‘द सैटरडे क्लब’ के अदृश्य अभिजात्य, और भारत का व्याधिग्रस्त तंत्र

गतांक से आगे

आज की पीढ़ी को, जिन्हें कुलदीप नैयर और उनके प्रभाव विस्तार के बारे में नही पता है, वे उनकी मृत्यु के बाद से उनको विभिन्न क्षेत्रों से मिली श्रद्धांजलि से उनके महत्व को समझ सकते हैं।

जिस तरह से वामपंथी अखबारों, एनडीटीवी और पाकिस्तान की मीडिया में शोक है, उससे कुलदीप नैयर और भी स्पष्ट हो जाते हैं।

अब आते है उस क्लब के बारे में जिसके वे बहुत पुराने सदस्य थे। यह एक ऐसा क्लब है जिसका कोई वैधानिक स्वरूप नहीं और न ही इस क्लब के सदस्यों व वहां हो रही चर्चाओं का कोई प्रलेखन ही संकलित किया जाता है।

इस क्लब के सदस्यों में पत्रकार व बुद्धिजीवी हमेशा से ही रहे हैं लेकिन कभी भी इस क्लब की मीटिंग की चर्चा बाहर नहीं जाती है।

यह क्लब ‘द सैटरडे क्लब’ के नाम से जाना जाता है और 70 के दशक से यह इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सेंट्रल हॉल में, हर शनिवार, दोपहर के खाने के साथ आहूत होता है।

आज जिस स्वरूप व गतिविधियों को लेकर ‘द सैटरडे क्लब’ की चर्चा कर रहा हूँ, वह अपने शुरू के काल में ऐसा नहीं था। इसकी शुरुआत, 1951 में हुई थी, जब भारत नया नया गणराज्य बना था।

उस वक्त ‘द स्टेट्समैन’ अखबार के सम्पादक अल्फ्रेड इवान चार्लटन को विचार आया कि भारत एक नया राष्ट्र है और उसके नवनिर्माण में आने वाली चुनौतियों व भविष्य की सम्भावनाओं को लेकर समान विचार के मित्रों के साथ अनौपचारिक साप्ताहिक चर्चा की जाये।

इस तरह से दिल्ली के वोल्गा रेस्टॉरेंट में हर शनिवार दोपहर के खाने पर, ये करीब 12 बुद्धिजीवी, जिनमें एल के झा, जो बाद में अमेरिका में भारत के राजदूत बने, सी एस वेंकटाचार जो आगे चल कर राष्ट्रपति के सचिव बने, मीडिया एक्सपर्ट एरिक डिकोस्टा व आईसीएस तरलोक सिंह जैसे दिग्गज मिलते थे और भारत पर चर्चा करते थे।

इन लोगों की एक खासियत यह थी कि ये सभी लोग दिल्ली की शाम की राजनैतिक शक्तिशालियों व अभिजात्य वर्ग की कॉकटेल पार्टियों में जाना नापसंद करते थे।

जब अल्फ्रेड इवान ने इन बैठकों की शुरुआत की थी तब उन्होंने यह सपने में भी नहीं सोचा होगा कि राष्ट्रनिर्माण पर बौद्धिक चर्चा करने वाला और अभिजात्य व राजनीतिक वर्ग की उपेक्षा करने वाला यह अनौपचारिक समूह, ‘द सैटरडे क्लब’, अगले दो दशकों में वोल्गा के 2 रूपए प्रति प्लेट खाने वाली बैठकों से उठ कर, इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर के सेंट्रल हॉल में पहुंच जायेगा और खुद में उसके सदस्य, राष्ट्र की नीतियों को नेपथ्य से दिशा देने वाले, दिल्ली के अभिजात्य वर्ग बन जायेंगे।

इस क्लब के उद्देश्यों में भले ही 1950 से लेकर आज तक में बदलाव आ गया हो लेकिन इसके मूल चरित्र में कोई बदलाव नहीं आया है। यह क्लब आज भी अपने चरित्र को ‘फेबियन (अवसर की प्रतीक्षा करने वाला), समाजवादी व धर्मनिरपेक्ष’ कहता है।

