हिन्दुओं की हर समस्या का हल क्रूरता और मांसाहार को बताने वाले कौन हैं ये लोग

खान पान की शुचिता और पवित्रता रसोई से शुरू होती है।

आजकल टीवी पर आने वाले कुकिंग शोज़ में खाने को चख चख कर देखते हैं… लेकिन बृज के अधिकाँश हिन्दू घरों, विशेषकर उन बनिए बामनों के यहाँ जहाँ पर कि बहुएं पहली पीढ़ी का सम्मान और लिहाज़ कर रही हैं, वहाँ तो ऐसा होना कतई असंभव है।

भोजन का सबसे पहले ठाकुर जी को भोग लगता है, सो झूठे भोजन का भोग कैसे लगाया जा सकता है… यहाँ तो रसोई में गृहणी बिना स्नान के नहीं घुस सकती है।

इसके अलावा घर में रसोई बनाने वाली गृहणी के लिए अपना झूठा भोजन अपने श्वसुर, सास, जेठ, पति आदि को परोसना एक तरह से पाप ही माना जाता है।

लेकिन संयुक्त परिवारों की टूटन से बने एकल परिवार… बच्चों के स्कूल… पति के दूकान या ऑफिस जाने पर नाश्ते या लंच का टिफिन तैयार करने की जल्दी के चलते अधिकाँश जगह ये परम्पराएं टूट रहीं हैं।

चलिए कोई बात नहीं…

तमाम परिवारों में प्याज लहसुन नहीं चलता… लेकिन बाहर के नाश्ते और भोजन में दक्षिण भारतीय और पंजाबी भोजन के चलन के कारण नई पीढ़ी लहसुन प्याज को पूरी तरह अपना चुकी है।

लेकिन तमाम घरों में रसोई का अदब अभी चल रहा है… बच्चों की ख़ुशी के लिए प्याज लहसुन का तड़का रसोई में ना लगा कर, रसोई से बाहर इन्डक्शन चूल्हे आदि पर लगा दिया जाता है।

अब इतना परिवर्तन आया है कि प्याज लहसुन ‘पाप’ की जगह, पूजा पाठ व्रत उपवास वालों के लिए मात्र ‘तामसिक भोजन’ की श्रेणी में आ गये हैं… घृणा वाली बात खत्म सी हो गयी है।

भोजन के मामले में मैं घोर रुढ़िवादी हूँ, लेकिन जब मालकिन और बच्चों के साथ भोजन करने बैठता हूँ तब बच्चे प्याज अलग से रख लेते हैं लेकिन बच्चों का मन नहीं बिगड़े सो मैं और मालकिन अपना प्याज रहित भोजन बिना नाक मुंह सिकोड़े करते रहते हैं…

अब ज़रा इधर की बात करें…

हमारे गांव में मुस्लिमों की आबादी 45% तक है। अभी कुछ तीन दशक पहले तक ये आबादी 55% थी तब बकरीद पर अधिकाँश मुस्लिम परिवार अपनी कुर्बानी को हम रुढ़िवादी हिन्दुओं से छुपाते थे। गाँव में कम से कम एक दर्जन लोग गोश्त बेचते थे… लेकिन बड़े अदब से, घरों के अन्दर…

जो भी ग्राहक गोश्त खरीद कर हिन्दू आबादी के रास्ते से गुजरता वो गोश्त को कतई ढंक कर लेकर जाता था…

मोहर्रम पर खिचड़ा बनता तो बोटी डालते समय देख लिया जाता कि कोई हिन्दू तो नहीं देख रहा…

हम लोग जब मुस्लिम बस्ती में स्थित चामड़ (चामुंडा) के चबूतरे पर जल चढ़ाने जाते थे तब गोश्त बेचने वाले सकपका कर वहां टाट के परदे को फटाफट गिरा कर गोश्त ढंक देते थे… और यह सब डर के कारण नहीं, बल्कि हम लोगों के आपसी व्यवहार और लिहाज के कारण ये अदब दिखाया जाता था।

कहने का मतलब है कि अदब लिहाज का अलिखित समझौता हम लोगों के बीच कायम था।

लेकिन इधर राम जन्मभूमि आन्दोलन के साथ ही तनाव के हालत बनने लगे थे… भाजपा के शासन में इनका डरना शुरू हुया… आपसी सम्बन्धों में तनाव के चलते मुसलमान लोग अपनी बस्तियों की ओर सिमटते गए…

लेकिन ये दौर अधिक समय नहीं चल पाया…

फिर आया 1993 का मुलायम शासन… आपसी लिहाज की जगह तनाव ने पहले ही ले ली थी, धीरे धीरे बचा खुचा अदब लिहाज गायब होता गया।

गोश्त की दुकाने बस्ती से निकल मुख्य रास्ते के सहारे आ गयीं… टाट के परदे हट गए… सुबह ही पूरी की पूरी भैंस काट कर टांगी जाने लगी… गोश्त और हड्डियों से भरी मेटाडोर हिन्दू आबादी वाले रास्ते से होकर गुजरने लगी…

