ज्योतिषाचार्य राहुल सिंह राठौड़ : शिष्य मक्खलि गोसाल के

पिछले साल 7 दिसम्बर, 2017 को डॉ. अम्बेडकर अंतर्राष्ट्रीय केन्द्र का माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के द्वारा भव्य उद्घाटन होना था. कार्यक्रम का समय सुबह ग्यारह बजे था. जब प्रधानमंत्री किसी कार्यक्रम में आनेवाले होते हैं तो सुरक्षा कारणों से एक घंटा पहले तक में ही प्रवेश की सारी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाती हैं.

हमलोग भाजपा के कार्यकर्ता हैं तो हमलोगों का वहाँ पहुँचना अनिवार्य था. ठण्ड के दिन थे, इसलिए जाने की इच्छा नहीं हो रही थी. वहाँ जाने के लिए मन मारकर सुबह पाँच बजे उठा और सात बजे घर से निकल गया. वहाँ प्रवेश द्वार पर पहुँचा तो देखा कि मैं जल्दी आ गया हूँ और हमारे बुद्धिजीवी प्रकोष्ठ के अन्य साथी रास्ते में हैं और उन्हें आने में थोड़ा समय लगेगा. इसलिए मुझे अकेले ही अन्दर प्रवेश करना पड़ा.

सर्दी के दिन होने के कारण कार्यक्रम खुले मैदान में रखा गया था, जहाँ लगभग सात हजार लोगों के बैठने की व्यवस्था थी. मुझे एक अपरिचित अंकल के बगल में सीट मिल गई, मैं वहीं बैठ गया. थोड़ी देर में धूप बहुत तेज हो गई. लोग अपने-अपने इन्विटेशन कार्ड से अपने चेहरे को सूर्य के प्रखर ताप से बचाने का भरसक प्रयास कर रहे थे.

अभी सिर्फ सुबह के साढ़े नौ बजे थे, ग्यारह बजे तो प्रधानमंत्री आयेंगे और उसके बाद दोपहर एक बजे तक धूप में ऐसे ही जलना था, ये कल्पना ही सिहरन पैदा कर दे रही थी. मन बहुत खिन्न हो रहा था. सुबह घर से निकलते समय सॉफ्टवेयर में कुण्डली देखकर निकला था, समय मेरे लिए बहुत ही अधिक शुभ था. लेकिन इस बेचैनी में मुझे कोई शुभता दीख नहीं रही थी.

मेरे बगल में बैठे अंकल टाइम पास के लिए मुझसे बात करने लगें. उनका नाम अरविन्द कथूरिया था. वे नैशनल बैकवर्ड क्लासेज फाइनेंस एंड डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के जनरल मैनेजर थे. उनका काम माननीय मंत्री थावरचंद गहलोत जी के सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से सम्बंधित था. वे बोले कि उनके मंत्रालय से संबंधित ही ये कार्यक्रम था, इसलिए प्रोटोकॉल के तहत आना पड़ा. उनकी उम्र करीब पचपन साल होगी, उनका गेटअप और बात करने का अंदाज किसी गंभीर नौकरशाह जैसा था. देखकर बिलकुल सेक्युलर टाइप व्यक्ति लग रहे थे.

वे मुझसे पूछने लगें कि आप किस मंत्रालय के किस अनुषांगिक कंपनी के लिए यहाँ आये हैं? मैंने कहा कि मैं पार्टी का कार्यकर्ता हूँ, इसलिए आया हूँ. फिर वो मुझसे पूछने लगें कि आपकी क्या महात्वाकांक्षा है मतलब किस उद्देश्य से लगे हुए हैं? जो मेरे मन में था अचानक से निकल गया.

मैंने कहा कि अभी नरेन्द्र मोदी जी प्रधानमंत्री बने रहें, इनके बाद योगी आदित्यनाथ जी और उनके बाद कोई उन्हीं जैसा भगवा के लिए वफादार सत्ता के शीर्ष पर बैठा रहे, बस यही मनोकामना है. उन्होंने आश्चर्य से पूछा कि आपने अपने लिए कोई उद्देश्य निर्धारित नहीं किया है? मैंने कहा ये उद्देश्य अपना ही तो है. इस भगवा ध्वज को जब लहराते देखता हूँ तो ऐसा लगता है जैसे सबकुछ मिल गया, अब और कुछ पाने की चाहत न रही.

ये सुनने के बाद पता नहीं उन्हें क्या हो गया. एक कठोर, घाघ अधिकारी के भीतर से एक परमहंस योगानंद जी के संस्था से बहुत करीब से जुड़ा हुआ एक क्रिया योगी निकल आया. वो मुझसे क्रिया योग की बातें करने लगें. तब तक प्रधानमंत्री जी मंचासीन होकर सामाजिक न्याय पर भाषण दे रहे थें और बाबा साहब अम्बेडकर की बारम्बार वंदना कर रहे थें.

