बेरोज़गारी, गरीबी खत्म तो भारतीय राजनीति में नेताओं का भविष्य चौपट!

60 साल राज करने के बाद भी अगर प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मौनी बाबा और जगत्प्रसिद्ध समाजशास्त्री आउल बाबा वाली पार्टी अगर कहे कि बेरोज़गारी आतंकवाद बढाती है तो सबसे पहले यह जिज्ञासा जागती है कि-

बेरोजगारी क्या है?
बेरोजगारी बढ़ती क्यों है?
बेरोजगार कौन है?

पप्पू के पापा जो कम्प्यूटर लाये थे न, वो बैंकों में रखा रखा विकसित होकर एटीएम, सीडीएम, पीपीएम, सीवीएम हो गया और इस प्रकार बैंकों में इन कामों में लगने वाले बीसों आदमी एक ही ब्रांच से कम हो गए।

इस संख्या को विभिन्न बैंकों की देशभर में उपस्थित शाखाओं की संख्या से गुना कर लीजिए। यह सिर्फ एक उदाहरण कि विकास और आधुनिकीकरण अगर असन्तुलित और अदूरदर्शितापूर्ण तरीके से होता है तो क्या होता है!

2009-10 में सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में बेरोजगारी की दर 9.3% थी जो वर्तमान में लगभग 5 प्रतिशत के आसपास है। 135 करोड़ का 5% यानि लगभग 7 करोड़ बेरोजगार! अगर बेरोजगारी आतंकवादी पैदा करती है तो भारत में 7 करोड़ आतंकवादी हैं या बनने के कगार पर हैं।

अभी तक की विश्वप्रसिद्ध थ्योरीज़ के अनुसार अन्याय और अत्याचार हथियार उठाने को बाध्य करते हैं और रक्तरंजित क्रांतियां इसीलिए होती आई हैं। यानि कांग्रेसी समाजशास्त्री उन सब मनोवैज्ञानिकों, दार्शनिकों, मैनेजमेंट गुरुओं से आगे निकलकर नोबेल पुरस्कार के हकदार बनते दीख रहे हैं।

कांग्रेस के पास सबसे बड़े चुनावी मुद्दे हैं बेरोज़गारी और गरीबी। दोनों के बढ़ने का एकमात्र कारण भी वही है जो अन्याय और अत्याचार बढ़ने का एकमात्र कारण है : जनसँख्या वृद्धि।

आबादी बढ़ी भी और पाकिस्तानी, बंगलादेशी शरणार्थियों के अलावा अवैध घुसपैठियों को बसाकर उनका वोटबैंक बनाकर बढ़ाई भी गयी। संसाधन कम पड़ते गये, प्रतिव्यक्ति पुलिस/ जज/ डॉक्टर/ शिक्षक आदि सब कम होते गए। पर कागजों में महंगाई दर, बेरोजगारी दर घटती-बढ़ती रही और असंतुलित विकास दुनिया भर की बीमारियां और तकनीक आयात करता रहा जो आज भी बदस्तूर जारी है।

आंकड़ों के अनुसार 96 प्रतिशत युवा में स्किल्स का अभाव है। शिक्षा में गुणवत्ता का अभाव है। डिग्रियां हैं लेकिन क्षमता का अभाव है। बिना जजों की कचहरियों, बिना डॉक्टरों के अस्पतालों और बिना शिक्षकों के विश्वविद्यालयों की भरमार है। हर समय देश में करोड़ों पद खाली रहते हैं लेकिन योग्य व्यक्ति नहीं मिलते या आरक्षित वर्ग के पात्र उम्मीदवार नहीं मिलते।

फिर भी 2015 में प्रति व्यक्ति आय लगभग सवा लाख रूपये थी। लोग कहते हैं कि सब आंकड़ों का खेल है। वास्तव में 90% धन सिर्फ 10% लोगों के पास है। मैं पूछता हूँ कि बिना वास्तविक आंकड़ों के कोई माई का लाल विकास कर सकता है क्या? सुधार कहाँ से शुरू होना चाहिए : नर्सरी से या विश्वविद्यालय से?

हालत ये है कि आंकड़े इकट्ठे करने के लिए न तो आदमी हैं और न समय। जब जो मिल जाये लगा दो : स्वास्थ्य विभाग की आशा/ एएनएम, शिक्षा विभाग के शिक्षामित्र/ प्राथमिक विद्यालयों के शिक्षक, भू एवं राजस्व विभाग के लेखपाल, अमीन, ग्रामसेवक, और ग्राम प्रधान फर्जी आंकड़े पकड़ाते रहते हैं और सरकार 2 – 4 रूपये का चेक भेजकर सूखा/ बाढ़ राहत घोषित करती रहती है।

अंधेरनगरी चौपट राजा!

ऐसे नेताओं को भक्त और चमचे सिर्फ भारत में ही मिलते हैं और सिर्फ बेरोज़गारी के दम पर! बेरोज़गारी, गरीबी खत्म तो भारतीय राजनीति में नेताओं का भविष्य चौपट!!

कुल मिलाकर जबरदस्त अंधेरगर्दी है।

जनता त्रस्त!

सत्तापक्ष और विपक्ष मस्त!!

जय श्रीराम।

अगर गरीब, किसान, दलित, पिछड़े सशक्‍त हो गए तो बंद हो जाएंगी ‘उनकी’ दुकानें

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