पता नहीं इतनी दोगलई ये लाते कहां से हैं?

हिंदू धर्म के त्योहारों के अपमान का सिलसिला जारी है। इस बार ये जिम्मेदारी संभाली है हिंदी अखबार दैनिक भास्कर ने।

अखबार ने सोशल मीडिया पर एक कैंपेन शुरू किया कि ‘मैं राखी नहीं बांधूंगी’। ऐसे जैसे कि राखी बांधना कोई घटिया काम हो।

त्योहार के पीछे मकसद चाहे जो हो लेकिन ऐसे वक्त में जब भाई-बहन के प्यार का ये प्रतीक लोग खुशी के साथ मना रहे हों, एक अखबार का ये रवैया बेहद असंवेदनशील लग रहा है।

रक्षाबंधन ही नहीं, हिंदुओं के तमाम दूसरे त्यौहारों को भी इसी तरह अपमानित करने की कोशिश अक्सर होती रहती है।

हैरत की बात है कि दैनिक भास्कर ने इस अभियान का प्रचार एक मॉडल से करवा कर इस दकियानूसी अपील में ग्लैमर जोड़ने की कोशिश की है।

यह अखबार इससे पहले होली न मनाने की अपील जारी करता रहा है। अपने एक पोस्टर में तो इन्होंने होली खेलने को अपराध तक बता दिया था।

सवाल यह है कि दैनिक भास्कर वाले रोज लाखों लीटर पानी बर्बाद करने वाले वॉटर पार्कों या दूसरे धर्मों के ऐसे दकियानूसी त्यौहारों के खिलाफ अभियान चलाने की हिम्मत क्यों नहीं करता।

अभी एक दिन पहले ही एक समुदाय विशेष के त्यौहार पर लाखों जानवरों को बेरहमी से कत्ल किया गया तथा उनके खून और अन्य अवशेषों को नालियों, तालाब, पोखरों और नदियों में बहाया गया।

यह त्यौहार भी आज कोई पहली बार नहीं मनाया गया बल्कि सदियों से इस प्रकार का कत्लेआम होता रहा है। लेकिन दैनिक भास्कर ने आजतक कोई ऐसा कैंपेन नहीं चलाया जिसमें इस तरह के त्यौहारों की मुखालफत की गयी हो।

रक्षाबंधन और होली ही नहीं, दिवाली, करवा चौथ और ऐसे तमाम त्यौहारों को लेकर अपमानजनक टिप्पणियां आम बात हैं।

जानी-मानी पत्रकार बरखा दत्त ने कुछ साल पहले ट्विटर पर करवा चौथ को दकियानूसी त्यौहार बताया था। उस वक्त इसे लेकर काफी हंगामा मचा था क्योंकि वो, और वैसी कुछ दूसरी महिला पत्रकार बुरखा और बकरीद जैसी बुराइयों को सही ठहराने की कोशिश करती रही हैं।

इसी तरह हाल ही में दही-हांडी और जलीकट्टू जैसे हिंदू त्यौहारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने नियम कायदे तय किए हैं। जबकि दूसरे धर्मों के त्योहारों पर अदालतें हाथ डालने से बचती हैं।

नागपंचमी के मौके पर पेटा ने एक अजीबोगरीब अभियान चलाया था। जिसमें लोगों से अपील की गई थी कि वो अपने घरों में नाग लाकर उन्हें न मारें। अब पता नहीं पेटा वालों को किसने बता दिया था कि नागपंचमी पर नाग मारे जाते हैं।

किसी धर्म के त्यौहार पर इस तरह की भद्दी टिप्पणी करने का दैनिक भास्कर को किसने अधिकार दे दिया। क्या ऐसे अखबार को खरीदना ही बंद नहीं कर देना चाहिए?

भाई-बहन के पवित्र प्रेम के त्यौहार रक्षाबंधन का विरोध यह खुलेआम कर सकते हैं लेकिन फ्रैंडशिप बैंड बंधवाने के लिये बकायदा कैंपेन चलाये जाते हैं और अपने विशेषांकों के माध्यम से यह बताया जाता है कि किस प्रकार की लड़की को कौन सा बैंड पसंद आता है। यह अखबार और इसके संपादक पता नहीं इतनी दोगलई लाते कहां से हैं?

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