राम-भक्तों के संदर्भ में, श्रीराम जन्मभूमि पर चर्चा – भाग 1

महादेव की विशेष कृपा ही है जो मात्र दो महीने के अंतराल में हिंदुत्व के दो अति विशिष्ट धार्मिक स्थल की यात्रा कर पाया। और यह दोनों कार्यक्रम अनायास बने, जबकि जाने की इच्छा तो वर्षों से थी।

पहले दक्षिण के बालाजी के दर्शन हुए तो दूसरी तीर्थयात्रा में श्रीराम जन्मभूमि में विराजमान रामलला के।

दोनों स्थानों पर मित्रों की सहायता के कारण दर्शन सरलता से तो हुए, लेकिन दोनों कार्यक्रम के अचानक बनने के दौरान की गई तैयारियों ने अनेक जानकारी और अनुभव दिए।

तिरुपति जाने के लिए जब कार्यक्रम बना रहा था तो दिमाग में यह सब पहले से अंकित था कि यहां बड़ी भीड़ होती है और ये दुनिया के रिचेस्ट गॉड हैं। इसकी भी चर्चा अक्सर सुनता कि यहां जल्दी दर्शन के लिए वीआईपी कतार अलग से लगती है। पैसे दो और तुरंत दर्शन करो।

लेकिन वास्तव में जब कुछ और पाया तो समझ आया कि नरेटिव क्या से क्या बनता और बनवाया जाता है। जो फिर अनेक अफवाहों को जन्म देता है। यह सब बातें चारों ओर तेजी से फ़ैल कर गलत सन्देश भी देती हैं।

यह अमूमन हिन्दू धर्म प्रतीकों के साथ ही क्यों हो रहा है या किया जा रहा है, अब किसी के लिए भी समझना मुश्किल नहीं।

यह सच है कि बालाजी में लाखों की भीड़ के कारण बिना किसी विशेष टिकट के आम भक्त के रूप में जाने पर 14 से 24 घंटे भी लग सकते हैं। मगर इस तथाकथित वीआईपी दर्शन में भी चार से आठ घंटे लग जाते हैं।

विशेष ध्यान देने की बात है कि यह सुविधा कोई भी भक्त 300 रूपये की टिकट खरीद कर ले सकता है। असल में यह शीघ्र दर्शन की कतार है, उन के लिए जो समय बचाना चाहते हैं या जल्दी में हैं। यह दूर दूर से आने वाले यात्रियों के लिए एक विशेष सुविधा है, जिसकी टिकट कोई भी एडवांस में खरीद सकता है।

एक और कतार है 500 रूपये की, इसके लिए कल्याणोत्सवम की टिकट लेनी पड़ती है, जिसमें दर्शन के पूर्व बालाजी के विवाह के संस्कार भी दिखाए जाते हैं।

मात्र 300 रुपये या 500 रुपये देने वाले हिंदुस्तान में कब से वीआईपी बन गए? जबकि इनकी भी बुकिंग सभी के लिए ओपन है और एडवांस में की जाती है, और उपलब्ध होने पर ये टिकट एक दिन पूर्व तक मिलती रहती हैं।

असल में जो सच में वीवीवीआईपी हैं, उनके लिए फिर दुनिया में कहीं भी कतार नहीं लगती, उनकी चर्चा यहां व्यर्थ है। तो फिर सवाल उठता है कि बालाजी के लिए ही यह नरेटिव क्यों?

इस पर विस्तार में चर्चा करें, इसके पहले यह बतला देना जरूरी हो जाता है कि बालाजी में जितनी व्यवस्था दिखाई देती है, कहीं भी और नजर नहीं आती।

लाखों भक्तों की भीड़ की व्यवस्था के लिए अनेक इंतजाम करने होते हैं। स्वाभाविक है। जिस व्यक्ति के नाम टिकट है वही दर्शन करे, इसके लिए कुछ एक आइडेंटिटी प्रूफ की कॉपी भी ले ली जाती हैं। और फिर इन सभी प्रकार के कतार वालों को, तिरुमला की पहाड़ी चढ़ने पर रास्ते में अपनी गाड़ी और सामान की अच्छे से चेकिंग करवानी पड़ती है।

दर्शन के लिए कतार में लगने पर आप का नाम चैक किया जाता है और फिर सुरक्षा के अनेक चैक पॉइंट से हो कर गुजरना पड़ता है। चप्पल व मोबाइल-कैमरा को छोड़कर जाना होता है। और यह सब पहले ही बता दिया जाता है। ड्रेस कोड का भी ध्यान रखा जाता है।

कल्याणमहोत्सवम वाली लाइन के लिए मुझे धोती पहनकर ऊपर के वस्त्र उतारने पड़े थे। क्योंकि मैं जानता था यह सनातन संस्कृति है इसलिये मुझे यह अच्छा लगा, लेकिन कुछ एक इसकी हंसी उड़ा सकते हैं, आपत्ति कर सकते हैं और कुछ इसकी आलोचना भी कर सकते हैं। यह भी क्यों और किसके द्वारा किया जाता है हम सब समझ रहे हैं।

बहरहाल, दर्शन के रास्ते में आप को लोहे के जाल में से चलना होता है, जिससे कतार और व्यवस्था बनी रहे। कष्ट तो होता है मगर जब दर्शन होते हैं तो हम सारी थकान भूल जाते हैं। और ‘गोविंदा गोविंदा’ करते हुए बाहर निकलते हैं।

आप सोच रहे होंगे कि मुझे बात करनी थी अयोध्या पर और मैं पहुंच गया तिरुपति। असल में जब श्रीराम जन्मभूमि के दर्शन जाने का कार्यक्रम बना तो यहां भी अनेक शंकाओं ने घेर लिया था। यह सब भी सुनी -सुनाई ही थीं और विशेष कर पुलिस चैकिंग और अन्य सुरक्षा से जुड़ी बातें हवाहवाई ही निकलीं।

और जहां तक रही बात मंदिर के स्थान पर टेंट की, जिसको लेकर मन में बैचेनी और आक्रोश तो था और है भी, मगर इसे भी एक नई दृष्टि मिली।

लखनऊ से अयोध्या दो से ढाई घंटे में ही पहुंच गया था, रोड इतनी अच्छी कि यात्रा में तकलीफ ना के बराबर हुई। रास्ते में कहीं भी किसी भी तरह की सिक्योरिटी के नाम पर टोका टाकी नहीं दिखी।

सुबह सुबह निकलता तो दर्शन करके वापस दोपहर तक आ भी सकता था। कोई भीड़ नहीं। लेकिन फिर इसी बात ने मुझे हैरान किया था। चूँकि बारह बजे के बाद पहुंचा तो मंदिर के द्वार बंद कर दिए गए थे। लेकिन यह कोई नई बात नहीं, हिंदुस्तान के हर मंदिर में ऐसा होता है, बालाजी को छोड़कर।

मैं तब तक श्रीराम जन्मभूमि स्थान के पास खण्डहर हो रही एक अति प्राचीन हवेली के ठीक सामने के एक मंदिर की सीढ़ियों पर बैठ कर इंतजार करने लगा। आसपास जो दस बीस दर्शनार्थी भक्तजन थे, वे सब गांव से आये मेरे गरीब हिन्दू भाई-बहन थे।

सबको इस बात को लेकर जरूर भ्रम था कि क्या ले जाया जा सकता है और क्या नहीं। मगर अपने अनुभव से मैं मोबाइल गाड़ी में छोड़ आया था और पर्स में सिर्फ पैसे थे। और पर्स के अतिरिक्त कुछ भी और जेबों में नहीं था।

असमंजसता चप्पल को लेकर थी। वो भी उतार कर ही आता मगर चूंकि धूप बहुत तेज थी और सड़क जल रही थी। ऊपर से गाड़ी कनक भवन पर ही खड़ी कर दी गई थी।

सावन की धूप इतनी तेज थी कि पसीने से कई बार नहा लिया और बोतल का पानी भी जब खत्म हुआ तो यह समझ नहीं आ रहा था कि जब दर्शन प्रारम्भ होगा तब कतार में लग कर मैं इस चिलचिलाती धूप में कैसे बिना छांव के नंगे पैर चल पाऊंगा।

पानी की बोतल तो वही छोड़ दूंगा, सोच रखा था और कहा गया तो चप्पल भी वहीं उतार दूंगा, फिर वापसी में देखा जाएगा। लेकिन जब सावन की धूप में सर चकराने लगा तो मैंने आसमान की तरफ देखा और ईश्वर से विनती की थी।

आप को शायद यह गप्प लगे मगर उसे परोसने से मुझे कुछ प्राप्त नहीं होने वाला इसलिए इसे सच मानें कि जैसे ही पट खुले और कतार लगाई गई वैसे ही आसमान में बादल आ चुके थे।

बहरहाल कतार लगते ही सभी भक्तो की चैकिंग हुई जो स्वाभाविक थी। चूँकि मेरे पास कुछ था ही नहीं तो मुझे किसी ने कुछ कहा ही नहीं। हाँ इस बात को देखकर मैं जरूर हैरान हुआ कि चप्पल पहनकर जाने दिया जा रहा था।

पुलिस वाले उनसे जरूर सख्ती कर रहे थे जिनके पास कुछ ना कुछ था और वे इसे छोड़ कर जाने के मूड में नहीं थे। ये वही लोग थे जिन्हे यह नहीं पता कि आमतौर पर भारत के हर महत्वपूर्ण स्थान पर सुरक्षा की दृष्टि से क्या क्या नहीं ले जाया जा सकता। यहां तक कि बालाजी और वैष्णो देवी में भी तो इसकी अनुमति नहीं।

जहां तक रही चप्पल पहनकर जाने देने की बात तो यह शायद यह देखकर निर्णय लिया गया होगा कि रामलला के दर्शन के पहले बीच में जो सड़क आती है जिस पर भरी दोपहरी में नंगे पाँव चलना आज के आधुनिक युग के पैरों के लिए सम्भव नहीं। और फिर जिसे अंदर दर्शन के ठीक पहले उतारा जा सकता है।

कुछ एक मित्रों ने मेरे पिछले लेख पर, अयोध्या में सुरक्षाकर्मियों द्वारा उनके साथ किये गए दुर्व्यवहार की बात की थी तो वो कम से कम मेरे साथ तीनों पॉइंट पर नहीं हुई। सुरक्षाकर्मी अपना काम कर रहे थे और मैं उसमें उनका सहयोग कर रहा था।

और फिर इस तरह की सुरक्षा जांच तो मेरी बालाजी में भी हुई थी, वैष्णोदेवी में भी होती है, तो फिर यहां आपत्ति क्यों? जहां तक रही दुर्व्यवहार करने वाले सुरक्षा कर्मी की तो वो कहीं भी हो सकते हैं, इसे नकारा नहीं जा सकता, यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है। अनेक स्थानों पर कई बार ये वर्दीधारी किस तरह का बर्ताव करते हैं वो किसी से छिपा नहीं। इसे सिर्फ इसी रूप में ही लिया जाना चाहिए।

मेरे लिए संतोष की बात थी कि कम से क़म अयोध्या में किसी ने दर्शन के समय जल्दी आगे जाने के लिए धक्का तो नहीं दिया। वरना अधिकांश मंदिरों में किस तरह से बर्ताव किया जाता है और वो कितना दिल को ठेस पहुंचाता है, उसे हम सब जानते और चुपचाप सह लेते हैं। क्योंकि आस्था के सामने यह सब गौण हो जाता है।

यह दीगर बात है कि बालाजी में यह नहीं किया जाता जबकि वहां लाखों की भीड़ पहुँचती है। शायद यह इसलिए कि सबकुछ वहाँ व्यवस्थित है और हर भक्त को आगे बढ़ते रहने का निवेदन निरंतर किया जाता है।

लेकिन अन्य अनेक प्रसिद्ध मंदिरों में दर्शन के समय किस तरह की धक्का धुक्की होती है और पंडो का गिरोह किस तरह से लूटता है उसका वर्णन करना यहां विषयांतर होगा। जबकि यहां रामलला के दर्शन इतने आराम से हुए कि बता नहीं सकता। और मैं उनके आंखभर कर दर्शन करके तृप्त हुआ था।

आराम से दर्शन मिल पाने का कारण है भीड़ का ना होना। कुल सैकड़ा लोग भी नहीं होंगे, जबकि दो घंटे के बाद मंदिर दर्शन के लिए खुला था। यह ठीक है कि कम से कम चार स्थानों पर बॉडी को सुरक्षा की दृष्टि से स्कैन किया गया मगर यह तो हर महत्वपूर्ण स्थान पर होता है।

लोहे के जाले में से होकर पैदल चलना पड़ा, जिसकी लम्बाई कुछ सैकड़ा मीटर हो सकती है, वो भी कुछ तकलीफ नहीं दे रहा था क्योंकि यह अनेक प्रमुख मंदिरों में कतार और व्यवस्था को बनाये रखने के लिए हैं। चारो तरफ पुलिस थी तो यह भी अटपटा नहीं लग रहा था क्योंकि आजकल के आतंक के दिनों में हर महत्वपूर्ण मंदिर के आसपास पुलिस तैनात रहती है।

कहने का तात्पर्य है कि यहां भी दर्शन उसी सहजता से उपलब्ध हैं जैसे अन्य मंदिरों में। तो फिर सवाल उठता है कि देश की आस्था के केंद्र अयोध्या में इतनी भीड़ कम क्यों? रामलला दर्शन देने के लिए विराजमान भी हैं मगर श्रीराम के असंख्य भक्त नदारद हैं। कहीं अनेक तरह की अफवाहें-शंकाएं भक्तों को जाने-अनजाने, अप्रत्यक्ष रूप से यहां आने से तो नहीं रोकती?

जहां तक रही बात भव्य मंदिर बनने की तो वो बनना चाहिए और जरूर बनेगा, मगर जब तक मंदिर नहीं बनेगा क्या हम दर्शन भी नहीं करेंगे? यह तर्क कुछ अटपटा लगता है।

वैसे भी किसी मंदिर में हम क्या देखने जाते हैं? कम से कम हम मंदिर की भव्यता देखने के लिए तो नहीं ही जाते हैं। और अगर ऐसा करते हैं तो वो फिर पर्यटन कहलायेगा।

जब मैं बालाजी गया था तो मैं उसकी भव्यता और विशालता नहीं देख रहा था, आँखें गोविंदा के दर्शन को लालायित थीं। जब गर्भगृह के सामने पहुंचा था तो अँधेरे में दूर वेंकटेश्वर विराजमान थे और ध्यान केंद्रित करने पर ही मैं उन्हें देख पाया था। उस वक्त मेरे लिए मंदिर की अन्य विशेषता कोई मायने नहीं रख रही थीं।

वैष्णो देवी जब हम जाते हैं तो पिंडियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं, यही हर मंदिर में स्थापित मूर्ति व प्रतिमा के साथ किये जाने के लिए कहा जाता है। हर जगह यही महत्वपूर्ण होता है, ना कि मंदिर की विशालता और भव्यता।

यह ठीक है कि भव्य राम मंदिर बनना चाहिए और बनेगा, मगर तब तक दर्शन करने से किसने रोका है? आज के युग में भक्तों की भीड़ किस किस तरह से चीजों को प्रभावित कर सकती हैं, इसके क्या क्या लाभ हो सकते हैं, विस्तार में अगले लेख में चर्चा करेंगे, तब तक के लिए प्रजातंत्र में संख्याबल के महत्व को बतलाने की आवश्यकता नहीं।

तिरुपति बालाजी मंदिर देश में सबसे धनी हो सकता है मगर ईश्वर गरीब-अमीर नहीं होता, उसके भक्त उसे ऐसा बनाते हैं। लेकिन फिर यही आर्थिक दान रामलला में भी आने पर श्रीराम जन्मभूमि भी किस किस तरह के परिवर्तन कर सकती है, इसके सभी पक्षों पर भी विस्तार से बात की जा सकती है, मगर तब तक आर्थिक मजबूती के महत्व को समझाने की यहां आवश्यकता नहीं।

माना कि सुप्रीम कोर्ट में केस चल रहा है मगर दर्शन के लिए तो किसी के इजाज़त की जरूरत नहीं। क्या हम यह भी नहीं जानते कि कब्जा सच्चा बाकी सब झूठ। लेकिन यह बाबर और उसके मानने वाले जानते थे इसलिए बाबरी मस्जिद श्रीराम जन्मभूमि पर जबरन बनवाई गई थी।

हद तो तब हो जाती है कि आज के दौर में भी बाबर के मत वाले जहाँ तहाँ कब्जा करते रहते हैं। और हम हैं कि मूकदर्शक बने रहते हैं। इसे हमारी नादानी कहें या मूर्खता कि हम जनतंत्र में जनता के संख्या बल को नहीं समझ पा रहे। अगर अभी यह हाल है, तो भगवान ना करे, लेकिन अगर हमारी संख्या कभी कम हुई तो हमारा क्या हश्र होगा, सोच कर ही रूह काँप उठती है।

हम श्रीराम के नाम का जयकारा तो खूब लगाते हैं और चाहते हैं कि सभी लगायें लेकिन फिर कल्याण सिंह, जिसने अपनी सरकार रामलला के लिए त्याग दी थीं, उन्हें अगले ही चुनाव में वोट ना देकर हरा भी देते हैं। हम आखिरकार चाहते क्या हैं, हमें स्वयं नहीं पता। हमारी इसी भ्रम का दुनिया फायदा उठाती आयी है।

हाँ, हम सब कानून को मानने वाले सभ्य नागरिक हैं, मानना भी चाहिए, लेकिन क्या हम यह नहीं जानते कि लाखों भक्तों की दर्शनार्थी भीड़ हमारा केस मज़बूत करेगी। जो नेता अयोध्या दर्शन को नहीं जा रहे, ना जायें, वे अपनी राजनीतिक मजबूरी खुद समझें, लेकिन जिस दिन आप ने श्रीरामलला के दर्शन की लम्बी कतार लगा दी, अर्थात आप बड़ी संख्या में अयोध्या दर्शन के लिए पहुंचने लगे, तो हर छोटा-बड़ा नेता उसी कतार के सामने हाथ जोड़ कर वोट मांगता मिल जाएगा।

अगर श्रीराम में आस्था है तो कृपया उसे प्रदर्शित भी करिये। याद रखिये श्रीराम सिर्फ ईश्वर के अवतार और देवता ही नहीं बल्कि हमारे राष्ट्रीय नायक भी हैं। एक ऐसा चरित्र जो हर हिन्दुस्तानी के मन में बसा है, एक आदर्श पुरुष जो हमारी संस्कृति का प्रतीक है।

ध्यान रखिये, ऐसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम की जन्मभूमि की स्थापना को रोकने के लिए अनेक शक्तियां लगी हुई हैं, क्योंकि अयोध्या में मंदिर की स्थापना अर्थात हिन्दू धर्म की जड़ो का एकबार फिर मजबूत होना। और यह धर्म-परिवर्तन गिरोह कभी नहीं होने देना चाहता।

मगर आप क्या चाहते हैं, यह आप के हाथों में है। और आप कैसा भविष्य चाहते हैं यह आप को सुनिश्चित करना है। अगर रामराज्य चाहते हैं तो अयोध्या रामलला के दर्शन के लिए जरूर जाएँ।

जय श्री राम

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