इस्लाम एक राजनीतिक प्रकृति : जहाँ भी होगा, सत्ता संघर्ष में उलझेगा ही

पता नहीं क्यों लोग मुझे खोजते हुए आ जाते हैं पॉलिटिक्स की बात करने। वो भी जिनसे पहली बार बात कर रहा होता हूँ।

आज एक अंग्रेज़ नर्स ने पता नहीं क्यों इंडिया का मैप खोल लिया गूगल पर और मुझसे पूछने लगा कि मैं इंडिया में कहाँ से हूँ।

फिर बगल में बांग्लादेश को दिखा कर पूछने लगा कि इंडिया ने बांग्लादेश को क्यों अलग कर दिया, वहाँ बहुत बाढ़ आती है इसलिए क्या?

उसे सचमुच कुछ नहीं मालूम था साउथ एशिया की हिस्ट्री के बारे में। उसे यह नहीं पता था कि बांग्लादेश पहले ईस्ट पाकिस्तान था।

खैर, एक छोटी सी ट्यूटोरियल ली भारत के विभाजन, इस क्षेत्र की डेमोग्राफी और पॉलिटिक्स पर।

उसने पूछा – इण्डिया में बहुत रिलीजियस टेंशन रहा होगा?

मैंने कहा – इसे रिलीजियस टेंशन कहना ओवर सिम्पलीफिकेशन है। ऐसे समझो, इस्लाम का एक पॉलीटिकल नेचर है… जहाँ कहीं भी इस्लाम होगा, वह पावर स्ट्रगल में उलझेगा ही।

बेचारा असहज हो गया। अगल बगल देखने लगा, कहीं कोई मुस्लिम तो नहीं है।

उसने कहा – यह देखने का एक तरीका है। (अंग्रेज़ी में आपकी बात को खारिज़ करने का यह बड़ा ही सॉफिस्टिकेटेड तरीका है – This is one way of looking at it)।

मैंने कहा – सुनो, यह ज़ाहिर सी बात है, कोई नई बात नहीं कह रहा हूँ। इस्लाम का एक पॉलीटिकल नेचर है। कोई मुस्लिम इससे इनकार नहीं करेगा। तुम्हें इस्लाम का अपोलॉजिस्ट बनने की जरूरत नहीं है, वे तुमसे ऐसी कोई उम्मीद नहीं रखते, तुम खामखाँ इस्लाम की सफाई दे रहे हो। यह कोई इल्जाम नहीं है, एक तथ्य है।

बन्दा पूछता है – अच्छा, तो तुम्हारी नज़र में इसका सॉल्यूशन क्या है? अब इनसे ऐसे ही छुटकारा तो नहीं पा सकते।

मुझे मालूम है, इस प्रश्न का उत्तर एक अंग्रेज़ को नहीं देना है। क्योंकि यह एक समय होता है जब वे आपके जवाब को सामने रखकर आपको ही कट्टरपंथी और रेडिकल सिद्ध कर देंगे।

मैंने सिर्फ इतना कहा – मैं सॉल्यूशन सुझाने के बिज़नेस में नहीं हूँ। मैं कोई पॉलिटिशियन नहीं हूँ। मैं सिर्फ वस्तुस्थिति की समीक्षा करता हूँ। मैं पॉलीटिकल एनालिस्ट हूँ, और इस काम को बहुत सीरियसली लेता हूँ।

अंग्रेज़ों और बहुत से सहृदय उदारवादियों की यह एक ग्रंथि है – वे इस्लाम की समीक्षा करने से इसलिए कतराते हैं कि अगर उनके निष्कर्ष मन मुताबिक नहीं हुए तो बहुत उलझन हो जाएगी कि इन निष्कर्षों का करें क्या? फिर उन्हें डर लगता है कि कठिन और अप्रिय उपायों को स्वीकारने की जिम्मेदारी आ जायेगी।

वापस आते हुए बीबीसी पर प्रॉफेट मुहम्मद की एक बायोग्राफिकल डॉक्यूमेंट्री सुन रहा था। पौने तीन घण्टे की डॉक्यूमेंट्री है।

कमाल का नमूना है, शब्दों का खेल है, जबरदस्त प्रचार की टेक्निक है। मुहम्मद के जीवन को इस तरह से एनालाइज़ किया है कि सुन कर आपको लगेगा कि हर विवादित संदर्भ के दोनों पक्षों को उठाया गया है। लेकिन ओवरऑल टोन पर ध्यान दीजिए… पूरी डॉक्यूमेंट्री में मुहम्मद को विक्टिम और परसेक्यूटेड दिखाया गया है।

कुरैश कबीले के लोग तो मुहम्मद को बेकार तंग कर रहे थे। भोले भाले मुहम्मद तो बेचारे सिर्फ उनकी मूर्तियाँ तोड़ना, उनका धर्म बदलना और उनकी पूरी जिंदगी को बदल देना चाहते थे…

और यह सब उन्होंने बेहद शांतिपूर्ण तरीके से किया। औरतों का कितना सम्मान करते थे… नौ या ग्यारह शादियाँ तो सिर्फ उन्होंने मजबूरी में की उन औरतों से जिनके पति और परिवार वाले संघर्ष में मारे गए थे…

9 साल की बच्ची से और अपनी ही बहू से भी शादियाँ की, पर यह सब अप्रामाणिक है, और बहुत कुछ उनके दुश्मनों ने फैला रखा है। पूरे के पूरे यहूदी कबीले को कत्ल कर दिया जिसने उन्हें शरण दी थी, पर वह भी बहुत मजबूरी में… और इसके कुछ पुख्ता प्रमाण नहीं हैं…

दो बातें महत्वपूर्ण हैं – पहला, प्रचार की टेक्निक… दोनों पक्ष रखे गए हैं जिससे निष्पक्षता का भ्रम बना रहे। विरोध में ढीले ढाले और कमजोर से तर्क फिर उनका जोरदार खंडन या बिल्कुल झुठला देना।

दूसरा, इस प्रचार के लिए मंच उन्हें कैसे मिला? बीबीसी जैसे बड़े प्रचारतंत्रों पर उनका कब्जा कितना काम आ रहा है।

पर सबसे अहम बात है, इन बचकाने तर्कों से उनका काम कैसे चल जाता है? क्योंकि पश्चिमी जगत इस्लाम को शांतिप्रिय और उदार मानने के लिए तैयार बैठा है। उन्हें ज़रा सा बहाना चाहिए। अप्रिय निष्कर्षों और कठिन उपायों की जिम्मेदारी से बचने के लिए प्यारे प्यारे सफेद झूठ बहुत काम आते हैं… उतना ही जितना तेज मूसलाधार मॉनसून की बारिश में आपकी छोटी सी छतरी बारिश से बचने का भरम देती है…

ईरान के बाद भारत को अपनी मुट्ठी में भींचने के लफंगों के सपने का ही नाम है ग़ज़वा-ए-हिन्द

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY