कुलदीप नैयर : एक दूषित विचारधारा के बौद्धिक

बहुत दिनों से मेरे मन मस्तिष्क में एक विषय घर बनाये हुए था, जो एक तो लीक से हट कर था और दूसरा प्रकृति भी मुझे कोई एक ऐसा सुअवसर नहीं प्रदान कर रही थी कि जो मैं उस विषय पर कुछ लिख सकूँ।

खैर, देर से ही सही लेकिन भगवान ने आज एक सुअवसर प्रदान किया है, जिसका अवसर उठा कर मैं एक रसविहीन अनकही कहानी को लिपिबद्ध कर रहा हूँ।

आज जब यह समाचार मिला कि कुलदीप नैयर नहीं रहे तो मुझे अकस्मात बहुत कुछ याद आ गया।

कुलदीप नैयर भारत के बहुत प्रभावशाली पत्रकार रहे है और जब भी पत्रकार व पत्रकारिता की बात होगी तो कुलदीप नैयर का नाम अवश्य लिया जायेगा।

प्रेस व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्षधर कुलदीप नैयर, बंटवारे युग की विरासत को ढोने वाले, वामपंथ के प्रति पक्षपाती दृष्टिकोण रखने वाले पत्रकार थे। वे अपने आपको जीवन भर, नेहरू युग की धर्मनिरपेक्षता व समाजवाद की बेड़ियों से स्वतः को बांधे रखे हुये थे।

कुलदीप नैयर उन कुछ लोगों में से थे जो बंटवारे के बाद भारत आये थे। वे भारत आये उन चंद लोगो मे से थे जिनका पूरा बचपन, लड़कपन व युवावस्था (लाहौर कॉलेज से लॉ किया था) पाकिस्तान में बीता था और वे जीवन के अंत तक, उसी बीते काल में उलझे रहे थे।

इस सब का उनके जीवन व उनके व्यक्तित्व पर इतना प्रभाव पड़ा कि उनकी मानसिकता, पाकिस्तान से सब कुछ लुटा कर आये अन्य विस्थापित हिन्दुओं और सिखों से बिल्कुल विपरीत थी।

कुलदीप नैयर ने जीवन भर बंटवारे की त्रासदी को, सत्य के चश्मे से न देख कर, वामपंथी चश्मे से देखा और असत्य धर्मनिरपेक्षता की अमरबेल पर चढ़ कर पाकिस्तान के साथ रोमांस करते रहे।

इसमें कोई शक नहीं है कि कुलदीप नैयर स्वतंत्रता के बाद प्रतिस्थापित हुये भारत के बुद्धिजीवियों में से एक थे लेकिन मेरी दृष्टि में, उनके वामपंथ व पाकिस्तान के साथ हुये रोमांस ने उन्हें एक ईमानदार पत्रकार व लेखक नहीं रहने दिया था।

यही नहीं, पाकिस्तान के प्रति आसक्ति में बने, अमन की आशा रखने वाले मानवतावादी व मानवाधिकार पर मतानुसार मौन रहने ने, उन्हें एक ईमानदार भारतीय भी नहीं रहने दिया था।

मेरी दृष्टि में कुलदीप नैयर जो पत्रकार व लेखक (15 किताबें लिखी) के साथ राजनयिक भी थे, एक यूटोपियन बुद्धिजीवी थे, जो आहत हिंदुत्व की चेतना से पूरी तरह दरिद्र थे।

भारत के बंटवारे के बाद उसके नवनिर्माण में जो कई दुर्भाग्य हुए थे उसमें सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह था कि उस काल के राजनीतिक नेतृत्व और उसके शासन तंत्र में हिन्दू आहत चेतना का कोई स्थान नहीं था।

उसी का ही यह परिणाम था कि ज्यादातर जनता ने समाजवाद व धर्मनिरपेक्षता की छाया में अपनी हिन्दू आहत चेतना को केंचुल की तरह शनैः शनैः परित्याग कर दिया था। भारत के इतिहास के इसी शनैः शनैः काल में कुलदीप नैयर, 60 के दशक से ही अपनी दूषित विचारधारा को भारत के संचार माध्यमों व विदेश नीति के सूत्रण पर प्रभाव डलवाने में सफल रहे थे।

कुलदीप नैयर, वामपंथी वर्षा में भीगते धर्मनिरपेक्षता के इतने महत्वपूर्ण स्तम्भ रहे हैं कि वे 1990 में इंग्लैंड में भारत के उच्चायुक्त बनाये गये और फिर 1997 में राज्यसभा के सदस्य भी मनोनीत किये गये थे।

आज जब कुलदीप नैयर के पत्रकार व लेखक से राजनयिक, मानवतावादी और मानवाधिकारवादी बनने की 95 वर्ष की जीवन यात्रा को देखते हैं तो यह एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि आखिर पत्रकारिता से शुरुआत करने वाले कुलदीप नैयर, जनमानस की इच्छा विरुद्ध, अपनी विचारधारा को लेकर भारत की राजनीति में इतने महत्वपूर्ण कैसे हो गये? वह कौन सी अदृश्य शक्ति थी जो कुलदीप नैयर को शक्तिशाली बनाती थी?

कुलदीप नैयर, सिर्फ एक नाम नहीं थे बल्कि वे एक ऐसे समूह (क्लब) के सदस्य थे जिसका न कोई वैधानिक रूप था और न ही कोई लिखित अभिलेख है। यह 1950 के दशक में भारत के निर्माण, उसकी नीतियों और उसके तंत्रों पर विमर्श करने के लिये बना समूह था जिसकी सदस्यता निमंत्रण पर आधारित होती है।

यह समूह या क्लब भारत का सबसे शक्तिशाली समूह अभी तक रहा है जिसमें विशेष विचारधारा के राजनैतिक, नौकरशाह, पत्रकार, बुद्धजीवी, सेवानिवृत्त नौकरशाह व सैन्याधिकारी शामिल हैं।

इसके बारे में लोग जानते ज़रूर है लेकिन भारत की जनता के सामने बिना आये यह आज भी भारत के सारे तंत्रों पर एक विशेष विचारधारा को आज भी अमरत्व प्रदान किये है।

इस विषय पर कल लिखूंगा।

क्रमशः

नहीं रहे पत्रकार कुलदीप नैयर

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