमिटेड टाइम था रकम एडजस्ट करने का और सबने किये…

बिल्डरों ने अपने कूड़ा पड़े फ्लैट/ मकान डेढ़ गुनी कीमत पर बेचे कैश रकम लेकर और जिनके मुकदमे आज चल रहे हैं क्योंकि डिलीवरी हुई ही नहीं, सबसे ज्यादा रकम इसी क्षेत्र में ठिकाने लगाई गई…

कुछ आंकड़े जन धन खातों से संबंधित

31/03/15 – खातों की संख्या 12 करोड़ 50 लाख – जमा रकम 1050 करोड़ रुपये
31/03/16 – खातों की संख्या 21 करोड़ 42 लाख – जमा रकम 3568 करोड़ रुपये
02/11/16 – खातों की संख्या 25 करोड़ 45 लाख – जमा रकम 4530 करोड़ रुपये
28/12/16 – खातों की संख्या 26 करोड़ 20 लाख – जमा रकम 7103 करोड़ रुपये

यानी नोटबन्दी के दौरान 75 लाख नए जन धन खाते खुले और इस बीच में 2573 करोड़ रुपये मात्र 50 दिन में ज्यादा जमा हुए।

31/03/17 – खातों की संख्या 28 करोड़ 16 लाख – जमा रकम 6300 करोड़ रुपये

यानी अगले 3 महीने में 2 करोड़ खाते बढ़ गए पर 800 करोड़ की जमा कम हो गई

22/08/18 – खातों की संख्या 32 करोड़ 78 लाख – जमा रकम 81523 करोड़ रुपये

यानी 2 साल से कम वक्त में जमा रकम 10 गुनी से ज्यादा हो चुकी है जन धन खातों में…

आज भारत मे लगभग 160 करोड़ बैंक खाते चालू हैं। ये आंकड़ा बहुत कुछ बताता है। लोगों की बैंकिंग आदतें बदली हैं, जमा रकम बहुत ज्यादा बढ़ी है, म्यूच्यूअल फंड इन्वेस्टमेंट बहुत ज्यादा बढ़ गया है (क्योंकि कैश कन्वर्ट हुआ नम्बर 1 में)।

जो लोग करोड़ों कैश में रखते थे उनकी आदत बनी बैंक ट्रांज़ेक्शन करने की…

एक तकलीफ ये भी है लोगों को, कि 1 हज़ार का नोट बन्द कर 2 हज़ार का शुरू किया तो इससे से और सुविधा हो गई लोगों को कैश रखने की, कम जगह में ज्यादा रकम।

तो भाई लोग, ये तो सोचो कि नोटबन्दी किसको लक्ष्य करके की गई थी? व्यापारी वर्ग तो कभी बड़ी रकम कैश छोड़ता ही नहीं है अपने पास। उसके पास हमेशा जुगाड़ मौजूद रहती है ठिकाने लगाने की।

नोटबन्दी का उद्देश्य था कि जो बेईमानी की रकम जमा है नेताओं और अफसरों के पास कैश में, उसको बर्बाद करना… जो वो लोग इन्वेस्ट कर चुके थे सोने और प्रॉपर्टी में उसका तो इलाज था ही नही कोई…

बहुत बड़ी मात्रा में (अंदाजन 2 लाख करोड़) नकली नोट मार्किट में थे, या आने वाले थे जो बुरी तरह बर्बाद हो गये (या बर्बाद किये गए नोट माफिया द्वारा), क्योंकि बहुत कम मात्रा में नकली नोट बैंकों में जमा हो पाए। यानी भारत को नकली नोट जो नुकसान दे रहे थे उससे बचाव हुआ…

नोटबन्दी एक सार्थक… सुविचारित… सही कदम था, जो मोदीजी ने बहुत ही साहसिक तरीके से उठाया… बस उनके आकलन में एक गलती थी…

वो थी हम लोगों की जुगाड़ प्रवृति को कम आंकना…

‘नोटबंदी फेल हुई’ की जगह बोलिए ‘भ्रष्टाचार ने की जीतने की कोशिश’

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