वाजपेयी की 2004 की हार : हिंदुत्व व राष्ट्रवाद के अहंकार व स्वार्थ द्वारा प्रायोजित आत्महत्या

मेरा मानना है कि किसी भी राष्ट्र के भविष्य के लिये, किसी का जन्म लेना इतना महत्वपूर्ण नहीं होता है जितना उसकी मृत्यु होती है। इसका कारण यही है कि जन्म, एक संभावना है, प्रस्तावना है लेकिन मृत्यु एक निश्चितता होती है, उपसंहार होता है।

इसी लिये मेरे लिये श्रद्धेय अटल बिहारी वाजपेयी की मृत्यु बड़ी महत्वपूर्ण है। आज भारत जहां उनकी मृत्यु पर, उनके प्रति जनता की श्रद्धा व प्रेम का साक्षी हुआ है, वहीं भारत इस बात का भी साक्षी रहा है जब इन्ही श्रद्धांजलि देने व रोने वाले लोगों में से एक वर्ग ने, 2004 में अपने अपने निजी स्वार्थों में, उनको अप्रत्यश्चित रूप से हराया था।

मैं यह समझता हूँ कि आज हम श्रद्धांजलि देने व महिमागान करने वाले लोगों के लिये वह बेला आ गयी है जब सत्य के दर्पण के सामने हमें अपने अपने अंतर्मन को नग्न कर यह पूछना होगा कि यदि अटल बिहारी वाजपेयी जी इतने ही अच्छे थे तो 2004 में उनकी हार क्यों हुई थी?

आज यह प्रश्न, हमारे जैसे हिंदुत्ववादी व राष्ट्रवादी विचारधारा को रखने वाले लोगों के लिये विशेष है क्योंकि इन्होंने ही अटल बिहारी वाजपेयी जी को लगातार तीन बार, 13, दिन, 13 महीने और फिर पूर्णकालिक रूप से सरकार चलाने के लिये जिताया था।

जब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार हारी थी, तब हम सब स्तब्ध रह गये थे क्योंकि इस बात की यह बिल्कुल भी आशा नहीं थी कि हिंदुत्व व राष्ट्र का चिंतन करने वाले में से एक वर्ग, अपने अहंकार व अल्पकालीन स्वार्थ के लिये, हिन्दुओं को ही राक्षसी शक्तियों के सामने परोस देगा।

यह एक अकाट्य सत्य है कि वाजपेयी जी, हिंदुत्व की विचारधारा को सत्ता तक लाये थे। उन्होंने, हिंदुत्व को सत्ता के लिये परिपक्व बनाने के लिये, व्यवहारिकता का हाथ थाम कर गठबंधन के सदस्यों से समझौते भी किये थे।

इस सबके बाद भी जब उन्होंने भारत के विकास के लिये, ईमानदारी से दीर्घकालीन कार्य किये थे तब यह प्रश्न बिल्कुल खड़ा होता है कि उनको विफल हुआ मानकर, उनसे विमुख, बाल चेतना या स्वप्न से समग्र हिंदुत्व के चिंतक कहां विफल हुए थे?

मेरा दृढ़ता से यह मानना है कि नेहरू युग की राजनीति करने वाले अटल जी यदि विफल थे तो उनसे ज्यादा विफल हिन्दू को जाग्रत करने वाले व राष्ट्र के चिंतक हुए थे।

वाजपेयी जी, हिंदुत्व की राजनैतिक इकाई बीजेपी का नेतृत्व कर रहे थे और वह एक ऐसी इकाई थी जिसका मतदाता शहर का माना जाता रहा था और उसी ने उसको सत्ता तक पहुंचाया भी था।

यह काल की विडंबना ही थी कि जिस बीजेपी का 2014 तक विपक्ष बनिया पार्टी, शहरी पार्टी, सवर्ण हिन्दुओ की पार्टी कह कर उपहास करती थी, उसी को 2004 में इसी शहरी, सवर्ण और व्यापारी (बनिया) मतदाता ने वाजपेयी जी की सरकार को हराया था।

इसी के साथ यह भी सत्य है कि वाजपेयी सरकार की हार को ‘इंडिया शाइनिंग’ के मत्थे डाल कर, बीजेपी का परंपरागत मतदाता सुकून से अपने अपराधबोध को छुपा गया था।

सत्य तो यह है कि वाजपेयी जी की सरकार ‘इंडिया शाइनिंग’ के कारण हारी थी यह अनभिज्ञता सबसे बड़ा असत्य थी। लेकिन इसे स्वीकारा गया क्योंकि यह जहां विपक्ष के लिये हिंदुत्व व राष्ट्रवादी विचारधारा के भारत के विकासोन्मुख पहल की पराजय सुखद थी, वहीं वाजपेयी जी की सरकार को हराने में योगदान देने वाले हिन्दुओं को अपने अहंकार को प्रदर्शित करने व स्वार्थ को छुपाने के लिये सुविधापूर्ण था।

सत्य तो यह था कि अटल जी की ‘इंडिया शाइनिंग’ की दृष्टि सफल थी। वे, हिंदुत्व व राष्ट्रवादी विचारधारा को अपने कर्म द्वारा भारत के ग्रामीणांचल तक पहुचाने में सफल हुये थे।