50 के दशक में नेहरू के सोशलिज़्म को इन बुद्धिजीवियों ने अंतर्निहित किया था, वहीं इंदिरा गाँधी द्वारा 60 के दशक के अंत में वामपंथियों के साथ गठजोड़ ने, उस समाजवाद को वामपंथ पढ़ाना शुरू कर दिया था और 70 के दशक में इंडिया इंटरनेशनल सेन्टर जब ‘द सैटरडे क्लब’ पहुंचा, तब वो पूरी तरह से वामपंथी प्रभाव में आ चुका था। तब तक कुलदीप नैयर इस क्लब के एक पुराने महत्वपूर्ण सदस्य बन चुके थे।

अब यह लोगों का पूछना बिल्कुल बनता है कि आखिर इस ‘द सैटरडे क्लब’ ने कैसे भारत की नीतियों को शासन तंत्र व मीडिया के माध्यम से अपनी विचारधारा के अनुसार प्रभावित किया?

अब जो आगे लिखना है उससे पहले यह जान लीजिये कि सत्ता के गलियारों में इस ‘द सैटरडे क्लब’ का नाम, कब फुसफुसाहट से, आंशिक रूप से सार्वजनिक हुआ। शायद, इसके बारे में कोई लिखने की हिम्मत भी नहीं करता यदि इस क्लब का एक सदस्य, एक राजनीतिक दुर्घटना के कारण भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन जाता।

यह व्यक्ति थे इंद्र कुमार गुजराल, जो कांग्रेस के समर्थन से चलने वाली, यूनाइटेड फ्रंट की सरकार के, देव गौड़ा के बाद प्रधानमंत्री बने थे। इंद्र कुमार गुजराल के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह पता चला कि इस ‘सैटरडे क्लब’ के सदस्य किस तरह से भारत की नीतियों को प्रभावित करते रहे हैं।

इस अनौपचारिक क्लब के सदस्य, जिनके बारे में भारत की जनता को नहीं पता था, वे राजनीतिक और शासन तन्त्र व मीडिया को प्रभावित करके भारत की जनता पर अपना एजेंडा प्रभावी करते रहे हैं।

गुजराल काल मे ‘द सैटरडे क्लब’ इस लिये महत्वपूर्ण हो गया था क्योंकि इस क्लब के कई सदस्यों के नाम सामने आ गये थे। 1959 बैच के आईएएस एन एन वोहरा प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव बनाये गये, जेएनयू के प्रोफेसर एस डी मुनि लाओस के राजदूत बने…

कृष्ण कांत, गुजराल के समर्थन से भारत के उपराष्ट्रपति बन गए, कुलदीप नैयर जो पहले इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त बनाये गये थे, उन्हें राज्यसभा में मनोनीत किया गया, भारत के भूतपूर्व विदेश सचिव, मुचकुन्द दुबे यूनेस्को में भारत के प्रतिनिधि बनाये गये, जिन्होंने बाद में जेएनयू में 8 वर्ष तक प्रोफेसर बनकर नए आईएफएस के प्रशिक्षुओं को विचारधारा से लिप्त विदेश नीति पढ़ाई गयी।

गांधीवादी अर्थशास्त्री व प्लानिंग कमीशन के सदस्य रहे एल सी जैन, जो अभी हाल में पोखरण 2 को लेकर विवाद में आये थे, उनको दक्षिण अफ्रीका का उच्चायुक्त बनाया गया, सैटरडे क्लब के वरिष्ठ सदस्य पत्रकार बी जी वर्गीस को प्रसार भारती का अध्यक्ष बनाया गया, भभानी सेनगुप्ता जिनको ‘गुजराल डॉक्ट्रिन’ का जनक माना जाता है, उनको प्रधानमंत्री कार्यालय में अफसर ऑन स्पेशल ड्यूटी बनाकर तैनात किया गया था।

