माँ की रसोई से : स्वस्थ रहना है तो ऐसे खाइए बासी रोटी

ध्यान बाबा अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए हमेशा कहते हैं, आप वैसा मठा नहीं बना सकती क्या जो दादी के गाँव में खाया करता था. उस मठे में पता नहीं क्या जादुई स्वाद था कि हम लोग सुबह नाश्ते में सिर्फ वही मठा और ठंडी रोटी खाते थे. उसमें सिर्फ नमक और खड़ी लाल मिर्च को यूं ही हाथ से क्रश करके डाल दिया जाता था.

पापा बताते हैं कि वो मठा आजकल के जैसे फ्रिज में रखी दही मलाई को फेंटकर नहीं बनाया जाता था… उसके लिए एक अलग ही मटका हुआ करता था, जिसको बिलौने के लिए उसमें डंडी लगी होती थी… रोज़ उसमें दही डाला जाता, उसे दिन भर बिलौते रहते और फिर अगले दिन सुबह उसका मठा निकलता वो खाने लायक होता. और उसका स्वाद ठंडी रोटी के साथ ही आता है, गर्म रोटी से नहीं.

मैं भी बचपन से देखती आ रही हूँ घर की महिलाओं को बची हुई बासी रोटी खाते, कभी दाल में मीड़कर कभी छाछ में भीगोकर… मैंने तो बचपन में माँ के हाथ से बना बासी रोटी का पोहा और गुड़ डालकर बने बासी रोटी के लड्डू भी खाए हैं और अपने बच्चों को भी खिलाती हूँ.

मैं तो आज भी शाम के लिए रोटी सुबह ही थाप के रख लेती हूँ. पहला कारण ठंडी रोटी आसानी से टूटती है तो बच्चों को चबाने में दिक्कत नहीं जाती. दूसरा बासी रोटी पचती जल्दी है.

तो आज जो हम नारीवाद का झंडा उठाये पुरानी परम्पराओं को संस्कृति और संस्कार को गुलामी का द्योतक बताते नहीं थकते, वास्तव में वही उन नारियों की शक्ति का कारण थीं जिसकी वजह से उन्हें कभी थकान नहीं होती थी चाहे कितना ही काम कर ले.

जी, यही बासी रोटी की ताकत आज जब डॉक्टर्स अपनी मेडिकल रिपोर्ट में प्रस्तुत करते हैं तो हम गुणगान करने लग जाते हैं. बहुत सारे कारण है जो एक मेडिकल रिपोर्ट में सामने आए हैं, जिसके अनुसार –

सुबह नाश्ते में ठन्डे दूध में या मठे में बासी रोटी डालकर खाने से एसिडिटी नहीं होती, ब्लड प्रेशर सामान्य रहता है, शरीर का तापमान सामान्य रहता है, यहाँ तक की ब्लड शुगर भी सामान्य रहती है. रात के समय भी हल्का भोजन लेना हो तो ठन्डे दूध में रोटी भिगोकर खा लें.

ध्यान रहे यहाँ सिर्फ बासी रोटी की बात हो रही है, बासी दाल सब्ज़ी नहीं खाना है. और रोटी भी सुबह की शाम या शाम की सुबह खाई जा सकती है, 12 घंटे से अधिक बासी न हो रोटी.

मेरी माँ मेरे बचपन में आटे में दही से खमीर उठाकर छोटी छोटी पूडियां बनाती थी, जिसे फूलेचा कहते थे. कभी कभी आटे में सोडा डालकर भी रोटी बनाकर सुबह चाय के साथ खाने को देती थीं. अब मुझे यह तो नहीं पता कि उनको इसके पीछे का मेडिकल साइंस पता था या नहीं, लेकिन यह पक्का पता है कि अपने अनुभवों से वह या घर की अन्य महिलाएं यह तो जानती थीं कि यह रोटी स्वास्थ्य के लिए अच्छी होती हैं.

तो इसके पहले कि बासी रोटी के गुणगान बताते हुए कोई विदेशी कंपनी रोटियाँ भी बेचने लगे, लौट आइये पुराने खान-पान के तरीकों पर. स्वस्थ रहिये मस्त रहिये.

माँ की रसोई से : कुसकुरा, माँ बसी है बासी रोटी में भी

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