एक संवाद : जातिगत आरक्षण रहे या हटे, क्या हमें सचमुच फ़र्क पड़ता है!

हमारा कलेक्टर सामान्य वर्ग का है या आरक्षित वर्ग का, इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? कब किसी काम से आप किसी कलेक्टर से मिले थे?

आरक्षण रहे या जाए, इससे हमें क्या फर्क पड़ता है? यदि आप शासकीय सेवा में हैं तो बहुत अच्छा, अब अपनी संतान को स्वरोज़गार के लिए प्रशिक्षित कीजिए, और अगर आप निजी सेवा या स्वरोज़गार में हैं तो आपको क्या फर्क पड़ रहा है आरक्षण से?

वर्तमान नेतृत्व अगले दो कार्यकाल तक बना रहे तो आरक्षण के बावजूद बहुत हद तक शासकीय सेवक अप्रासंगिक हो जाएंगे… न नई भर्तियाँ निकलेंगी, न नौकरी मिलेगी. फिर क्या फर्क पड़ेगा कि आरक्षण है या नहीं।

न्यायपालिका में भी हो जाए आरक्षण… फैसले बिकते ही आ रहे हैं… अधिक भूखे लोग आ जाएंगे तो थोड़े और महंगे बिकेंगे… या फिर पुरानी पंचायती व्यवस्था की ओर उन्मुख होंगे लोग, जाएंगे ही नहीं कचहरी…

इस बात से तो सहमत होंगे कि प्रतिभा को कुचला नहीं जा सकता… आपकी या मेरी संतान प्रतिभाशाली होगी तो सबकुछ करने में सक्षम होगी, न कि 10 से 5 वाली नौकरी और हर महीने खाते में आने वाली तनख्वाह की लालायित।

या साफ़-साफ़ कहिए कि सरकारी नौकरी की हरामखोरी आकर्षित करती है!!! अगर ऐसा है भी तो यकीन जानिए, अब बहुत दिन नहीं चलने वाली ये हरामखोरी… शर्त वही, कि नरेंद्र मोदी की जड़ें ज़रा मज़बूती से ज़मीन पकड़ लें।

इसलिए मेरा तो मानना है आरक्षण ज़िंदाबाद कहते रहिए और अपने काम में जुटे रहिए… अपने बच्चों का भविष्य संवारिए… न पहले किसी सरकार ने संवारा और न अब कोई सरकार संवारेगी…

आरक्षण एक सच्चाई है ये भी तथ्य है… और जैसा मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा, ‘कोई माई का लाल इसे हटा नहीं सकता’, ये भी ज़मीनी हकीकत है…

बस एक काम किया जा सकता है कि जहां-जहां आरक्षण है, वहाँ पदों की संख्या में कटौती की जाए… पुराने लोगों को सेवानिवृत्त होने दिया जाए, नई भर्तियाँ न की जाएं।

इस पर डॉ अशोक कुमार तिवारी ने प्रतिक्रिया दी कि फर्क तो बहुत पड़ता है आरक्षण से।

जब प्रमोशन में आरक्षण होने से अयोग्य व्यक्ति सरकारी उच्च पदों पर आसीन हो जाते हैं और वे आपके लिए गलत नीतियां और नियम बनाते हैं।

जब माइनस नम्बर पाये व्यक्ति सरकारी स्कूल कॉलेज में शिक्षक बनते हैं और आपके बच्चों को पढ़ाते हैं।

जब अयोग्य व्यक्ति सरकारी अस्पताल में डॉक्टर बनते हैं और आपका इलाज करते हैं।

ऐसे सैकड़ो उदाहरण बताये जा सकते हैं। व्यवस्था दिन पर दिन खोखली होती जा रही है। बहुत फर्क पड़ता है आम जनता को।

हर कोई अपोलो एस्कॉर्ट में इलाज नही करा सकता, न ही महंगे प्राइवेट स्कूल कॉलेज में बच्चों को पढ़ा सकता है।

सरकारी व्यवस्था में जाना ही पड़ता है उसे, क्योकि वो आम जन है।

वही वरुण जायसवाल का कहना है कि आरक्षण के विरोध और समर्थन के पीछे भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी की माँग भर है.

हाँ आँकड़े आसानी से सिद्ध कर देंगे कि इसकी माँग करने वाले इसका विरोध करने वालों से भ्रष्टाचार करने में पीछे रहे हैं.. अतः मौका चाहते हैं ताकि कसर निकाल सकें, और इसी बात का मौका विरोध करने वाली लॉबी देना नहीं चाहती।

वैसे मजे कि बात यह है कि इस लेख में उठाये गए प्रश्न, आंकड़ों के लिहाज़ से बिल्कुल कमजोर सिद्ध हो जायेंगे… फ़िर फ़र्क पड़ने का दोषी कौन होगा?

अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए कुछ लिखूंगा तो उससे हिन्दू एकता के नैरेटिव को नुकसान ही होगा…

आँकड़े आसानी से सिद्ध कर देंगे कि गत 70 वर्षों में शासकीय निर्णयन की प्रक्रिया और पदों पर गैर आरक्षित वर्ग के लोगों का एकाधिकार रहा है।

फ़िर भी समाज की समस्याओं में दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोतरी हुई और इस्लाम व ईसाइयत का वर्चस्व बढ़ता गया…

कौन जिम्मेदार है इसका? आरक्षण तो व्यवस्था की नाकामी छुपाने का एक बहाना भर है।

मगर ये तो कोई न जाने, कि मेरी मंज़िल है कहाँ…

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