लेकिन अरविन्द जी इन सब से बेपरवाह कभी अपने मुँह पर इन्विटेशन कार्ड की ओट में भजन गुनगुनाते तो कभी अपने गुरू की निशानी निकाल कर मुझसे कहते कि लीजिए आप भी इस फूल को छूकर आशीर्वाद ले लीजिए.

इसी बीच उन्होंने एक ऐसी बात कह दी जो सीधे मेरे दिल पर लग गई. वो बोले कि कोशिश रहती है कि दोनों समय साधना कर लूँ. गुरू जी ने कहा है कि जीव अगर ईमानदारी से ऐसे ही लगा रहा तो दो-तीन जन्म में परमलक्ष्य सध जायेगा और नि:श्रेयस की उपलब्धि हो जायेगी. उनके ये शब्द मुझे अन्दर तक झकझोर दिया कि ये बेचारे इतने भागमभाग की जिन्दगी में भी दोनों समय साधना करते हैं और फिर भी दो-तीन जन्म का टारगेट लेकर चल रहे हैं और एक मैं हूँ, जिसे करना-धरना कुछ नहीं और प्रतीक्षा कर रहा हूँ कि साक्षात नारायण मेरे लिए विमान लेकर ले जाने कब आयेंगे? वो दिन सचमुच शुभ था, क्योंकि क्रिया योग की दीक्षा तो 28 अक्टूबर, 2017 को ही ले लिया था पर मैं अभ्यास नहीं कर रहा था, लेकिन अंकल से मिलने के दूसरे दिन से ही क्रिया लगभग नियमित हो गया.

इसी बीच एक मजेदार बात और हुई थी. दिल्ली की ठण्ड में प्रतिदिन स्नान करना ओलंपिक जीतने से भी दुरुह काम है. मेरे बाल कुछ झड़ने लगे हैं तो मैं बालों के स्पेशलिस्ट संदीप शर्मा जी से नवम्बर के महीने से ट्रीटमेंट करवा रहा था. उन्होंने प्रतिदिन शेम्पू लगाने के लिए दिया. उस शेम्पू को बालों में लगाकर सात मिनट के लिए छोड़ देना था, उसके बाद धोना था.

अब बाथरूम में घड़ी लेकर तो जा नहीं सकते, इसलिए मैंने कैलकुलेट किया कि एकबार गायत्री मंत्र जपने में दस सेकेंड का समय लगता है, इस प्रकार एक मिनट में छ: गायत्री मंत्र और सात मिनट में बयालीस गायत्री मंत्र जपना होगा. अब जब सारे कपड़े इत्यादि धोने के बाद में ही स्नान करना है तो स्वाभाविक है कि दिगम्बर अवस्था में ही ठण्ड में ठिठुरते हुए, सिर को गीला रखते हुए शेम्पू करके छोड़ना था और साथ में आज्ञा चक्र में ध्यान करते हुए बयालीस बार गायत्री मंत्र का जप करना था. इस हठ योग को क्रिया योग आरम्भ करने के पचीस दिन पहले से ही ईश्वर ने मुझसे शुरू करवा दिया था.

उस कार्यक्रम में मेरा जल्दी पहुँच जाना और अपने साथियों से अलग बैठना, सात हजार लोगों के बीच उन क्रिया योगी के बगल के सीट पर बैठना, ये सब नियति द्वारा निर्धारित थी. उसी जगह मेरे आगे वाले सीट पर भाजपा पूर्वांचल मोर्चा के मनीष सिंह बैठे थें, उस डेट तक मेरा उनसे परिचय नहीं हुआ था, उसके दस दिनों बाद मेरा उनसे परिचय हुआ. अगर उससे पूर्व परिचय हो गया होता तो हमलोग वहाँ ऐसी आध्यात्मिक बातें नहीं कर पातें. मैं हैरान हो जाता हूँ ये सोचकर कि वो परमात्मा इतना कुछ कैसे मैनेज करता है और वो भी इतने परफेक्शन के साथ कि उससे बेस्ट की कोई संभावना ही नहीं हो सकती.

इधर पचीस दिनों से काफी परेशान हूँ. बिहार भाजपा के पदाधिकारी मिथिलेश कुमार सिंह जी जो मेरे लिए मित्र भी हैं और भाई भी हैं, उनके स्पाइनल कॉर्ड में कुछ समस्या हो गई है. पटना के डॉक्टरों ने एमआरआई करवा कर टीबी की दवा खिलाने लगें. सात महीने में कोई सुधार नहीं हुआ. दिल्ली के डॉक्टरों ने बहुत जाँच करवाये, फिर भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच रहे हैं, इतने खतरनाक बीमारी होने की संभावना व्यक्त कर रहे हैं कि दिल दहल जा रहा है. इसी डर के माहौल में मेरे पेट में बहुत दिनों से हो रहे दर्द के लिए अल्ट्रासाउंड किया तो किडनी में स्वेलिंग निकल गया. मेरा तुला लग्न है और लग्नेश शुक्र अभी मेरे बारहवें घर में नीच राशि कन्या में गोचर कर रहा है. अभी मेरी प्रत्यान्तर दशा भी शुक्र की ही चल रही है. बारहवाँ घर अस्पताल का प्रतिनिधित्व करता है, शुक्र की दशा और बारहवें घर में गोचर वर्षों बाद भय के माहौल में अस्पतालों के चक्कर लगवा रहा है.