50 के दशक में जब यह क्लब शुरू हुआ था तब से 80-90 के दशक तक आते आते इसके सदस्यों के कार्य क्षेत्र में व्यापकता आ गयी थी। एक तरफ़ जहां रक्षा विशेषज्ञ के सुब्रह्मण्यम, लेफ्टीनेंट जनरल जसजीत सिंह अरोड़ा इसके सदस्य हुए, वहीं राजनीतिक क्षेत्र से भी लोग आये।

ये सब वो लोग थे जिनका कोई जनाधार हो या न हो, लेकिन जिन्हें बुद्धिजीवी या तो माना गया या फिर उन्हें राजनीति में बौद्धिक रूप से स्थापित किया गया था। इनमें चंद नाम हैं – के सी पंत, वसंत साठे, जयपाल रेड्डी (इनफार्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मंत्री बने), सलमान खुर्शीद, सीताराम येचूरी, पृथ्वीराज चौहान (मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल मे प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री रहे), जयराम रमेश (कांग्रेस के गांधियन अर्थशास्त्री के रूप में स्थापित किया गया)।

सैटरडे क्लब के एक सदस्य भूतपूर्व विदेश सचिव जे एन दीक्षित, मनमोहन सिंह काल में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार व पत्रकार संजय बारु प्रधानमंत्री के मीडिया एडवाइज़र जैसे महत्वपूर्ण पद पर आसीन हुये है।

उस काल मे इस ‘द सैटरडे क्लब’ में जहां बीजेपी के जसवंत सिंह, जगमोहन व सुषमा स्वराज सदस्य थे, वहीं दर्जन भर पत्रकार इसके सदस्य रहे हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया के एच के दुआ, ‘द हिन्दू’ के के के कत्याल, ‘इकोनॉमिक्स टाइम्स’ के स्वामीनाथन अय्यर, स्वतंत्र पत्रकार में इंद्र मल्होत्रा, प्रेम शंकर झा, अजित भट्टाचार्य, संजय बारु इत्यादि इसके सक्रिय सदस्य रहे हैं।

लेख लंबा ज़रूर हो गया है लेकिन 90 के दशक के इतने नाम इसलिए लेने पड़े ताकि लोग यह समझ सकें कि इस ‘द सैटरडे क्लब’ के सदस्यों की पकड़ भारत के सारे तंत्रों पर कितनी ज़बरदस्त रही है और उन्होंने, बढ़ाई गई अपनी अगली पीढ़ी व अपने चुने गये कनिष्ठों द्वारा पूरे भारत के तन्त्र को समाजवाद (वामपंथ का छद्म नाम) व धर्मनिरपेक्षता के हाथों गिरवी रख दिया है।

यदि आपने मेरे पूरे लेख को संयम से पढ़ लिया होगा तो आप यह अच्छी तरह समझ गये होंगे कि 2014 में नरेंद्र मोदी को जो भारत, तन्त्र के रूप में, विरासत में मिला है वह ऊपर से नीचे तक समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता की व्याधि से ग्रस्त है, जो नये राष्ट्रवादी शासक की व्यवस्था से सामंजस्य बैठाने को लेकर तटस्थ है। यह एक ऐसा रोग है जो लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुटकियों में समाप्त भी नहीं किया जा सकता है, क्योंकि उनको यह आशा है कि 2019 में फिर पुराने दिन वापस आ जायेंगे।

मेरा यह निश्चयात्मक रूप से मानना है कि कुलदीप नैयर जैसे लोगों द्वारा जो व्यवस्था को कई दशकों से दर्शन मिला है, उसको सिर्फ एक प्रधानमंत्रित्व काल समाप्त नहीं कर सकता है। यदि कोई यह उम्मीद करता है कि यह हो सकता है तो वह शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर घुसाये, वास्तविकता से आंख चुरा रहा है।

मेरे लिये 2019 में नरेंद्र मोदी की वापसी इसी लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि राष्ट्रवादिता व हिंदुत्व की राह में रोड़ा बने व्याधिग्रस्त तंत्र को पूरी तरह ध्वस्त करने के लिये अभी कुछ और वर्ष चाहिये हैं।

कुलदीप नैयर : एक दूषित विचारधारा के बौद्धिक

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