हम हिन्दुओं का DNA ही है गड़बड़, किसी को देख ही नहीं सकते रोता बिलखता

आज फिर आपको एक सच्चा किस्सा सुनाता हूँ। आप बीती, 100 टका सच…

कोई दस साल पहले की बात है, जालंधर की…

एक आदमी ने हमको बेवक़ूफ़ बना के कुछ पैसे ले लिए। रकम ज़्यादा नहीं थी। यही कोई पांच हज़ार…

वो रोज़ झूठ बोले, काबू न आये… फिर गायब हो गया… हमको गुस्सा ये कि साला झूठ क्यों बोलता है? बेवक़ूफ़ काहे बनाता है?

हम उसको खोज खाज के उसके घर जा पहुंचे… साथ मे हमारे एक मित्र थे अरोड़ा जी…

हम एकदम अगिया बेताल… आग बबूला… निकल बाहर साले…

अब ऐसे लोगों की एक खासियत होती है… ये बदमाश कभी घर पर नही मिलेंगे… उसकी बीबी निकल के आयी…

हमने पूछा कहां है?

का हुआ जी…

साला पैसे नही दे रहा, ऊपर से बेवक़ूफ़ बना रिया है…

उसने पानी पिलाया… कुछ ठंडे हुए… उसने अपना दुखड़ा रोया… भाई साहब धीरे धीरे दे देंगे…

हमने घर में चारों ओर नज़र दौड़ाई…

अब अरोड़ा साहब थे अपने पक्के यार… ऊ मुझे धीरे से कान में बोले, पहलवान उठो… जल्दी उठो… कट लो…

हम उठ के बाहर आये, उन्होंने जल्दी से स्कूटर स्टार्ट किया, गली से बाहर आ गए…

अरोड़ा जी बोले, नालायक तुम कितने बड़े तुर्रम खान हो हमको पता है… अगर वहां 5 मिनट भी और बैठ गए होते तो 5000 वसूलना तो दूर, हज़ार-दो हज़ार का राशन भरवा के आते उनकी रसोई में… कट लो… भूल जाओ…

अरोड़ा वाकई जानता था कि हम कितने बड़े तुर्रम खान हैं… उस बेचारी गरीब औरत और उसके भूखे बच्चों का मुंह हमसे देखा ही न जाता…

आपको गुजरात दंगों का वो poster boy याद है?

वही… आंखों में आंसू लिए, हाथ जोड़ता… रहम की भीख मांगता…

वो पेशे से दर्जी था… सेक्यूलरों ने उसे गुजरात दंगों का poster boy बना दिया था… और गुजरात को मुसलमानों की कब्रगाह…

उसे poster boy बना के इस क़दर भुनाया गया कि उसने तंग आ के गुजरात ही छोड़ दिया और जा के बंगाल में बस गया… पर सिर्फ साल-डेढ़ साल में ही उसे ये समझ आ गया कि सिर्फ मुसलमान ही नहीं बल्कि किसी भी हिंदुस्तानी के लिए गुजरात ही सबसे मुफीद, सबसे सुरक्षित स्थान है…

बहरहाल आज का विषय गुजरात या फिर वो poster boy नहीं है…

विषय ये है कि आज ये जो लकड़बग्घा गैंग फेसबुक पर तलवार भांज रही है कि केरल की कटी उंगली पे मूतो भी मत… इनमें से किसी के सामने वो गुजरात वाला दर्जी आंखों में आंसू लिए, रोता बिलखता, अपने प्राणों की भीख मांगता आ जाये… तो इनमें से कोई है इतना निर्दय निष्ठुर कि उस रोते बिलखते आदमी की गर्दन उतार ले?

अरे भैया, तुम कितने पानी मे हो, हमको खूब पता है… वो तुम्हारे सामने आया नहीं कि तुम पसीज जाओगे… गांडीव तुम्हारे हाथ से छूट जाएगा… अंग प्रत्यंग शिथिल पड़ जाएंगे…

तुम्हारे अंदर का इंसान जाग जाएगा… अबे तुम उसे घर ले आओगे… उसके आंसू पोंछ के उसको खाना खिलाओगे… उसे घर पहुंचा के आओगे… जाते हुए उसके बच्चों के लिए एक लीटर दूध और ब्रेड ले के जाओगे…

भाई मेरे, हिन्दू हैं हम… साला DNA में ही कहीं कोई दोष है… हम किसी को रोता बिलखता देख ही नहीं सकते… फिर वो कोई भी हो… मुसलमान हो ईसाई हो, केरल का हो या बंगाल का… कांग्रेसी हो या फिर कम्युनिस्ट…

हम रोते बिलखते, कातर स्वर में पुकारते किसी को देख ही नहीं सकते…

क्या सिर्फ़ खाकी पैंट ही कैमरा फ्रैंडली है?

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