व्यंग्य : अदृश्य आपातकाल

आज देश में एक गंभीर संकट छाया हुआ है और वो संकट है ‘आपातकाल’, जिसकी अनौपचारिक घोषणा हमारे प्रधानमंत्री ने अपने शपथग्रहण समारोह में ही कर दी थी। जिसे मैं अपने शब्दों में अदृश्य आपातकाल कहता हूँ, क्योंकि ये एक ऐसा आपातकाल है जो विगत चार वर्षों से भारत में सफलता पूर्वक लगा हुआ है पर आश्चर्य ये है कि दिखाई नहीं देता, या यूँ कहें कि भारत की आम जनता को छोड़कर बाकी सबको दिखाई देता है।

अब आप कहेंगे कि ये बाकी लोग कौन हैं, जिनकी आँखें 6/6 के दृष्टिदोष रहित मानक पर खरी उतरती हैं? वे कौन से प्रतिभावान लोग हैं जिन्होंने अदृश्य चीजों को भी देख पाने की सिद्धि प्राप्त कर ली है?

मेरा जन्म 80 के दशक के पूर्वार्द्ध में हुआ है इसलिए मुझे आपातकाल और 84 के दंगों के विषय में कोई विशेष जानकारी नहीं है, हाँ पर मैंने उस पीढ़ी के लोगों को ये कहते ज़रूर सुना है कि जब आपातकाल लगा था, तब दिखाई भी पड़ता था.

अब मेरी और मेरे जैसे बहुत से लोगों की समस्या ये है कि हमें समझ ही नहीं आता कि भारत ने 21वीं सदी में ऐसी कौन सी महत्वपूर्ण खोज कर ली है, जिससे दृश्यमान चीजों को भी अदृश्य किया जा सकता है और सवाल यह भी है कि अगर ऐसी कोई खोज हुई है , तो इस महान खोज को भारत की आम जनता से आख़िर क्यों छुपाया जा रहा है?

सिर्फ पत्तलकारों, कौमनष्टों, बुद्धुजीवियों और समाजभोगियों को ही इसकी जानकारी क्यों दी गयी है? क्या भारत की आम जनता को आपातकाल के दर्शनों का लाभ नहीं मिलना चाहिए, आखिर बात तो ‘सबका साथ सबका विकास’ हुई थी फिर सिर्फ कुछ ख़ास लोग ही आपातकाल क्यों देखेंगे, इसे देखने का मौक़ा तो सबको मिलना चाहिए। क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं? क्या यही अच्छे दिन हैं? क्या इसी दिन के लिए मैंने साहेब! को वोट दिया था कि देश में चार साल से लगे आपातकाल को भी ना देख सकूँ??

देखते ही देखते मैं आपातकाल ना देख पाने की हीन भावना से भरने लगा, एक तरह की निराशा ने मुझे घेर लिया और उसी निराशा में मैंने सोचा, जिस तरह कांग्रेसी राजा के अदृश्य कपड़े सिर्फ कांग्रेसियों को ही नज़र आते हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि आपातकाल भी सिर्फ तथाकथित बौद्धिक समूहों को ही नज़र आता हो?

बस… इस विचार के आते ही मेरी रही-सही हिम्मत भी टूट गई और जब इस अवसाद से दुखी होकर मैं अपनी ‘भक्त’ की पदवी से इस्तीफ़ा देने ही वाला था कि आकाशवाणी हुई… रे मूढ़ ! ये क्या कर रहा है? जा…. जनेऊ युनिभरसिटी चला जा, तेरी समस्त शंकाओं का समाधान सिर्फ वहीं मिल सकता है ।

मैं तत्काल युनिभरसिटी पहुंचा… झामपंथी ढ़ोंगाचार्य मुझे देखकर प्रसन्न हुए और मुझे लम्बा कुर्ता, मैला.. थैला और पाश की कविता ‘हम लड़ेंगे साथी देकर’ बोले, अपने साथ शेविंग किट तो लाए होगे?

मैंने कहा हाँ लाया हूँ… वे मुस्कुराए और पनामा सिगरेट का कश लगा कर बोले…. गंगा-ढाबे के पीछे बरसात में जो तालाब जैसा बन गया है ना? उसमें विसर्जित कर दो, अब तुम्हें शेविंग नहीं करनी है… मर्द बनो… क्लीन शेव लौंडे क्रान्ति कर पाने में असफल रहते हैं।

मैंने कहा पर मैं क्रान्ति करने नहीं, आपातकाल को देखने और समझने के लिए यहाँ आया हूँ… वे बोले ! दिखा देंगे आपातकाल भी… कल सुबह 12 बजे क्लास रूम के सामने वाले मैदान में मिलो।

मैंने प्रश्न किया पर पढ़ाई तो क्लास रूम में होती है? वे बोले ये जनेऊ युनिभरसिटी है, यहाँ पढ़ाई हरे मैदानों और होस्टलों के अँधेरे कमरों में होती है… कह कर वे चले गए। सुबह मैदान पर जाते ही उन्होंने मुझे ‘अर्जुन’ समझ कर कहा, वो देखो उस तोते की आँख में जो चमक रहा है वही आपातकाल है, लगाओ निशाना…

मैंने कहा; मुझे पूरा तोता तो नज़र आ रहा है, बस उसकी आँख नहीं दिख रही…. झामपंथी गुरु नाराज़ हो कर बोले मूर्ख! तुम्हें आपातकाल रूपी आँख कभी नहीं दिखेगी, जाओ… भाग जाओ यहाँ से… तुम जनेऊ युनीभरसिटी में पढ़ने जोग्य नहीं हो, और पास खड़े एक लड़के की तरफ इशारा करते हुए मुझसे बोले, उस लड़के को देखते हो? उसका नाम ‘कर्ण’ है अभी-अभी SC कोटे में एडमिशन पाया है।

मैं बोला, पर कर्ण तो सुनते हैं ‘परसुराम एकेडमी’ में पढता है? वे बोले, वो सब पुरानी बात है, ऊ परसराम एकेडमी में पढ़े का कौनो फायदा है? आगे पाठ-पीछे सपाट… आदमी जो सीखता है थोड़े दिन बाद सब भूला जाता है… अब ई हमरे पास पढ़ेगा, इसको तोता नज़रे नहीं आता है, बस आपातकाल वाला आँखिये दिखता है… तुम भागो यहाँ से…

मैं अपना सा मुँह लेकर चला आया, समस्या वहीं की वहीं थी… ये आपातकाल दिखे तो दिखे कैसे? तभी मोहल्ले में किसी ने सलाह दी… आपातकाल देखना है तो न्यूज़ चैनल क्यों नहीं देखते? सलाह नेक थी, तो मैंने न्यूज़ चैनल देखना शुरू किया… पंडीTV पर आपातकाल पर ‘क्राइम-टाइम’ चल रहा था, मैंने देखा कि बहस में एक बुद्धूजीवी को छींक आ रही थी कि आते-आते रुक गई, वो फ़ौरन बोले देखा आपने? अब सरकार हमारी छींक को भी रोक रही है…. ये है आपातकाल! पैनल में बैठी कौमनष्टा बोलीं, ये तो कुछ भी नहीं है, अब तो सरकार हमारी बड़ी बिन्दी के साइज़ को भी कम करना चाहती है….. ये है आपातकाल! समाजभोगी बोले, इस देश का प्रधानमंत्री हमें बोलने नहीं देता… हमारे खुले में हगने के मौलिक अधिकार को छीनना चाहता है…… ये है आपातकाल ! शो के एंकर पत्तलकार ने भी टेक में टेक मिलाई… हें..हें..हें ! कौन जात से…. मोटा-मोटी बात ये है कि हमको भी ट्वीटर पर लड़का लोग पूछता है की अपने भाई के लिए स्क्रीन काली नहीं, तो नीली ही कर लो…. ये है आपातकाल…!

मेरे दिमाग में फिर वही सवाल कौंधा कि जब इन ख़ास लोगों को आपातकाल दिखता है, तो मुझे और मुझ जैसे आम भारतीय की आँखों में कौन सा मोतियाबिंद उतरा है, जो हमें आँखें फाड़कर देखने पर भी ‘आपातकाल’ नहीं दिखता, तो जवाब ये है कि बकौल बुद्धूजीवी ये तो “मानो तो मैं गंगा माँ हूँ, ना मानो तो बहता पानी” वाली बात है, जो आपातकाल देखना चाहते हैं उन्हें बंद आँखों से भी आपातकाल दिखता है, और जो नहीं देखना चाहते उन्हें खुली आँखों से भी नहीं दिखता… और नहीं ही दिखेगा, क्योंकि रस्सी को साँप बताने वाली तुम्हारी पुरानी चालों को अब हम समझने लगे हैं, अब हम समझने लगे हैं कि क्यों सरकार ने आते ही FRCA सर्टिफ़िकेट रद्द करके, तुम्हारा ग्रांट रूपी विषदंत तोड़कर तुम्हें खुला छोड़ दिया था, अब तुम कितना भी फुफकारो हमें फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हमें पता है अब तुम सिर्फ फुफकार सकते हो काट नहीं सकते।

अब हम समझने लगे हैं कि जब बड़े जहाज़ में पेस्ट कंट्रोल किया जाता है तब चूहों की क्या हालत होती है, जहाज में रह नहीं सकते और पानी में कूद कर आत्महत्या कर नहीं सकते…. सिर्फ बिलबिला सकते हैं।

हाँ ये आपातकाल ही तो है… पर हमें नहीं दिखता…. और हमें नहीं दिखेगा…. क्योंकि वो लगा है बुद्धुजीवियों के अनर्गल साहित्य पर… झामपंथियों के रक्तरंजित झंडों पर… समाजभोगियों की ग्रांट पोषित मंडियों पर… भ्रष्टाचारियों की स्विस बैंक की तिजोरियों पर….. और पत्तलकारों की चाटी हुई जूठी पत्तलों पर…. हाँ… इस देश में आपातकाल है, क्योंकि आप सब सुविधाभोगी ख़ास लोग 70 सालों में आज पहली बार ‘आपात’ स्थिती में पहुंच गए हैं, और इस देश का प्रधानमन्त्री ‘काल’ बनकर आपके सिर पर सवार है… आपातकाल तो है ही, और ये आपातकाल यूँ ही बना रहना चाहिए….. लगा लो ज़ोर ‘पैर के नाखून से सर के बाल तक’ हमने भी सोच लिया है ये आपातकाल अगले 10 साल तक तो यूँ ही लगा रहेगा…

सोनिया-काल में ना केवल निजी क्षेत्र, बल्कि सरकार भी उधार लेकर चला रही थी काम

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