संत-महंत-पुजारियों के संदर्भ में, श्रीराम जन्मभूमि पर चर्चा – भाग 2

करीब 25 वर्षों से वैष्णोदेवी दर्शन के लिए जा रहा हूँ। वहाँ की स्वच्छता और व्यवस्था को देखकर प्रभावित होता हूँ। कोई भी होगा।

जो कोई भी वहाँ जाता होगा, मन ही मन, जाने-अनजाने, वहाँ की तुलना अपने स्थानीय मंदिर से जरूर करता होगा। हजारों की भीड़ के बावजूद वैष्णोदेवी का सुचारु रूप से चलाया जा रहा प्रबंधन प्रशंसा के योग्य है।

वैसे पहले पहल जब मैं वहाँ गया था तो पता चला था कि यह सब व्यवस्था गवर्नर जगमोहन के अथक प्रयासों का परिणाम है। अन्यथा पूर्व में स्थिति यहां की भी भिन्न नहीं थी।

कोई कह सकता है कि हम भारतीय स्वच्छता को लेकर सजग नहीं, और गंदगी के साथ अव्यवस्था फैलाने में माहिर हैं।

यह अर्धसत्य है। अगर यह पूर्ण सत्य होता तो हम विदेशों में भी ऐसा ही व्यवहार करते। और फिर जगमोहन के जाते ही कटरा को भी पुरानी स्थिति में ले आते।

जबकि सत्य यह है कि तब से लेकर अबतक श्राइन बोर्ड ने श्रद्धालुओं को अनेक अतिरिक्त और बेहतर सुविधाएँ और सेवाएं प्रदान की है। और भक्तों ने भी इसमें सहयोग किया है। असल में हमें जैसा वातावरण मिलता है उसमें हम अपने आपको जल्द ही ढाल लेते हैं।

इस बात का एक और प्रमाण तिरुपति बालाजी हैं। जब तिरुपति गया था तो वहाँ की व्यवस्था देखकर अचंभित हुआ था। लाखों की भीड़ के बाद भी ऐसी साफ़-सफाई और अनुशासित व्यवस्था, देखकर कोई भी भारतीय गर्व कर सकता है।

तिरुपति-बालाजी ट्रस्ट तो अनेक जनकल्याणकारी और सामाजिक कार्य भी करता है। मंदिर में दर्शन के लिए आनेवाले भक्तों की हर सुविधा का ध्यान रखता है। कतार में लगते ही, भक्तों के लिए रास्ते भर जगह जगह जनसुविधाएं हैं, जो साफ-सुथरे होते हैं। समय समय पर खाने-पीने के लिए भी दिया जाता है, यहां तक कि गरम-गरम दूध भी पिलाया जाता है।

दर्शन के बाद अंत में खिचड़ी या विशेष लड्डू प्रसाद के रूप में हर भक्त को दिया जाता है। देवस्थान के पास ही अन्नप्रसादम है, जहां सुबह से देर रात तक सादा-ताजा और स्वादिष्ट भोजन मुफ्त में परोसा जाता हैं।

यहां कोई भी वर्ण व वर्ग भेद नहीं, अमीर-गरीब छोटा-बड़ा, सभी को क्रमवार एक ही पंक्ति में बिठाकर एक सा भोजन परोसा जाता है। यह एक तरह से लंगर ही है। और ऐसे लंगर वैष्णोदेवी में भी प्रवेशद्वार पर हैं।

ऐसी ही व्यवस्था अयोध्या में क्यों नहीं हो सकती? यह सब करने के लिए कौन रोक रहा है? क्या स्वच्छता, व्यवस्था व जनसुविधाओं के लिए किसी से इजाज़त लेनी पड़ती है? ऐसे ही अनेक सवाल, अयोध्या में हनुमानगढ़ी से लेकर श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन करके जब सरयूजी के घाट पर बैठा तो मन में उठे थे।

वैसे तो जब अयोध्या जा रहा था तो उपरोक्त में से किसी भी तरह की कोई विशेष उम्मीद नहीं थी। जाने का मूल उद्देश्य रामलला के दर्शन करने मात्र का था, इसलिए संत-महंतों से कोई अपेक्षा भी नहीं थी।

ऐसे में जब वहाँ पहुंचकर सड़क पर झाड़ू लगाते अनेक कर्मचारियों को देखा तो मन प्रसन्न हुआ था। सड़क पर सफाई उतनी भी बुरी नहीं थी, जबकि गौ माताएं स्वतंत्र रूप से विचर रही थीं।

साथ ही चारों ओर अधिकांश जनता ग्रामीण नजर आ रही थी। उनमें भी अधिकतर गरीब ही लग रहे थे। हिंदुत्व में आस्था इसी वर्ग की अधिक है। इन्हीं के मज़बूत कंधों के सहारे सनातन संस्कृति की अविरल धारा बह रही है।

रामलला के दर्शन के लिए जब लाइन में लगा तो लोहे के जाल में से गुजरते समय दो-चार जगह पानी के नल की व्यवस्था दिखी। अर्थात गरीब को कम से कम प्यास बुझाने के लिए पानी की बोतल नहीं खरीदनी पड़ेगी। रामलला के ऊपर लगा हुआ टेंट भी साफ़-सुथरा और विशाल नजर आया। यह सब देखकर मन को तनिक संतोष हुआ था।

बाद में बातचीत से पता चला कि जो कुछ थोड़ा बहुत काम नज़र आ रहा है वो सब श्रीराम की सरकार आने के बाद ही हुआ है। यकीनन और भी बहुत कुछ है जो हो सकता है और बहुत कुछ किया भी जाना चाहिए। मंदिर निर्माण के अतिरिक्त सब कुछ सम्भव है और उसके लिए किसी से भी किसी भी तरह की अनुमति की भी आवश्यकता नहीं। तो फिर किस का इंतज़ार हो रहा है?

जब दोपहर में पेट पूजा की बात आयी तो पता चला कि कुछ एक भोजनालय और रसोई हैं। लंगर कभी कभी कहीं कहीं चलता है जिसकी जानकारी भी ठीक से नहीं हो पाती। जबकि प्रसाद की अनेक दुकानें नज़र आ रही थीं।

हम एक लोकप्रिय रसोई में पहुंचे थे। वहाँ दो तरह की थाली उपलब्ध थी, एक 50 रूपये की और दूसरी 150 की। बतलाया गया कि महंगी वाली थाली वातानुकूलित हॉल में खाने की व्यवस्था है। जब वहाँ का वातानुकूलन देखा तो उसपर टिप्पणी करने पर विषयांतर हो जाएगा।

मेरे लिए यह सब वैसे भी महत्वपूर्ण नहीं। 150 रूपये महत्वपूर्ण थे। जिन भक्तों को मैं सड़क पर देख आया था उनमें से कितने लोग यह रकम दे सकते हैं? जवाब के लिए हॉल में देखा तो वहाँ हमारे अलावा एक परिवार और था, बस।

बगल के 50 रुपये वाले हॉल में झाँका तो वहाँ भी मुश्किल से दस-बीस लोग ही होंगे। यह संख्या ये बतलाने के लिए काफी है कि पचास रूपये भी आज की तारीख में गरीब भक्त के लिए बहुत होते हैं।

माना कि यह रसोई किसी सेठ की है जो इसे नो प्रॉफिट नो लॉस पर चला रहा है, मगर मेरे मन में सवाल उठा कि यह पचास रूपये भी क्यों? सवाल तो और भी तेज़ी से घूमने लगे थे जबकि भोजन शुद्ध, देशी और स्वादिष्ट था।

क्या इतने विशाल देश में एक भी सेठ नहीं जो अयोध्या में नियमित लंगर मुफ्त में चला सके? क्या कोई एक धनवान नहीं जो अपनी तिजोरी इन रामभक्तों के भोजन के लिए खोल सके? क्या इस से बड़ा पुण्य का काम कोई और हो सकता है?

सुना है दुनिया के अनेक अमीर हिन्दुस्थान में रहते हैं, उन्हें शायद अपने धन का ओर-छोर भी नहीं पता होगा, क्या उनमें से एक भी ऐसा नहीं जो मात्र पचास रुपये खर्च कर सके? क्या किसी के बैंक में इतना अतिरिक्त धन नहीं कि वो रामभक्तों को मुफ्त खाना खिला सके?

ज़्यादा कुछ नहीं तो वर्षभर दाल-रोटी या कढ़ी-चावल तो खिलाया जा ही सकता है। कितने लगेंगे? पचास रुपये से भी कहीं कम। और फिर क्या यह कहावत नहीं याद कि पूत सपूत तो क्यों धन संचय, पूत कपूत तो क्यों धन संचय।

आपका पैसा बैंक में रखे रखे सड़ जाए उस से तो कहीं अच्छा है कि इसे धर्मार्थ कहीं लगा दिया जाए। इस वक्त अयोध्या से बेहतर और कौन सा स्थान पुण्यकार्य के लिए हो सकता है?

अच्छा यह भी छोड़ो, क्या देश-विदेश में ऐसी एक भी हिन्दू संस्था नहीं, जो हर श्रद्धालु को रामलला के दर्शन से निकलते ही प्रसाद के रूप में अयोध्या का ही प्रसिद्ध एक पेड़ा दे सके?

हिन्दू के नाम से ना जाने कितनी संस्थाएं हैं, उनकी प्राथमिकताओं में ज़मीन से जुड़े हुए मूलभूत बेसिक काम क्यों नहीं होते? वो भी अयोध्या में, जो हिन्दू आस्था का केंद्र है?

क्या यह बतलाने की आवश्यकता है कि भूखे-भक्त को भोजन कराने और प्यासे को पानी पिलाने जैसा धर्म और पुण्य का काम कोई और नहीं। शास्त्रानुसार भी इससे बड़ा कोई धर्म का काम नहीं। इन छोटी-छोटी बातो से भी समाज को व्यवहारिक रूप से कितने लाभ हो सकते हैं यहां यह समझाने की आवश्यकता नहीं लगती।

और फिर इन सब काम के लिए कुछ विशेष करने की आवश्यकता नहीं, थोड़े से धन के साथ साथ नि:स्वार्थ भाव से काम करने वाले कुछ एक समर्पित हाथ चाहिए, बस। और फिर सेठ व्यापारी ही क्यों, कोई मठ-अखाड़ा, मंदिर या हिन्दू बाबा की संस्था यह सब काम क्यों नहीं कर सकती?

यह काम असल में इन धर्मगुरुओं का ही है जो कि दान पर निर्भर करता है। जहां तक रही सरकार वाले काम की बात, तो वो सरकार से करवाए जाएंगे, उस पर आगे विस्तार से बात होगी, मगर जो जिसका काम है वो तो उसको ही करना होगा।

आखिरकार मंदिर में आने वाले भक्तों की देखभाल की जिम्मेवारी किसकी होती है? क्या हम आने वाले भक्तों को एक कप चाय भी नहीं पिला सकते? क्या यह बतलाने की आवश्यकता है कि देवता भक्तों के आने से प्रसन्न होते हैं, अकेले संतो से नहीं। मंदिर की महत्ता श्रद्धालुओं की आस्था से है ना कि पुजारियों से।

जगन्नाथपुरी में मिलने वाली विशेष खिचड़ी हो या फिर तिरुपति बालाजी में दिए जाने वाला विशेष लडडू, इसका स्वाद भक्त अपने साथ ले जाता है। वैष्णोदेवी में परोसा जाने वाला चना-हलुआ, हर भक्त को उसके पारम्परिक संस्कारों से जोड़ता है।

अयोध्या में मिलने वाले भुने हुए खोये के पेड़े का अपना अनोखा स्वाद है। रामलला के दर्शन के बाद जब कोई भक्त यह पेड़ा प्रसाद रूप में पायेगा तो उसके ‘जय श्रीराम’ के जयकारे में कितनी मिठास होगी इसकी कल्पना सहज की जा सकती है। वो इसका स्वाद भी रामनाम के साथ अयोध्या से ले जाएगा।

यह सच है कि उपरोक्त व्यवस्था मूल रूप से अयोध्या के किसी संत-महंत या पुजारी को करनी चाहिए। मगर ज़मीन पर इन सब की आपस में क्या स्थिति है किसी से छिपी नहीं।

आज श्रीराम की अयोध्या देश की राजनीति के केंद्र में है, विश्व की निगाहें इस पर टिकी हुई हैं। ऐसे में इनका व्यवहार कितना महत्वपूर्ण हो जाता है, क्या इन विद्वानों को बताने की आवश्यकता है?

इस वक्त अयोध्या एक इतिहास रचने जा रहा है, ये ज्ञानी इसमें अपने आप को किन अक्षरों में अंकित करना चाहेंगे, क्या इन्हें समझाने की ज़रूरत है? सच कहें तो यहां के संतो-महंतों को देश-दुनिया को एक उदाहरण पेश करने का यह सुनहरा मौका है। इस वक्त वे अपनी जिम्मेवारी अधिक सजगता से पूरी करके विश्व को उदाहरण पेश कर सकते हैं।

यही नहीं, वे सनातन समाज का उद्धार भी कर सकते हैं। मगर स्थिति इसके ठीक विपरीत है। यह सभी जानते हैं कि हनुमान कभी श्रीराम से अलग नहीं हो पाए, लक्ष्मण अलग होने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, श्रीराम कभी सीता से अलग नहीं हुए, मगर उनके संत-महंत उनके ही अलग अलग मंदिर बनाकर कभी एक साथ नहीं आ पाते। इसे किस रूप में लिया जाए? यह एक अनुत्तरित प्रश्न है।

अंत में एक महत्वपूर्ण सवाल अयोध्या के सभी महंत और महात्माओं से, कि यकीनन एक दिन मंदिर बनेगा, ज़रूर बनेगा, मगर क्या उस भव्य मंदिर में आप आज की व्यवस्था के साथ प्रवेश करना चाहेंगे? क्या कभी सोचा है कि श्रीराम क्या करते?

कम से कम अपने रामराज्य में अपने भक्तों की ऐसी दुर्दशा कभी स्वीकार नहीं करते। सत्य तो यह है कि रामलला को महल में स्थापित कर देने मात्र से श्रीराम कभी खुश नहीं होंगे।

जय श्रीराम

राम-भक्तों के संदर्भ में, श्रीराम जन्मभूमि पर चर्चा – भाग 1

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY