कुछ अनजानी, अनछुई-सी राखी!

दिवंगत अटल जी ने दो त्यौहारों को इतना निकट पाया कि उन्हें एक “रक्षासूत्र” से जोड़ दिया था।

लिखते हैं :

“पन्द्रह अगस्त का दिन कहता,
आज़ादी अभी अधूरी है।
सपने सच होने बाक़ी हैं,
राखी की शपथ न पूरी है।”

और उन्हीं दोनों त्यौहारों स्वतंत्रता दिवस और राखी की निकटता के मध्य, अटल जी चले गये।

“रक्षाबंधन” पर्व के पार्श्व में उपस्थित ढेर सारी कहानियाँ बालपन से ही हम सब सुनते आ रहे हैं। फ़िलवक़्त इंटरनेट पर विभिन्न न्यूज़ पोर्टल्स का दौर है, और वे ही इन कहानियों का माध्यम बने हुए हैं।

उनसब से इतर कुछ बातें राखी पर होंगी आज!

श्रावण माह का अंतिम और सबसे अधिक आकर्षक दिवस होता है : “रक्षाबंधन”। बहन ही नहीं तो “रक्षाबंधन” का क्या अर्थ? अतएव महत्त्व “रक्षाबंधन” का नहीं, बल्कि “बहन” का है।

सन् पैंतीस का रक्षाबंधन, श्री “अज्ञेय” की बहन उन्हें राखी भेजना भूल गयीं।

तिस पर, अपने जन्मस्थान से सुदूर लाहौर जेल से ख़त लिखते हैं :

“प्रिय बहन, मेरे प्राण तुझे राखी की भाँति घेरे रहते हैं। किंतु तेरे स्नेह के बंधन ही उन प्राणों के संरक्षक भी हैं। हालाँकि अब हम दोनों ही भूल गये हैं कि हम संबंधी हैं, राखियाँ भेजने का दौर गया। आशा है, कि हम दोनों के अपनेपन की ही ये अंतिम और एकमात्र भूल सिद्ध हो।”

“बहन” न होने पीड़ा को “मुनव्वर राणा” ने “मुहाज़िरनामा” में एक शे’र से अर्ज़ किया है :

“अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी,
वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं।”

बहरहाल, मैं इस बात से बहुत कम इत्तेफ़ाक रखता हूँ कि कोई मुस्लिम भी राखी और बहन के रिश्ते को यूँ याद कर सकता है, किंतु अपवाद हर जगह हैं।

ये दर्द था उन मुसलमानों का जो विभाजन से पूर्व हिन्दू-मुस्लिम बस्तियों में प्रत्येक त्यौहार साथ-साथ मनाते थे और आज़ादी के ठीक बाद आने वाले त्यौहार ने उनकी कलाइयों को सूनेपन का अहसास करा दिया।

इससे इतर, सूरदास, जिन्होंने “राखी” तो क्या, कभी कोई और रंग भी न देखा था। उन्होंने “बालकृष्ण” को बहन द्वारा नहीं बल्कि “माँ यशोदा” द्वारा राखी बाँधते चित्रित किया है।

गाते हैं कि : “राखी बांधत जसोदा मैया / सूरदास गिरिधर चिर जीयो गोकुल बजत बधैया।”

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न केवल “बहनों” का बल्कि “भाई” का भी महत्त्व है राखी में। “सुभद्रा कुमारी चौहान” लिखती हैं :

“मैं हूँ बहिन किन्तु भाई नहीं है,
है राखी सजी पर कलाई नहीं है।
है भादो घटा किन्तु छाई नहीं है,
नहीं है ख़ुशी पर रुलाई नहीं है।”

“सुभद्रा” ने राखी पर “राखी” शीर्षक से एक कविता लिखी। न जाने कौनसा दौर था ये, मगर उनकी कविता से स्पष्ट होता है कि वे भारत के सोते वीर-भाइयों को “जलियाँवाला” की याद दिलाते हुए आह्वान कर रही हैं।

“राखी की चुनौती” नाम से एक और कविता लिखती हैं, जिसमें वे उन भाइयों को पुकारती हैं, जो अंग्रेज़ों के द्वारा बंदी बना लिए गये हैं। वे उन्हें दौड़ आने को कहती हैं, लौह-बंधन तोड़ कर!

अपनी कविताओं में अपने भाई को “कृष्ण” और स्वयं को “सुभद्रा” कहना ही एक भिन्न स्तर का रस उत्पन्न कर गया है।

कृष्ण और सुभद्रा के नाम से स्मरण होता है कि बहनें तो “योगमाया” होती हैं!

कृष्ण अक्सर कहा करते थे : “तुम तो मेरी योगमाया हो सुभद्रे, तुम बिन तो मुझे भोजन में स्वाद नहीं आता!”

कृष्ण का ये भाव “यूँ ही” न था, उनका कोई भाव “यूँ ही” होता ही नहीं, हो ही नहीं सकता। इस भाव की अवधारणा सनातन के “दशावतारम्” के मूल में गहरे पैठी है।

श्रीहरि विष्णु के दस अवतारों में प्रत्येक आगामी अवतार, अपने पिछले से कुछ एक गज़ अधिक लिए रहा। कम से कम ये तथ्य “राम” और “कृष्ण” पर सटीक ही है।

प्रभु श्री राम की कोई बहन नहीं थीं, उन्हें जीवन के कष्टों का सामना करना पड़ा। किंतु कृष्ण इस विषय में समृद्ध थे, “सुभद्रा” उनकी बहन थीं।

“राम” मर्यादा पुरुषोत्तम थे, चूँकि वे मायाधिपति श्रीहरि विष्णु की “माया” के प्रयोक्ता न थे जबकि “कृष्ण” ने “माया” भरपूर प्रयोग किया है।

हालाँकि ये कहना अवांतर प्रसंग होगा, क्षेपक होगा, किंतु फिर भी यह भी एक सत्य है कि मायाधिपति की “योगमाया” ने ही “सुभद्रा” के रूप में जन्म लिया था।

तिस पर ही कृष्ण कहते थे : “तुम तो मेरी योगमाया हो सुभद्रे, तुम बिन तो मुझे भोजन में स्वाद नहीं आता!”

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राखियाँ कैसी भी हों, बस वो राखियाँ हों, ये काफ़ी है।

फिर भी, “राखी कैसी हो?” की अभिव्यंजना में नज़ीर अकबराबादी याद आ ही जाते हैं।

वे कहा करते थे कि राखी हो तो सुनहरी हो, सब्ज़-हरी हो, रेशम जी फिसलनभरी और मुलायम हो, वसंत के रंग पीली सी हो और अनार के फूल सी लाल हो!

राखी चाहे जैसी हो, बहनों की उत्कंठा तो यही होती है : “मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी!”

नज़ीर से ही शब्द उधार लूँ तो भाइयों की चाहत बख़ूबी बयाँ हो सकेगी :

“तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी,
गुलिस्ताँ की, चमन की, बाग़ की गुलज़ार की राखी,
जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़ गुल रुख़सार की राखी,
बँधा लो उससे तुम हँसकर अब इस त्यौहार की राखी।”

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