वे गांव में सफल हुए लेकिन उनके शहर ने ही उन्हें हराया था। उनके शहर के परंपरागत सवर्ण, मध्यम वर्ग और व्यापारी वर्ग के मतदाता ने या तो अल्पकालीन स्वार्थवश, उनको मत ही नहीं दिया था या फिर अहंकारवश रूष्ट हो कर अपने घर से ही नहीं निकले थे।

अटल जी, जहां शहर में हारे थे वही ग्रामीण क्षेत्र में रिकार्ड सीटों व मतों से जीते थे। यह 2004 का सत्य है कि अटल जी ने बीजेपी को शहर के सभ्रांत वर्ग से, अपनी पार्टी को भारत के ग्रामीण आँचल में स्थापित कर दिया था।

यह सारा किया कराया उस शहरी मध्यमवर्गी हिन्दुओं (विशेषकर सवर्ण) का था जो एक तरफ प्याज, दाल और पेट्रोल की कीमतों पर अपने स्वार्थ के लिये, अपने पूर्वजों की तरह बिकने को तैयार थे या फिर वे, दीर्घकालीन दृष्टि से अभावग्रस्त, तथाकथित कट्टर हिन्दू थे, जो काल के गणित को चंद वर्षों में समेटे जाने की दुस्साहसी अपेक्षा रखते थे।

वास्तविकता तो यह है कि इस दुस्साहसी रक्तिम स्वप्न को, एक ही कार्यकाल में पूरा हो जाने की अपेक्षा करना हिंदुत्व के साथ ही क्रूरता थी। इस क्रूरता का परिणाम यही हुआ कि 2004 में अटल जी की नेतृत्व में हिन्दुओ की राजनैतिक इकाई, बीजेपी की हार में, हिन्दू की ही विफलता सामने आई थी।

और परिणाम?

बौद्धिक व वैचारिक रूप से शुद्ध हिन्दू राष्ट्र के चिंतकों ने, अपने बौद्धिक व आर्थिक स्वार्थ के लिये 2004 में विमुखता का प्रदर्शन करके, आज के काल का ‘नोटा’ का प्रतिनिधित्व किया था।

इन हिन्दुओं की इसी स्वार्थपरक विमुखता ने, आगामी एक दशक के लिए भारत व उसके हिंदुओं को, इटैलियन सोनिया गांधी परिवार के नेतृत्व में वामपंथियों, ईसाइयों और इस्लामियों के बीच नोचे जाने के लिये फेंक दिया था।

लोगों को अटल जी के अवसान की घड़ी को समझना है तो आरएसएस सरसंघचालक सुदर्शन जी द्वारा एनडीटीवी पर शेखर गुप्ता को ‘वाक एंड टॉक’ कार्यक्रम में दिये इंटरव्यू को सुनना चाहिये।

यह इंटरव्यू इस बात पर मोहर लगाता है कि वाजपेयी सरकार के हारने का वास्तविक कारण स्वयं हिन्दू था। वे इसलिये नहीं हारे थे कि वे असफल थे, बल्कि हिंदुत्व के ध्वजावाहकों ने दीर्घकालीन राजनैतिक सत्ता के महत्व को नकार कर, राजनैतिक इकाई के मान का मर्दन करने के लिये, उनसे विमुख हो कर हराया था।

यह वाजपेयी जी के हराने के बाद लोगों का ही दम्भ था जिसने वाजपेयी जी के प्रधानमंत्रित्व काल की उपलब्धियों की अनदेखी कर के, इंदिरा गांधी व नरसिम्हा राव के काल को सर्वश्रेठ बताया था।

अटल जी से विमुख हो कर 2004 में उनकी पराजय का कारण बने लोगों से, इतिहास हम सबको, जून 1947 में पहले ही मिला चुका है। मैं उस घटना को जब भी याद करता हूँ तो एक सिहरन सी दौड़ जाती है।

यह घटना, भारत पाकिस्तान के बंटवारे पर अंतिम मुहर लगाये जाने के बाद, गांधी जी, जिन्होंने कहा था कि बंटवारा उनकी लाश पर होगा और खान अब्दुल गफ्फार खान, जिन्हें फ्रंटियर गांधी भी कहा जाता था, के बीच हुई वार्ता की थी।

गांधी जी, बंटवारे के लिए सहमति दे कर जब लौट तो, बंटवारे के अनुसार, खान अब्दुल गफ्फार खान का नॉर्थ वेस्ट फ्रंटियर पाकिस्तान के हिस्से में चला गया था। गफ्फार खान ने गांधी जी की तरफ बड़ी कातर दृष्टि से देखते हुये कहा था कि, ‘व्हाट हैव यू डन! यू हैव थ्रोन अस टू द वूल्व्स!’ (ये आपने क्या किया! आपने हमें भेड़ियों के बीच फेंक दिया!)

जब 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी जी को हम हिन्दुओं ने हराया था तब यही उदगार मेरे जैसे लोगों के भी थे। 2004 में ऐसे हिन्दू और हिंदुत्व के चिंतक, गांधी थे और हम जैसे लोग, खान अब्दुल गफ्फार खान बना दिये गये थे।

विचारधारा की सत्ता रहेगी तो विचारधारा की आयु बढ़ेगी

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