वीडियो : कब तक गंगा जमुना में चलाते रहोगे अपनी सहूलियतों की नाव

व्हाट्सएप पर पिछले दिनों एक वीडियो मुझे कई बार मिला, जिसमें एक गुरूद्वारे में गुरबानी के समय एक मुस्लिम नमाज अदा कर रहा हैं।

इसे सिक्ख और मुस्लिम्स दोनों तरफ से जम कर प्रचारित किया जा रहा हैं। इसे गंगा जमनी संस्कृति का पैगाम माना जा रहा कि देखिये इसे कहते हैं भाईचारा, अमन की आशा, इंसानियत का जज्बा, मानवता की मिसाल, ब्लाह ब्लाह ब्लाह ब्लाह…

क्या बकवास हैं यार, आप लोग वैसे ही क्यों सोचने लग जाते हो जैसा कि आपको न्यूज़ देने वाला सोचने के लिए प्रेरित करना चाहता हो?

जिन हिन्दू मित्रों को इस दृश्य से आपत्ति है उन्हें स्पष्ट कर दूँ कि गुरूद्वारे में बैठ कर आप जो चाहे ईश्वर की आराधना कर सकते हैं। उसके लिए कोई मनाही नहीं है, बशर्ते उससे दूसरों को खलल ना होता हो, जैसे कि ढोलक, मंजीरे, घंटी या और किसी चीज़ का इस्तेमाल करना।

आप अपनी धर्म पुस्तक लेकर, माला लेकर अपनी आराधना निर्विघ्न कर सकते हैं, कोई मना नहीं करेगा, ऐसा मुझे यकीन हैं। गुरुग्रंथ साहिब में राम, हरि, ठाकुर, गोपाल, जैसे संबोधन वाहे गुरु से सैकड़ों बार ज्यादा आते हैं, सो ऐसा कोई इश्यू नहीं है।

गुरुद्वारों के यात्री निवास में किसी भी धर्म के अनुयायी ठहर सकते हैं, लंगर खा सकते हैं, सिखिज़्म का कोई नियम किसी को मना करने का नहीं है। जो गुरूद्वारे आता है वह किसी भी सिक्ख के लिए श्रध्देय माना गया है, बेशक वह अपने किसी अलग ईश्वर, अल्ला, गॉड का उपासक हो।

जो सिक्ख इसे प्रचारित कर रहे हैं उनसे मैं यह कहना चाहता हूँ कि किसी मुस्लिम से औरंगज़ेब के सन्दर्भ में बात कर के देखिये कि क्या वह औरंगज़ेब को क्रूर हत्यारा मानता है या ज़िंदा पीर मानता है?

उससे उसकी नमाज के बाद जानिये कि क्या वह गुरु परिवारों की हत्या को ज़ुल्मो सितम मानता है या जायज समझता है? पूछिये उससे यहाँ नमाज जायज़ कैसे हो सकती हैं जब कि तुम लाउडस्पीकर में चिल्ला चिल्ला कर सबको बताते हो कि अल्लाह के सिवा और कोई पूजनीय नहीं है? पूछिये उससे क्या वह समय आने पर इस इंसानियत के लिए खड़ा रहेगा या अपने मज़हब के लिए खड़ा रहेगा?

जो मुस्लिम्स इसे प्रचारित कर के गंगा जमुनी संस्कृति की मिसाल दे रहे हैं और इसके उदहारण दे कर हिन्दुओ को सीख लेने की नसीहते दे रहे हैं, उनसे मैं यह जानना चाहता हूँ कि कब तक दूसरों के उदाहरण देते रहोगे?

सिर्फ अपनी सुविधा के लिए दूसरों के धर्म स्थलों का उपयोग ही करना आता हैं? क्या ऐसा करना शिर्क नहीं हैं, कुफ्र नहीं हैं? क्योंकि मामला अपनी सुविधा का जो है!

केरल की बाढ़ से लेकर रोहिंग्या, इराक, सीरिया में गुरुद्वारों का लंगर खाना भी हराम नहीं हैं क्योंकि मुसीबत में सब जायज़ हो जाता है! लेकिन जब मस्जिद में किसी दूसरे धर्म को तनिक भी, एक सुई बराबर जगह देने की बात आती हैं तो इस्लाम खतरे में क्यों आ जाता है?

क्या किसी आपदा में आप लोग मस्जिद में सिक्ख को गुरबानी का पाठ करने की उदारता दिखा सकते हैं? क्या आप मस्जिद में हिन्दुओं को हनुमान चालीसा का पाठ करने की इजाज़त दे सकते हैं? नहीं देंगे, मैं जानता हूँ यह नामुमकिन है। आपको सिर्फ उपभोग करना आता है, देना नहीं आता!

तो जनाब, कब तक गंगा जमुना में अपनी सहूलियतों की नाव चलाते रहोगे जिसमें दूसरे धर्म मानने वालों के लिए जगह ना हो?

क्योंकि उनकी मीडिया और विपक्ष आर्मी से सबूत नहीं मांगते, सिर्फ कार्यवाही चाहते हैं

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