बकरीद पर कुर्बानी वाले घरों की संख्या बढ़ती गयी… अड़ोस-पड़ोस के घरों में कुर्बानी के तबर्रुख बनते जाने वाले थाल के ऊपर ढंका हुआ कपड़ा भी हटने लगा…

और तो और, कुछ लड़के तो हमारा मजाक उड़ाने की स्टाईल में हमको प्लेट का ऑफर भी देने लगे…

भयंकर गुस्सा आता था… लेकिन गुस्सा दब कर रह जाता… मुसलमानों में किन्ही बोहरे जी चौधरी साहबों का धन ब्याज पर उठा हुआ था… गोश्त धोने वाली मेटाडोर भी हिन्दुओं की थी… बकरीद पर प्लेट में मुंह मारने के लिए हिन्दू ही पहुँच जाते थे…

सो ये लोग इनकी हिमायत में हर समय हाज़िर रहते थे… ऊपर से मुसलमानों की ही व्यंग्य भरी बातें ‘अबे द्सिगले के सिगले कादुं ताऊ सूंढ़ गए तू आया बड़ा भारी पंडत कहीं का…’।

अब क्या कर सकते थे… मन ही मन भगवान के ऊपर छोड़ने का बहाना बना लेते…

बकरीद तो वैसे भी एकादशी के दिन पड़ती है… सनातनी हिन्दुओं का सबसे बड़ा सात्विक व्रत होता है… सहज कल्पना नहीं कर सकते कि लहसुन प्याज तक ना छूने वाले एकादशी व्रत धारी हिन्दू को एकादशी व्रत पर थाल में गोश्त या नाली के बहते खून को देख कितनी मानसिक पीड़ा होती होगी…

खैर अब आया चिर प्रतीक्षित 2014… लगा मानो सारे सपने पूरे हो जायेंगे…

इनमें योगी जी का शासन आने से पूर्व ही उपर्वर्णित गोश्त की दूकान आदि के सारे दृश्य गायब हो गये… कदाचित कुछ बदतमीज़ियों को छोड़ कुर्बानी आदि की अदब भी कायम होने लगी है… भैंस भी कटती है तो वो घर के अन्दर…

लेकिन मुलायम मायावती के शासन वाले बेधड़क मुसलमान मानो हिन्दू शेर बन कर फेसबुक में घुस गये हैं… यहाँ खुले आम मांसाहार का महिमा मंडन होता है… भारत की लम्बी गुलामी का ठीकरा शाकाहारियों के सर फोड़ा जाता है… सोमनाथ की पराजय के लिए हमारी धर्म भीरुता और गौ के प्रति श्रद्धा को उत्तरदायी ठहराने की कथाएँ पढ़ने को मिलती हैं…

राष्ट्रवादियों की एक विशेष लॉबी मानो हिन्दुओं की हर एक समस्या का हल क्रूरता और मांसाहार में ही निहित बताने लगी है…

मुझे नहीं लगता कि इन सो कॉल्ड राष्ट्रवादियों और मेरे गाँव के गोश्त विक्रेता और कुर्बानी करने, उसका तबर्रुख बाँटने वालों और उनकी तरफदारी करते हुए ब्याज वाले मेटाडोर मालिक और प्लेट भकोसने वाले हिन्दुओं में कोई भी रत्ती भर भी अंतर हो…

इन बहादुर राष्ट्रवादियों को ध्यान रहे… ये मांस खाएं, खूब खाएं… भोजन उनकी निजता है… झटके का खाएं या हलाली का खाएं… बकरे का खाएं… सूअर का खाएं या भैंसे का खाएं… कोई आपत्ति कभी भी नहीं है… ना ही हमको कोई आपत्ति करने का तनिक भी अधिकार है…

खाएं सामने वाले का अदब लिहाज कर के… अपनी खुराक का प्रदर्शन दूसरे के सामने ना करते हुए खूब खाएं…

लेकिन मांसाहार के पक्ष में फेसबुक पर पोस्ट डालोगे… कमेंट्स करोगे… झटका मीट की खूबी बयान करोगे… देवी जी के नाम की मीट की दुकान का प्रचार करोगे…

तो हमारे लिए तुम्हारे प्रति सम्मान का आधार क्या है… हमारे लिए तुम्हारे प्रति कोई भी धारणा JNU, केरल, बंगाल या महाराष्ट्र में मीट काउंटर सजाने वाले वामी या राज ठाकरे के गुंडों से पृथक कैसे हो सकती है…

तुम्हारा दर्जा किसी कल्लू कसाई से रत्ती भर भी ज्यादा होने का कोई औचित्य बनता है क्या?… हमारे लिए तुम्हारे झटके और दूसरे की हलाली की कोई भी कीमत अलग अलग नहीं है…

“…पर सेठ, जा अमित्सा ने करौं भौत बुरौ एं”

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