इन सब ने मन में वैराग्य भर दिया है. क्रिया योग तो पूर्व में आरम्भ कर चुका था पर समयाभाव में योगा और प्राणायाम वर्षों से छूटा पड़ा था. प्रत्येक दिन यही सोचकर गुजर गये कि आज की रात देर तक जाग कर ये पुस्तक कम्पलीट कर दूँ, कल से जल्दी सो जाया करूँगा और परसों सुबह से उठकर रेगुलर योगाभ्यास करूँगा. ऐसे ही एक-एक दिन करते हुए चौदह साल बीत गयें और वो परसों वाला सुबह आया ही नहीं.

सारे विषयों की तो बात ही छोड़िये, केवल ज्योतिष की ही बात करें तो अकेले ज्योतिष में सत्रह-अठारह हजार घंटे बर्बाद हो गये. अध्ययन के प्रति ये पागलपन एक प्रकार का व्यसन ही है. मृत्यु का एक झटका सारे ज्ञान को निरर्थक साबित कर देगा. लेकिन ये सब बातें तब तक कहाँ समझ आती है जब तक ईश्वर हमारे कान मरोड़ कर न समझाये. वैराग्य के इसी उपजाऊ भूमि पर भक्ति के बीज अंकुरित होते हैं. अब सब काम छोड़कर सुबह-शाम योगा, प्राणायाम, साधना यही कर रहा हूँ. परमात्मा ने जरा सा डराया और वर्षों से विमुख जीव को कुछ ही दिन में अपने मार्ग पर लगा दिया.

यही सब कारण है कि मेरी मक्खलि गोसाल के नियतिवाद में अगाध श्रद्धा होती जा रही है. मक्खलि मानते हैं कि हमारी मुक्ति भी नियति द्वारा निर्धारित है, लेकिन उसके बाद भी वो साधना करने पर जोर देते हैं. मक्खलि का कसूर सिर्फ ये था कि वे उस कालखण्ड में पैदा हुए थे जब धरती पर भगवान बुद्ध और भगवान महावीर विचरन कर रहे थें और समस्त भारतवर्ष को अपने आभामण्डल से प्रभावित कर दिया था. लोग इन दोनों के प्रभाव में अन्य कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थें, जबकि मेरे अनुभवों के निकस पर मक्खलि गोसाल भगवान बुद्ध और भगवान महावीर से कहीं अधिक खरे उतरते हैं.

पहले मैं सोचता था कि मक्खलि गोसाल जो भगवान महावीर के पाँच सौ शिष्यों को तोड़कर उनसे अलग हो गया वो कितना पतित इंसान होगा. पर अब जब मक्खलि गोसाल को समझ पा रहा हूँ तो लगता है कि उनमें कितनी जीवंतता थी कि पाँच सौ महावीर के शिष्यों को इनमें रौशनी दिखी और वे इनके साथ चले आयें. महावीर और बुद्ध राजपुत्र हैं, उन्हें जीवन में हर चीज बिना प्रयास सहजता से मिली. इस कारण उनका आत्मबल बहुत उच्च स्तर पर है, यही कारण है कि वे पुरुषार्थ के प्रति आग्रही हैं.

लेकिन मक्खलि गोसाल एक सामान्य दास है, जिसका अपने जीवन पर भी अधिकार नहीं है, वो भला किस पुरुषार्थ की बात करे? एकबार गलती से प्रमादवश मालिक का तेल गिरा दिया तो मालिक उसे मारने के लिए दौड़ा. मक्खलि मार के डर से जान बचाकर भागा. भागते हुए उसकी लंगोट मालिक के हाथ में आ गई और वो निर्वस्त्र ही भाग गया है और फिर जीवन भर निर्वस्त्र ही रहा. उसके अनुभवों ने उसे यही सिखाया था कि पुरुषार्थ निरर्थक है, उसका कोई अस्तित्व नहीं है, नियति ही प्रबल है. जीवन की हर घटना नियति द्वारा निर्धारित है, जिसमें कोई हस्तक्षेप नहीं कर सकता.

चूँकि उन्हें ज्योतिष का ज्ञान नहीं था इस कारण वो सत्य कहते हुए भी उसे प्रमाणित नहीं कर पाते थें, लेकिन ईश्वर ने जो मुझे ज्योतिष का ज्ञान दिया वो मेरे लिए मेरे आध्यात्यमिक विकास का एक माध्यम बना और मैं समझ पाया कि मक्खलि गोसाल ही सत्य के अधिक करीब हैं. जिस प्रकार गजानन माधव मुक्तिबोध ने ये उद्घोष किया था कि वे ब्रह्मराक्षस का सजल उर शिष्य बनना चाहते हैं, उसी प्रकार मैं ये उद्घोष करना चाहता हूँ कि मैं मक्खलि गोसाल का सजल उर शिष्य होना चाहता हूँ.

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