याद रखना… अब भी हमारी म्यानों में है पुष्यमित्र शुंग की शमशीर

सेना और संघ के स्वयंसेवक तुम्हें बचाते बचाते मर गये पर तुमने उम्मतियों के बोर्ड लगा लिये।

वो क्या तुम्हारी मदद करेंगे? खुद उनके चरागे – शरीफ के चराग हमारे पैसों से जलते थे।

यकीन न हो तो पूछना मुन्नवर राना से। उन्होंने खुद हमसे मुखातिब हो ये अल्फाज़ हमें कहे थे।

अगर ज़मीर ज़िंदा हो… तलुये-चाट मानसिकता से बाहर निकल सको तो पूछना उन उम्मतियों से कि सोमालिया में भुखमरी के दौरान सिर्फ पाँच करोड़ क्यों दिये थे?

पूछना उनसे कि सीरिया के लोगों को पनाह क्यों न दी? वो तो उनके अपने हम-मज़हबी भाई थे न।

पूछो उनसे कि रोहिंगयाओं को बसाने के लिये अपने यहां रिफ्यूजी कैम्प क्यों नहीं लगाते ये लोग?

तुम नहीं पूछोगे उनसे… क्योंकि उत्तर तुम्हें पता है। हकीकत बहुत कड़वी है। वो खुद को पक्का ईमान वाला मानते हैं। तुम्हारी औकात उनके लिये वफादार कुत्तों के माफिक है जिनके गले में उन्होंने पट्टा डाल रखा है। तुम वो बेगैरत लोग हो जिनकी लाशों को उन्होंने बुलडोजर तले रौंदा। बावजूद इसके वो तुम्हें अपने सगे भाई जान पड़ते हैं। तो पड़ें… हमको क्या?

हम तो उस संस्कृति से हैं जो विश्व बंधुत्व का ऐलान करती है। हम वो हैं जिसके बारे में खुद तुम्हारे अहले-इमाम ने कहा था कि हिन्द से उन्हें ताज़ी हवाओं की खुशबू आती है।

हम वो हैं जिन्होंने तुम्हारे खलीफाओं को तब पनाह दी जब तुम खुद उनकी और उनके मासूम खानदानियों की कत्लोगारत की इबारत लिख रहे थे। उनकी जंगें हमने अपने सर लीं, उनके लिए हमने अपने लहू के कतरे बहाये।

बावजूद इसके अगर तुम हमें गैर मानो तो सुन लो… एक नम्बर के एहसान फरामोश हो तुम। हरामज़दगी तुम्हारी नस नस में बह रही है। अभी भी वक्त है बाज़ आओ इन हरकतों से। वरना याद रखना पुष्यमित्र शुंग की वो शमशीर अभी भी हमारी म्यानों में है जिसने गद्दारों की हर वो नस छितरा दी थी जिसमें गद्दारी बहती थी…

बाढ़ का पानी तो उतर जाएगा, लेकिन काँग्रेस की नीचता का ज्वार उतरना मुश्किल

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